और ,फिर ,मुझे लिबाज ,वो, पहनाया, गया, दोस्तो।
मैं ,दुनिया को सुन्दर ,हास्य ,कविता ,लगूं,।
मगर यह जो चार ,आंखें ,उस वक्त मुझे देखती ,होंगी,।
इन� read more >>
अंतिम, आशा ,के, फूल,लूटा रही हूँ,।
कविता हूँ,।मैं,, देह ,अपना, जला कर।
पथ, के, अंधकार को डरा रही हूँ,।
बड़ी ,भयावह रही ,इक घटना ,।
कागज तो बहा,प� read more >>
वक़्त ,की ,मुलाकात ,लिख रही हूँ,।
किसी ,से ,अधूरा, रहा ,साथ लिख रही हूँ,।
लिखावट,का तलबगार रहा कलम,।
मैं तो बस अपना इक हाथ लिख रही हूँ,।
कहीं read more >>
सदृण सा इक रिश्ता अब भी निभा रही हूँ ,मैं,।
इस, रिश्ते ,में, बातों का ,दौर खत्म है,।
फिर, भी ,एहसास, न, टूट जाये,।
उम्मीद का आखरी सफर निभा रही � read more >>
बुलंद ,शहर के दरवाजे पर एक चस्मदीद खड़ा होता है,।
कितनी खोखली है,।यह मिनारें,।
यहाँ नहीं पहुंचती ,इक हवा ,।जो आयी हो गरीबी के भेष में,।
म� read more >>
जब ,मेरे ,देश की बात होती है,।
मेरी ,आंखों में,इक स्वतंत्र ,निश्च्छल किताब होती है,।
बेशक सरहद के उस लहराते तिरंगे से,
मेरी क्षण भर की मुल� read more >>