Pinky Kumari 22 Jan 2025 आलेख अन्य 28956 0 Hindi :: हिंदी
यह सवाल कही ना कहीं हम सब से जुड़े है (1) ना जाने समय के साथ बच्चों को अपने माता -पिता बोझ क्यों लगने लगते है जिस माँ ने हमें जन्म दिया आज उसी माँ को हम कहते है माँ तुम कुछ नहीं जानती तुम भोली हो और शायद माँ भोली भी है जो हम जैसे बच्चों को जन्म देती है। और इसी भोले पन में हमें जीवन का सारा ज्ञान , जीवन कि सिख दे जाती है । अच्छे बुरे कि समझ दे जाती है माँ हम जिस उम्र में माँ को बोझ समझते है। सोंचों जरा उसी उम्र में वही माँ हमें अपने कौख में नौ महिने बड़े प्यार से पाली होगी वो भी बिना किसी बोझ के आज माता पिता आस लगाते है कि बस दो पल निकाल कर एक बार मेरे बच्चें हमसे बात करले कुछ नहीं चाहिए उन्हें बच्चे इतने बड़े हो चुके है कि आज उसी माँ में कमिया खोजते नजर आते है। बात नहीं करते क्योंकि अब उनकी दुनिया अलग हो चुकी है। जिस उम्र बच्चें कहते थें कि मेरी प्यारी माँ तुम सिर्फ मेरी हो आज वहीं माँ वृद्धाँ आश्रम में नजर आती है। क्यों हो गयें इतने स्वार्थी हम क्यों भुल गये माँ के प्यार दुलार को हमारी हर जिद को हाँ में बदलने वाली आज हम उसी माँ की एक भी नहीं सुनते सवाल तो बहोत है। आज मन में देखा करती हूँ उन माँओं को जो फुट पात पर मंदिरों के आगे हाथ फैलाए एक आस लेकर कि कोई तो बेटा बेटी मुझे अपना पेट भरने के लिए 10 रु देगा क्या होने वाला दस के एक नोट से पर माँ में एक चिज बहोत कॉमन होती है। वो है सब्र जब ऐसे हालत में उन्हें देखती हूँ तो दिल भर आता है। क्योंकि मुझे हर माँओं में मेरी माँ नजर आती है दुआँ करती हूँ भगवान से अगर एक स्त्री बनऔ तो कम से कम ऐसी हालत तो मत करों क्योंकि आप भी उसी माँ के काँख से जन्में हो दया करो भगवन एक माँ आवाज लगा रहीं है। उसकी सहायता करों समय बहोत कम है पता चले कि आज हम जिस माँ को बोझ समझ रहें है। और बात नहीं कर रहे है। पता चला कि आज वो मुत्यू श्रया पर लेटी है। और हमारे पास पछतावे के अलावा आँसु ही बचे समय निकालों और बात करों पूछों उनसे कि आप कैसे है। क्या चाहते है। आप थोड़ी बचपन कि बाते याद करों थोड़ा समझों अपने माता - पिता को पछतावा ऐसी चिज है। कि ऐसा लगता है। कि किसी ने सौ बार बेलटों से मारा हो चिला भी नहीं सकते और सहना भी पड़ता है। और दिखाई भी नहीं देता (2) आज जीवन का बहोत बड़ा फैसला लेने जा रही थी। में वो है शादी तब याद आया कि जिन्दगी अभी बहोत बाकी है। इतनी जल्दी हार थोड़ी ना माननी है। अभी बहोत कुछ करना जीवन मे यहीं आस लेकर सारा जीवन निकाल दिया जगड़ रखा है। समाज कि सोंच ने जगड़ रखा है। कुछ घर कि जिम्मेदारियों ने तो कुछ बहार के डरवानी घटनाओं ने क्या करू समझ नहीं आता कहाँ जाऊ हर मोड़ पर सिर्फ जनजीरे ही नजर आती जहाँ जाती हूँ बन्द जाती हूँ मानती हूँ जीवन कर्म योग है। पर बन्धन योग तो नहीं ना आखिर में एक सवाल पूछती हूँ अपने आप से क्या यही जीवन है कहते है समझदार को सिर्फ ईशारा ही काफी होता है। उन्हीं ईशारों पर मैंने आज नजर डाली तो पास में देखा कि मेरी जैसी और बहने है जिनकी शादी हो चुकी है बस उन्हीं का जीवन देख