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वर्तमान में मेले की प्रासंगिकता: विरासत की गूंज

Ajay kumar suraj 26 Nov 2025 आलेख समाजिक वर्तमान में मेले की प्रासंगिकता: विरासत की गूंज 11062 0 Hindi :: हिंदी

लघु कथा: विरासत की गूंज
​(स्थान: रामलीला मैदान, पट्टी, प्रतापगढ़)
​शाम के 6 बज रहे थे। अक्टूबर की हल्की गुलाबी ठंड हवा में घुलने लगी थी। 20 वर्षीय आर्यन अपने हाथ में महंगा स्मार्टफोन लिए सोफे पर लेटा था। तभी उसके दादाजी, रामेश्वर प्रसाद, तैयार होकर आए। सिर पर गांधी टोपी और हाथ में लाठी।
​"अरे आर्यन! अभी तक तैयार नहीं हुआ? पट्टी के मेले में नहीं चलना? आज रावण वध है," दादाजी ने उत्साहित होकर पूछा।
​आर्यन ने फोन से नज़र हटाए बिना कहा, "दादू, प्लीज। वहां कितनी धूल और धक्का-मुक्की होती है। और फिर, रावण जलते हुए तो मैं यूट्यूब पर भी देख सकता हूँ। आप चले जाइये।"
​रामेश्वर जी मुस्कुराए। उन्होंने आर्यन के पास बैठकर कहा, "बेटा, स्क्रीन पर आग दिख सकती है, पर उसकी तपिश (गर्मी) नहीं महसूस होती। और मेले का मतलब सिर्फ रावण देखना नहीं, 'मिलना' होता है। चल, आज तुझे अपनी जड़ों से मिलाता हूँ।"
​आर्यन बेमन से तैयार हो गया।
​मेले का दृश्य:
जैसे ही वे पट्टी के ऐतिहासिक रामलीला मैदान के करीब पहुँचे, दूर से ही लाउडस्पीकर पर "सियावर रामचंद्र की जय" के उद्घोष सुनाई देने लगे। रोशनी से नहाया हुआ मैदान किसी नई नवेली दुल्हन की तरह सजा था। हजारों की भीड़ थी—क्या बच्चे, क्या बुजुर्ग, क्या महिलाएं।
​दादाजी ने बताया, "जानते हो आर्यन? यह मेला दशकों से ऐसे ही लगता आ रहा है। जब बिजली नहीं थी, तब पेट्रोमैक्स (गैस बत्ती) की रोशनी में यहाँ रामलीला होती थी। प्रतापगढ़ के कोने-कोने से लोग यहाँ अपनी रिश्तेदारियां निभाने आते थे।"
​आयोजन और व्यवस्था:
आर्यन ने गौर किया कि व्यवस्था अद्भुत थी। एक तरफ विशाल मंच पर स्थानीय कलाकार पूरी श्रद्धा के साथ राम-रावण युद्ध का मंचन कर रहे थे। उनकी वेशभूषा भले ही बॉलीवुड जैसी हाई-टेक न हो, पर उनके संवादों में जो ठेठ अवधी का पुट और भाव था, वह रोंगटे खड़े करने वाला था। दूसरी तरफ, पुलिस प्रशासन और स्थानीय स्वयंसेवक (Volunteers) भीड़ को नियंत्रित कर रहे थे। एक तरफ चाट-पकौड़ी और पट्टी की मशहूर जलेबियों की दुकानें थीं, तो दूसरी तरफ लकड़ी के खिलौनों और गृहस्थी के सामान का बाज़ार।
​आधुनिकता बनाम परंपरा:
चलते-चलते आर्यन को प्यास लगी। दादाजी उसे एक कुल्हड़ वाली चाय की दुकान पर ले गए। वहां दादाजी के कुछ पुराने मित्र मिल गए। वे सब ऐसे मिले जैसे बरसों से बिछड़े हों। गले मिले, हंसे और एक-दूसरे का हाल-चाल पूछा।
​तभी आर्यन का ध्यान एक दृश्य पर गया। एक तरफ 'मौत का कुआं' और 'ब्रेक डांस' जैसे आधुनिक झूले थे, जहाँ आज की युवा पीढ़ी इंस्टाग्राम के लिए रील (Reel) बना रही थी। और ठीक उसके बगल में, एक नट (Rope walker) रस्सी पर चल रहा था, जिसे देखने के लिए आज भी वैसी ही भीड़ थी जैसी 50 साल पहले होती होगी।
​आर्यन ने महसूस किया कि यहाँ कोई 'ऑनलाइन' नहीं था, सब 'ऑफलाइन' होकर भी एक-दूसरे से ज्यादा कनेक्टेड थे। उसने अपना फोन जेब में रख लिया। उसे अपनी गलती का अहसास हुआ। जिस 'सोशल नेटवर्किंग' को वह फेसबुक पर ढूंढता है, उसका असली रूप तो यहाँ इस धूल भरे मैदान में था।
​तभी, धड़ाम! की तेज़ आवाज़ हुई। रावण का पुतला धू-धू कर जल उठा। पूरा मैदान तालियों और जयकारों से गूंज उठा। उस क्षण, हजारों लोगों की ऊर्जा एक हो गई थी। आर्यन ने भी अनजाने में हाथ उठाकर नारा लगाया।
​निष्कर्ष:
वापस लौटते समय आर्यन के हाथ में एक बांसुरी थी और जुबान पर जलेबी का स्वाद।
​उसने दादाजी से कहा, "दादू, आप सही थे। यूट्यूब पर यह शोर, यह खुशबू और यह अपनापन नहीं मिल सकता।"
​दादाजी ने उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा, "बेटा, ज़माना कितना भी आधुनिक हो जाए, मॉल और मल्टीप्लेक्स कितने भी खुल जाएं, लेकिन पट्टी के इस ऐतिहासिक मेले की जगह कोई नहीं ले सकता। क्योंकि मॉल में 'सामान' मिलता है, और मेले में 'समाज' मिलता है।"
​आर्यन मुस्कुरा दिया। उसे समझ आ गया था कि यह मेला केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को जोड़ने वाला सेतु (Bridge) है।
​कथा का सार (Analysis):
​ऐतिहासिकता: कहानी पट्टी के पुराने समय (पेट्रोमैक्स के दौर) और निरंतरता को दिखाती है।
​आयोजन: स्थानीय कलाकारों की रामलीला, प्रशासन की भूमिका और मेलों के पारंपरिक ढांचे (दुकानें, झूले) का वर्णन है।
​आधुनिक प्रासंगिकता:
​तनाव मुक्ति: डिजिटल दुनिया की थकान (Digital Fatigue) से दूर वास्तविक खुशी।
​सामाजिक समरसता: यह मेला आज भी लोगों को शारीरिक रूप से मिलने और सुख-दुख साझा करने का मंच देता है, जो सोशल मीडिया नहीं कर सकता।
​आर्थिक चक्र: स्थानीय छोटे व्यापारियों और कलाकारों के लिए यह मेला आज भी आजीविका का बड़ा साधन है।

अजय कुमार सूरज (बंधवा बाजार)

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