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हिन्दू धर्म ग्रन्थों की सत्यता और उनका वैज्ञानिक महत्व

Anesh Gautam 16 Dec 2025 आलेख धार्मिक हिन्दू धर्म ग्रन्थ, वेदों का वैज्ञानिक महत्व, हिन्दू धर्म की सत्यता, प्राचीन भारतीय विज्ञान, धर्म और विज्ञान, वेद और विज्ञान, उपनिषद सत्यता, हिन्दू धर्म और विज्ञान, धार्मिक ग्रन्थों की वैज्ञानिक व्याख्या, सत्य और आस्था 12198 0 Hindi :: हिंदी

संग्रहकर्ता के तरफ से
प्रिय पाठकगण यह पुस्तक अनेक ग्रंथों से छांट कर लिया जा रहा है। जो वास्तव में ग्रंथ से लिया गया है। उस ग्रंथ का नाम अध्यात्म ग्रंथ, स्कन्ध ग्रंथ, श्लोक ग्रंथ, इस में दिया गया है। पुस्तक बहुत ही सीमितों में छपी गयी अत: आप विस्तृत जानकारी के लिये मुख्य पुस्तक को इस पुस्तक के माध्यम से देखने का कष्ट करावें, पुस्तक मोटी होगी बेचने में कष्ट होगा इसीलिए छांट किया गया है। इस पुस्तक मोटी भी जाएगी पर पुस्तक के अन्य अंगों के जो ज्ञान मिलता इत्यादि चीजें इस पुस्तक में शामिल नहीं रूपी पायेंगे अत: आप से निवेदन है कि आप विस्तृत जानकारी के लिए मुख्य पुस्तक को ही देखवे में एक बहुत ही हो विहित यानि भारी पुस्तक है अत: इसमें की कृपा दृष्टि पायेंगे। अगर आप इच्छा कर सके तथा दृष्टि के बारे में अवगत कराने की वापस सौगात।

संग्रहकर्ता तरफ से: हरिप्रसाद चौधरी

आवश्यक बातें
आजकल हमारी जनता के लोगों में धर्म के बारे में बातचीत होती है। जब वहां पर आप दो प्रकार के लोग तो मिलते है। एक धर्म की बड़ी प्रचार करने वाले और दूसरे जो होने वाले के खिलाफ होते हैं। जो धर्मम के ऊपर गाली और आलोचनाएं करना इन लोगों का बहुत पापी, नास्तिक, दुष्ट आदि कहिले अगर कहीं-कहीं तो लोग मारते-पीटते पर भी उतार लेते हैं और आप राम का गुणगान करते हैं तो आप के धर्मात्मता एवं पवित्रता की प्रशंसा करते हैं। हिन्दू धर्म के ग्रंथों को लोग जाना चाहते है पर भयावह विचारों के डर के कारणवे और प्रमाणिक बातें को सुनन में एत्सरस नहीं करते, वे लोग यह सोच लेते हैं कि उनकी उद्धार होने से लोगों में फैला हुआ अंधविश्वास खत्म नहीं हो सकता। जिस पुजारी वर्ग जो धर्म के नाम पर जनता का शोषण करते रहे हैं उनको यह लगता ही अंधविश्वास खत्म होने से जनता उनकी पैर की जूतियाँ बना देगी इसलिये वे दिन रात पूजा-पाठ तथा बुद्धिजीवी वर्ग का आगे आना बहुत जरूरी है। यही हमारा प्रयास है और जनता से निवेदन है कि समाज के कल्याण के लिए बुद्धिजीवी वर्ग भी आगे आये।

क्योंकि हिन्दू धर्म ग्रंथः
अपराधियों का बढावा देता है जैसे हमारे पुजारी एवं धर्मशास्त्रियों का कथन है कि मनुष्य के सभी पाप गंगा स्नान, तीर्थदर्शन, कथा भागवत सुनने, राम नाम गाने तथा पूजा करने घर पर संध्या करके के पाप क्षुभ एवं कई प्रकार के क्रोध तीन दिन पर व्यापार में चोरी, बेईमानी, चार से सोते, प्रहरण, लूटमार, शराब, ग़ांजा, भांग, जुआ, माँस, डकैती, वेश्यावृत्ति आदि इस अत्यंत अपराध करता है। वह करता ही रहता है। क्योंकि वह समझता है कि हमारे ग्रंथ रामायण में भ्रष्‍ट, बेईमान...

