Santosh kumar koli ' अकेला' 30 Mar 2023 कविताएँ समाजिक औक़ात 85836 0 Hindi :: हिंदी
अपनी-अपनी नाप लो, अपनी-अपनी लो तोल। खेल है औक़ात का, औक़ात का है मोल। आज जो जहां खड़ा, पड़ा, मिली जीत या मात है। फूलों का हार पड़ा गले, चाहे बदी की बरसात है। चाहे व्यक्ति चले अकेला, चाहे मिला साथ है। यही उसकी हैसियत, यही उसकी औक़ात है। बिना औक़ात, जीवन ढोल की पोल। खेल है औक़ात का, औक़ात का है मोल। कोई जान बूझ दिखाता, किसी की अपने आप दिख जाती है। कोई दर-दर फिरे भटकता, किसी की घर बैठे बिक जाती है। किसी की सेंकते -सेंकते जल जाती, किसी की बिन सेंके सिंक जाती है। ये औक़ात है जनाब, बिन दिखाए दिख जाती है। अपनी औक़ात को, बिन डांडी मारे तोल। खेल है औक़ात का, औक़ात का है मोल। अपनी-अपनी नाप लो, अपनी -अपनी लो तोल। खेल है औक़ात का, औक़ात का है मोल। अगर बढ़ाना है, तो अपनी औक़ात बढ़ा। तोड़ हद औक़ात की, जहां आज तू खड़ा। व्यक्ति की औक़ात का, समाज करता है धड़ा। अपनी -अपनी औक़ात है, कोई बौना कोई बड़ा। ज़्यादा टटोल, कम तोल, बिल्कुल मत बोल। खेल है औक़ात का, औक़ात का है मोल। औरों से पहले, खुद की ही पहचान लो। औक़ात से इतर, कुछ नहीं मिलता, कितनी ही ख़ाक छान लो। चमका लो चरित्र को, तेज़ सान पर सान लो। गुणवत्ता संवर्द्धन करो, परिमार्जित ज्ञान लो। विचारों को बना सुडोल, बदल यह खोल। खेल है औक़ात का, औकात का है मोल। अपनी-अपनी नाप लो, अपनी- अपनी लो तोल। खेल है औक़ात का, औक़ात का है मोल।