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My Father

Afsana wahid (moin raza ghosi) 05 Jun 2025 आलेख प्यार-महोब्बत Afsana wahid ,poetry,quts 24901 0 Hindi :: हिंदी

My Father – एक खामोश रहनुमा

हर इंसान की ज़िन्दगी में कुछ रिश्ते बग़ैर दावे, बग़ैर शोर के अपनी मौजूदगी साबित करते हैं। मेरे लिए वो शख्स मेरा अब्बू है — एक ऐसा साया जो हमेशा मेरे सर पर रहा, बग़ैर किसी शर्त के।

अब्बू का तरीका बहुत सीधा-सादा है। ना ज़्यादा बोलना, ना फुज़ूल बातों में वक़्त ज़ाया करना। मगर उनके एक-एक लफ़्ज़ में हिकमत होती है। वो कम बोलते हैं, लेकिन जब भी बोलते हैं, तो ऐसा लगता है जैसे दिल के अंदर तक कोई बात उतर गई हो।

जब लोग पूछते हैं कि मैं आज जो कुछ भी हूँ, उसका क्रेडिट किसे देती हूँ — तो मेरी आँखों में सिर्फ एक ही चेहरा आता है: अब्बू का। उनकी मोहब्बत, उनकी दुआएं, और उनकी खामोश मेहनत ने मेरी ज़िन्दगी को वो रास्ता दिखाया जिसे मैं खुद कभी नहीं चुन पाती।

मैंने अब्बू को कभी थकते नहीं देखा। चाहे सर्दी हो या गर्मी, मुश्किल हालात हों या ज़िन्दगी के इम्तिहान — उन्होंने कभी शिकायत नहीं की। उनके हाथों की लकीरें आज भी उनकी मेहनत की गवाही देती हैं।

अब्बू ने मुझे सिखाया कि इज्ज़त कमाई जाती है, खरीदी नहीं जाती। उन्होंने समझाया कि ख़ुद्दारी क्या होती है, और कैसे बग़ैर किसी के सामने झुके भी एक इंसान दुनिया में अपना मुकाम बना सकता है।

आज जब मैं अपने सपनों के पीछे भागती हूँ, तो हर क़दम पर उनकी दुआओं की छांव महसूस होती है। उनका साया आज भी मेरे साथ है, जैसे वो कहते हों:
"बेटी, डर मत, मैं हूँ ना।"




वो लफ़्ज़ नहीं कहते, मगर सब कह जाते हैं,
अब्बू भी क्या अजीब मोहब्बत निभाते हैं।

माँ की दुआ जैसे अल्फ़ाज़ में होती है,
अब्बू की दुआ तो खामोशियाँ सुनाती हैं।

छांव बन के हर तपा देने वाली धूप में साथ रहते हैं,
ख़ुद जलते हैं मगर हमारे लिए साया रहते हैं।

ना शिकवा, ना गिला, बस फ़र्ज़ की मिसाल हैं,
अब्बू किसी किताब की नहीं, ज़िन्दगी की मिसाल हैं।

तूने जो किस्सा बताया है — वो सिर्फ एक याद नहीं, एक जज़्बा है… अब्बू की मोहब्बत, उनकी सोच, और उनकी फ़िक्र का आईना है। मैं इसी वाक़ए पर एक शायरी नुमा जज़्बाती टुकड़ा लिख रहा हूँ — तेरे ही स्टाइल में, जो सीधा दिल के अंदर तक उतर जाए:

मैंने सोचा था Father’s Day पर ख़ुश कर दूँ अब्बू को,
एक घड़ी दी थी, तोहफ़े में — अपने दिल से, पूरे शौक़ से।

मगर वो मुस्कुराने के बजाए थोड़ा ख़ामोश हो गए,
आँखें नरम, लहजा सख़्त — और बोले:
“बेटा, अपने पैसे फ़ालतू में मत उड़ाओ।
वक़्त जब मुश्किल आएगा, ये बचत ही काम आएगी।”

फिर सर पर हाथ रखा, जैसे सारी नाराज़गी बहा दी हो,
और मैं… मैं वहीं ठहर गई…
आँखों से आंसू गिर पड़े —
क्योंकि उस एक लफ़्ज़ में, हज़ार दुआएं थीं।



"Father’s Day पर मैंने अब्बू को एक घड़ी गिफ्ट की थी...
सोचा था ख़ुश हो जाएंगे, सर पर हाथ फेरेंगे, मुस्कुराएंगे।

मगर वो थोड़े नाराज़ हो गए...
सर झुका के बोले —

'बेटा, अपने पैसों को फ़ालतू में मत उड़ाओ...
ये पैसे ही कल तुम्हारी मुश्किल में काम आएंगे।'

फिर जैसे सब ग़ुस्सा भूल कर,
सर पर हाथ रख दिया...

और मेरी आँखों में आँसू आ गए...
क्योंकि अब्बू ने फिर वही किया —

मोहब्बत दिखाई... अपने ही अंदाज़ में।"



“अब्बू की मोहब्बत लफ़्ज़ों में नहीं, लहजे में होती है...
जो समझ ले, वो सारी दुनिया जीत ले।”

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Writter Afsana wahid

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