व घूसखोर है। इसलिए यह काम करता रहता है और पूजा-पाठ, गंगा स्नान, तीर्थदर्शन व कथाओं भगवान के चापलूसी करता रहता है, और वह समझता है कि भगवान हमारे सभी पापों को माफ करता जा रहा है। इस तरह से हिन्दू धर्म ग्रंथ अपराधियों का बढ़ावा देता है। इस व्यवस्था के चलते ईमानदारी चरित्र पवित्रता का कोई मतलब नहीं हो जाता है।

धर्म गुरुओं ने अपने स्वार्थ के लिए समाज की कभी कोई परवाह नहीं की, जो धर्म ग्रन्थ पढ़ने के बोलते के लिए बनाई गयी हो। उसका कोई अर्थूल्य नहीं हो सकती है। अब आप सब समाज की भलाई के लिए आगे आये यही हमारी आपसे विनती है।



संग्रह कर रहा हूँ, धर्मानुसार से, प्रियेकर तुम्हें बतलाने को।

हे मानस के राजकुमार, तुम भूल न जाना मुझे समझाने को।



प्रिय पाठक गण यह पुस्तक आपको कैसी लगी। अगर आपको पसन्द आई हो या न पसन्द आई हो, तो भी, न पसन्द आने का कारण अवश्य लिखकर भेजने की कृपा करें। जिससे अगली पुस्तक आपके पसन्द के अनुसार संग्रह किया जा सके।



आपका

हरिप्रसाद चौधरी

शुभकामना
प्रस्तुत पुस्तक हिन्दू धर्म ग्रंथों की सत्यता एक अनोखा संकलन है, जिसके माध्यम से लेखक ने तमाम तथाकथित ग्रंथों से सत्यांश निकालकर दस्तावेज के रूप में जनमानस पटल पर रख दिया है। इस पुस्तक द्वारा पहले जाने तब मानने का सिद्धान्त को बल मिलेगा और धर्म के घने बादलों का पोल खुलेगा।

हमें आशा और विश्वास है कि इस पुस्तक द्वारा समाज में फैले अंधविश्वास सफमत्कार और पाखण्ड से लोगों को मुक्ति मिलेगी और लोग सत्यांश के मार्ग पर चलकर एक नये निर्माण में लगेंगे।

प्रकाशक

बड़जन साहित्य प्रसार केन्द्र, नागपुर

क्या आप हिन्दू हैं?
प्रारम्भिक मुस्लिम शासन काल में मुगलों द्वारा दिया गया नाम हिन्दू, को हमने उसी प्रकार से अपना लिया जिस प्रकार से अंग्रेजों द्वारा दिया गया नाम इंडियन। अंग्रेजों ने हमारे देश का नामककरण किया और भारतवर्ष का नाम बदलकर इंडिया रख दिया, जिससे हम इंडियन हो गये और आज हम अपनी पहचान को इंडियन कहने में बहुत गर्व महसूस करते हैं। उसी प्रकार जब हम गुलाम थे, तो हमें मुगलों द्वारा दिया गया नाम हिन्दू था। ठीक उसी प्रकार मुगलों द्वारा दिये हुए नाम हिन्दू को भी बड़े गर्व से हम अपनाते हैं कि हम हिन्दू हैं, हम हिन्दू हैं।

लेकिन क्या हमने कभी पहले यह अच्छी तरह से जान लिया कि हिन्दू शब्द का अर्थ क्या है? क्यों और कैसे यह नाम पड़ा? प्रत्येक व्यक्ति के लिये आवश्यक है कि हिन्दू शब्द और धर्म का अर्थ जान लिया जाये, क्योंकि प्रत्येक व्यक्ति उसी प्रकार जीवन भर आचरण करता है और वह उस धर्म पर विश्वास रखता है, जिस प्रकार का नाम और अर्थ जानता है। और वह जीवन भर उसी जाति, उस वर्ग, उसी नाम के अनुसार ही कार्य करता है और वह उसी प्रकार के सम्प्रदाय में सम्मिलित हो जाता है। जिसका ताजा उदाहरण बाबासाहेब आंबेडकर, महात्मा फुले, शूड्रक महाराज तथा माननीय मुख्यमंत्री मायावती हैं, तो क्या हमने कभी सोचा कि हिन्दू नाम का किसी व्यक्ति के जीवन पर कितना प्रभाव डालता है। ठीक उसी तरह से उस व्यक्ति का नाम और धर्म प्रभावित किये बिना नहीं रहता है।

