मैं ,,जीयूं इस तरह , कि विभव में भोर हो जाए,
मैं,, जीयूं इस तरह ,की कविता हर ओर हो जाए,
देश ,लिखने वाले द्वेश नहीं लिखा करते,
मिट्टी में भी सुग read more >>
अरसे बाद,खुद को पहचान पाई हूं,
ये मेरे अहसास की सुगन्ध है,।
समय का इक पहलू ,मेरा बड़ा भयभीत रहा ,
फिर भी मुसाफिर इक जिन्दाबाद रहा,।
ज़िन्� read more >>
शिला पर नाम लिखा किसी ने कविता,अधुरा छोड़ दिया जो गुजरी मैं उस राह से , फिर लौटकर आना होगा वापिस इस मुकाम पर कहकर,शीर्ष मैंने पूरा किया,,। read more >>
मुनासिब नहीं मेरा किसी पर भी बरस जाना,।
मैं उस पगडंडी पर ,बिना धाप किए चल रही हूं,
जहां एक कांटा कुरेदता है , मेरी कदमों के तलवे को,मगर
को read more >>