रही थी कोई पूछे तो उनसे वो क्या चाहती है। कोई पूछे उनसे कि तुमने खाना खाया , कोई पूछों कि आराम से सों तो पाती है। अब क्या करे डारेक्ट तो हाथ पाव में चैन तो नहीं डाल सकते तो चैन कि जगह होथों मे चुड़िया , पाओं में पायल गले में मंगल सुत्र और सिर पर एक लाल निशान जिसे हम महिलाएँ मांग कहते है इसे यह पता चलता है। कि यह वस्तु बिक चुकी है। और हम महिलाएं बिना कुछ जाने बिना शादी का मतलब जाने इन बेड़ियों को स्विकार कर लेते है। और एक दूसरे को होसला दे कर कहते है। कि में सुन्दर तो लग रही हूँ ना समझों कुछ तो सवाल करों अपने आप से (3) चलो कुछ पुरुषों पर बात करले वो भी इसी धरती का हिस्सा है। उनको देख कर यही लगता है। कि राहु उनके कुण्डलियों मे वास कर चुका है। कुछ ऐसी चुनीदा महिलाएं जो उन्हें जिने पर मजबुर कर रही है। पुरुष वर्ग तो इस समय महिलाओं से ज्यादा शोषित वर्ग बनते जा रहा है। बस हम महिलाएँ अपने मन कि कह देते है। पर पुरुष कहाँ जाएँ पुरुष तो कानून को भी नहीं कह सकता क्योंकि वहाँ पर भी बोलने के लिए कानूनी नीयम चाहिए वो अधिरकार भी खो चुका है। दुनिया एक जाल है। जिसमें कोई सुखी तो कोई दुःखी कोई हसता है। तो कोई रोता है। किसी के पास इतना धन है। कि पानी कि तरह बहाएं जा रहे है। तो कही खाने के पैसे नहीं है कहीं महिला शोषित है। तो कहीं पुरुष कोई भी सुखी नहीं है। भगवान कि बनाई दुनिया भगवान ही जाने यह भी जाल है। अगर सही करने चलोंगे तो खुद ही फस जाओंगे (4) जीवन एक समझोता है। इसमें जब तक ताल मेल बैठा कर नहीं चलेगे तब तक इसे जिया नहीं जायेंगा कभी बोझ लगेगी कभी इतनी आसान लगेगी कि हमसे ज्यादा कोई सुखी नहीं है। किसी वस्तु से या व्यक्ति से इतना मत जुड़ों कि वह चली जाए तो हमें रोना पड़े कुछ भी अपना नहीं है। और कोई पराया भी नहीं है। जब हम जन्म लेते है। तो तभी हमसे ना जाने कितने अनजाने रिश्ते जुड़ जाते है। और मरने के बाद वही रिश्ते अपने आप पिछे रह जाते है। रह जाता बस तुम्हारे द्वारा किये जाने वाले कर्म तुम्हारे द्वारा किया जाने वाला व्यवाहर, बस यही व्यवहार बताते है। कि तुम कैसे थे। जब एक इंसान अपने आपको किसी से बान्ध लेता है। अब वो चाहें प्रथायों हो , यहाँ ऐसे नियम हो जो जिवन जिने में मान्य नहीं है। फिर भी हम बन्धे जा रहें है। बन्धों मत किसी से अपने आपको जनजीरों में मत जकड़ों वरना जीवन हमें घुटन लगने लगेगा और जहाँ घूटन लगने लगे जमझ जाना कि तुम कहीं गलत रस्ते पर चले गयें हो या जाने वाले हो तो रुक जाना और देखना कि कहाँ गलती हो रही है। क्या मेरे लिए यह सही है। बस एक शब्द बोलना रुक जा ऐसा कोई नियम नहीं है। जो तुम्हें बांधे तुमही हों जो स्वयम को बाधने पर मजबुर करते हों गहरी सांस लो और भगवान का नाम लेकर रुक जाना बस इतना ही करना है। अगर आप समझदार होंगे तो स्वयम ही समझ जाओंगे कि जिवन में और हमारे आस - पास चल क्या रहाँ है। धन्यवाद शायद यह लेख आपको पसंद आया होगा अगर लिखते जाऊंगी तो बहोत लम्बा लेख बन जायेगा अभी तो बहोत लिखना है। लिखने का सिल सिला जारी रहेगा ✍️✍️🙏🙏
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