इसलिये हमें हिन्दू कहने से पहले उसे अच्छी तरह से जान लेना अति आवश्यक है कि हिन्दू का अर्थ क्या होता है।
प्राचीनकाल में युग में सत्य सनातन वैदिक धर्म था। यह कब, क्यों और कैसे यह हिन्दू और हिन्दू धर्म बना इसका प्रमाण आगे पुस्तक में आगे मिलेगा। पाठकगण को पहले पृष्ठ पर ही ध्यान देना चाहिये कि किसी भी लेखक के किसी भी मोटी या पतली पुस्तक के दिये गये उसे सत्य नहीं मान लेना चाहिये बल्कि उसमें उसके पक्के प्रमाण न हो। इसलिये पाठकगण को पक्के प्रमाण इसी पर्व में दिये जा रहे हैं।

मुगलों के आने के पहले यहाँ कोई हिन्दू नहीं था। मुसलमानों ने ही हमें हिन्दू नाम दिया। इस बात का प्रमाण इस पुस्तक में स्पष्ट रूप से बाद में मिलेगा। पहले हम यह प्रमाण पुस्तकों में देखते हैं कि कहीं लिखा हुआ है कि नहीं। ऋग्वेद, सामवेद, यजुर्वेद, अथर्ववेद, श्रीमद्भागवत अथवा पुराण। एक भी वीथ स्मृतियों

हिन्दू धर्म ग्रन्थों की सत्यता / ५
में कहीं भी हिन्दू शब्द लिखा हुआ नहीं मिलता है। वेदांत ग्रन्थों रामायण, महाभारत इतिहास ग्रन्थों में भी कहीं हिन्दू शब्द का उल्लेख नहीं है। जैन, बौद्ध ग्रन्थों में तथा रघुवंश काव्य और शाकुन्तल नाटकों में भी हिन्दू शब्द का कहीं नाम नहीं आया है। इसके साथ-साथ कालिदास, शंकराचार्य तथा आदि ग्रन्थकार मानस जिसके रचना आज हज़ारों से लगभग चार सौ वर्ष पहले हुई थी, उसमें भी हिन्दू शब्द खोजे से कहीं नहीं मिलता है। तो फिर यह हिन्दू शब्द और कहाँ से आया यह जानना अति आवश्यक है।

इतिहासकारों के अनुसार जब मुग़ल आक्रमणकारी हमारे देश को लूटने आये और जब वे यहाँ की शासन व्यवस्था में बैठ गये तब यहाँ के मूल निवासियों को वे घृणा सूचक शब्द हिन्दू नाम से सम्बोधित करना प्रारम्भ कर दिया। जिस तरह से अंग्रेज भारत में आये और वहाँ के मूल निवासियों को "ब्लैक" अर्थात् कालिख, काला कहने लगे, और दूसरे देशों में जहाँ के मूल निवासी रहते थे, मजदूर वर्ग में भी भारतीय वहाँ गये तो उनकी कुली कहा जाने लगा अर्थात कुली नाम से पुकारा जाने लगा। ठीक उसी प्रकार से जब मुसलमान भारत में आये, तब उन्होंने भारतीयों को हिन्दू नाम से पुकारना प्रारम्भ किया।

यह जातिगत कुलीन होने के कारण मुसलमानों द्वारा दिया गया घृणास्पद शब्द पड़ गया। जिस तरह से किसी झूठ को बार-बार दोहराया जाए, तो वह सत्य जैसा लगने लगता है, उसी तरह से हिन्दू शब्द भी बार-बार दोहराए जाने के कारण सत्य प्रतीत होने लगा। ठीक उसी तरह से किसी व्यक्ति को बार-बार गधा कहो तो वह सुनने में तो उसे गधा सुनाई देगा और अन्त में वह स्वयं गधा समझने लगेगा। जबकि हिन्दू शब्द का मूल अर्थ ही ग़लत है।

फारसी और अरबी भाषा में इसका अर्थ होता है — चोर, डाकू, गुलाम। क्योंकि उस काल और अरबी भाषा में भी हिन्दू शब्द का यही अर्थ है। इसी अर्थ में यह शब्द प्रयोग हिन्दुस्तान के लिए करते थे। वह कभी एक मुस्लिम शासक दूसरे मुस्लिम शासक को गुलाम कहता था क्योंकि वह कहता था उसकी प्रजा अर्थात उसकी जनता गुलाम होती थी। और वे हिन्दू कहकर पुकारते थे। ठीक उसी तरह से जब मुसलमानों ने हमारे भारतवर्ष पर आक्रमण करके यहाँ के लोगों को अपना गुलाम बना लिया तब वे लोगों के नाम के साथ वही शब्द लगाने लगे। जिसका फारसी तथा अरबी भाषा में अर्थ होता है — गुलाम।

मुसलमानों के शासन काल में भारतवर्ष गुलाम बना और इसी गुलामी के कारण किसी प्राचीन पुस्तक में हिन्दू शब्द नहीं मिलता। उसी गुलामी के कारण यह नाम गढ़ा गया। इस तरह से यह शब्द गुलामी का प्रतीक है। अगर हम अपने आपको हिन्दू कहते हैं तो इसका मतलब यह हुआ कि हम अपने आपको गुलाम कहते हैं।

वास्तव में जो लोग स्वयं हिन्दू कहलाते हैं, वे स्वयं अपने को हिन्दू नहीं मानते यह अलग बात है कि वे अपने आपको हिन्दू समझते हैं। किन्तु जब उनसे पूछा जाये कि हिन्दू धर्म क्या है, तो लगभग 90% लोग यही कहेंगे कि हमें मालूम ही नहीं कि हिन्दू धर्म क्या है। वे अपने को केवल हिन्दू कहते हैं, जिसकी उन्हें आदत पड़ गई है, और आर्यों के आगमन के बाद से हमारे भारत में इस शब्द का प्रचलन बढ़ गया है।

इस प्रकार आर्य-हिन्दू एक कल्पना मात्र है। जिसका इतिहास में कहीं उल्लेख नहीं है और न ही हमें मालूम है।

६ / हिन्दू धर्म ग्रन्थों की सत्यता
हिन्दू धर्म का इतना जोर-शोर से प्रचार-प्रसार क्यों किया जा रहा है जबकि यह हिन्दुओं का ही देश है। और यह हँसते नहीं कर रहे हैं कि हम हिन्दू धर्मी हैं, जैन धर्म वाले, सिख धर्म वाले, इस्लाम धर्म वाले अलग-अलग धर्म रखकर रह रहे हैं जबकि यह सब आर्यसमाजवादी हैं। तो फिर हमें अपने धर्म का ही इतना हल्ला क्यों मचाना पड़ रहा है, यह भी विचारणीय प्रश्न है। इसका मुल्यांकन करना चाहिए। यह वही मूलनिवासियों को जानना अति आवश्यक है और यह जानने के लिए हमें लगभग 90 वर्षों के इतिहास के पन्नों में जाना पड़ेगा।

सारी दुनिया में साम्यवाद फैला हुआ था। 1917 ई. में रूसिया में साम्यवाद क्रांति हुई, उसके बाद से क्रांतिकारी लहरें आईं। भारत में कम्युनिस्ट पार्टी की स्थापना 17 अक्टूबर 1920 ई. को तास्कंद में एम.एन. राय (नरेन्द्र राय भट्टाचार्य) ने की।

इस प्रकार से हम देखते हैं तो 1917 के बाद तथा 1925 के अन्दर साम्यवाद और समाजवाद का विचार भारत वर्ष में आया। साम्यवाद व समाजवाद एक ही विचारधारा है, जिसे रूसिया भाषा में बोल्शेविक कहा जाता है। रूसिया भाषा में बोल्शेविक सर्वहारा वर्ग अर्थात मजदूर वर्ग का नेता होता है जो उत्पादन करने वाले श्रमिक वर्ग के हित में कार्य करता है। यह शोषित और शोषक के बीच में आर्थिक असमानता को समाप्त करने का विचारधारा है। इस विचारधारा में भारत में भी 1917 ई. के बाद विचारधारा का आगमन हुआ।

लेकिन भारत में यह विचारधारा केवल शूद्र-अतिशूद्रों के हित की नहीं थी, बल्कि सवर्णों के हित की विचारधारा बन गई।

इसका कारण यह था कि 1917 ई. के पहले भारत में शूद्र-अतिशूद्रों को कोई राजनीतिक अधिकार या मतदान का अधिकार नहीं था। लेकिन सवर्ण लोगों को वोट देने का अधिकार था। 1917 में आन्दोलन शुरू हुआ कि सभी लोगों को वोट देने का अधिकार होना चाहिए। उस समय भारत ब्रिटिश हुकूमत के अधीन था क्योंकि उस समय ब्रिटिश शासन कर रहा था। लेकिन भारत में खतरे की घंटी बज चुकी थी क्योंकि भारत में अंग्रेजों का राज है और सवर्ण इस बात को जानते थे कि आज नहीं तो कल भारत में स्वतन्त्रता लग जाएगी। परिणाम यह होगा कि जब भारत में शूद्र-अतिशूद्रों को वोट देने का अधिकार हो जायेगा तो वे बहुसंख्यक हैं। जिसके कारण प्रजातंत्र में भी शूद्रों का राज हो जायेगा। अर्थात शूद्रों का राज हो जायेगा, सवर्णों का नहीं। इस विचार को ध्यान में रखकर शूद्रों और अतिशूद्रों को अपने पक्ष में लेने के लिए सवर्णों ने हिन्दू धर्म का प्रचार-प्रसार किया। उन्होंने हिन्दू धर्म का नाम देकर शूद्र-अतिशूद्रों का नेतृत्व अपने हाथ में रख लिया, तो प्रजातंत्र में भी सवर्णों का नियंत्रण हो।

आगे चलकर वर्ण व्यवस्था और जाति व्यवस्था सवर्णों के नेतृत्व में हो। यही सोच करके सवर्णों ने हिन्दू धर्म का प्रचार 1922 में पिछड़ी जातियों के लोगों को अपने वश में करने के लिए हिन्दू महासभा की स्थापना की। जिसका नेतृत्व सावरकर ने किया और 1925 में आर.एस.एस. की स्थापना की। सन् 1920 ई. में जब कम्युनिस्ट पार्टी की स्थापना हुई।

हिन्दू धर्म ग्रन्थों की सत्यता / ७
जबकि सवर्ण कहते थे कि हिन्दू शब्द मुग़ल मुसलमानों द्वारा दी हुई गाली है। 1875 में दयानन्द सरस्वती ने आर्य समाज की स्थापना करने के बाद कहा था कि हिन्दू शब्द मुसलमानों द्वारा दी गई गाली है। तो सवर्णों ने उस गाली को हिन्दू धर्म का नाम क्यों दिया जबकि सवर्णों को हिन्दू का हिन्दू धर्म का नाम नहीं देना चाहिए था। फिर भी ऐसा हुआ क्योंकि सम्पूर्ण दुनिया के सबसे ज़्यादा परिवर्तनकारी लोग हैं — वे अपने लिए सबसे ज़्यादा परिवर्तनकारी हैं। और मूलनिवासियों के परिवर्तन से बिल्कुल उल्टे हैं। उनके लिए सबसे ज़्यादा परिवर्तनकारी होने के कारण उन्होंने मुग़लों द्वारा दी गई गाली को स्वीकार कर लिया और उसी गाली को अपनी बहुसंख्यकों का सम्पूर्ण हितार्थ कर सके। यही सिद्दान्त पर सवर्णों ने हिन्दू शब्द को स्वीकार कर लिया और समाजवाद व साम्यवाद के नाम पर सवर्णों ने बहुसंख्यकों का नेतृत्व ग्रहण कर लिया।

आज तक सवर्णों ने और जब तक अल्पसंख्यक सवर्ण रहेंगे तब तक वे प्रजातंत्र में अपना वर्चस्व स्थापित रखेंगे। इसीलिए उन्होंने प्रजातंत्र और समाजवाद का नाम लेकर अपने हित में हिन्दू शब्द को अपना लिया ताकि मूलनिवासियों में भ्रम फैला रहे।

इसी उद्देश्य से सवर्णों ने आर्य समाज और हिन्दू महासभा की स्थापना की।

चारों तरफ हिन्दू धर्म का प्रचार-प्रसार कर रहे हैं, जिससे लोग हिन्दू के नाम के नाम पर हमारा समर्थन करते रहें और हम सत्ता में बने रहें। इसलिए ही सवर्णों ने मुग़लों द्वारा दी गई गाली को स्वीकार किया और 1922 में हिन्दू महासभा की स्थापना करके हिन्दू से हिन्दू धर्म बना दिया।

दोस्ती करके दुश्मनी हम निभाना जानते हैं।

अब जात जानते हैं तो जात हम भी विज्ञान जानते हैं।

अब सम्प्रदाय जानते हैं तो जात हम भी विज्ञान जानते हैं।।

जो सर झुकतों ऐ, वह तलवार भी उठाना जानते हैं।

बहुत लिखा इतिहास उन्होंने अब नया इतिहास बनायेंगे।

होगी मूल निवासियों के हाथ में सत्ता, हम मानवता का बिगुल बजायेंगे।।

रहो बेसुध, गुलाम बेच दो, ये हैं शैतान धरती बेच देंगे।

सम्पूर्ण जागों ऐ मूलनिवासियों, वरना ये तेरे शव का कफ़न बेच देंगे।।

अध्याय 1
मांसाहारियों का वर्णन

राम, लक्ष्मण, सीता का मांस खाने का वर्णन का वर्णन —

राम लक्ष्मण से पूर्ण कुटी बन जाने पर कहते हैं —

ऋष्यं मांसमाहारं शालां यक्ष्यामहे वयम्।

कर्तव्यं वास्तुशान्तिश्च सीतानिर्वृतिमिच्छता।।

मृगं हत्वाSSप्रसाद्यैनं लक्ष्मणं शुभलक्षण।।

कर्तव्यं शास्त्रदृष्टेन विविधेन मृगयाविधिः।।

(बा.रा. अयोध्या काण्ड सर्ग 56)



अर्थात —
 हे लक्ष्मण! हम मृगमांस का इस पर्णशाला की वास्तु शांति करें, यह शुभलक्षण वाली सीता प्रिय होगी। उन्हें वास्तुशांति अवश्य करनी चाहिए। इसलिए मृग (हिरण) को मारो और मांस लेकर आओ। धर्म शास्त्रों में निर्दिष्ट है। तुम धर्म शास्त्र का अनुसरण करो और तुम कर्तव्य पालन में तत्पर रहो।



सीताहरण के समय रावण से कहती है —

आगमिष्यति मे भार्या वन्यमानाय पुष्पकम्॥२२॥

रूक्षं गोमांबरहारं हत्वा नाड्वासमिष्यति बहु॥२३॥

(बा.रा. अरण्यकाण्ड) सर्ग 46)



अर्थात — 
वह, गौ, गधे और जंगली सूअर आदि हिंसक पशुओं का वध कर तपस्वियों हेतु के उपयोग में आने योग्य बहुत सा फल फूल लेकर अब भी आयेगा।

(उस समय आप का विशेष सत्तर्क होना होगा)।

भारतवर्ष के आरंभ में सुरा, मांस, मद्य की मुखरता से भरका स्वागत — प्रमाण

सुरा सुपानं पितृपूजाय च दुहितृकः।

मांसानां च सुभक्षणं भक्षयन्ति यो यदिष्टकृतिः॥५२॥

(बा.रा. अयोध्याकाण्ड सर्ग 91)



अर्थात — 
सुरापान करने वाले मद्यपों के लिये सुरा, भूखों के लिये खीर तथा मांस के आदि करने के लिये मांस भोज्य पदार्थ अर्थात जिन की जैसी इच्छा हो, वे।



हिन्दू धर्म ग्रन्थों की सत्यता / ९
वैसी खाने पीने की चीज ले ले, इस की व्यवस्था थी।

राम चरित मानस में संक्षिप्त वर्णन :

बंधु सखासंग लेहि बोलाई, वनमृगया नित खेलहिं जाई।

पावन मृग मारहिं जियं जानी, दिन प्रति नृपहिं देखावहिं आनी।।

विधि मृगन्ह कर आमिष राँधा, तेहि महुँ बिप्र मांसु फल सांढा।

अर्थात : अनेक प्रकार के मृगों का मांस पकाया गया पर उसमें नीच आदमियों ने बाहाणों का मांस मिला दिया।

सीता का गंगा से शराब और मांस पूजा करने का वचन देना-

सुराघट सहस्रेण मांस भतोदनने च।

यक्ष्ये त्वं प्रीयता देवी पुरी पुनरुपागता॥189॥

(वा.रा. अयोध्याकाण्ड सर्ग 52)



नोट : 
गंगा जैसी सात्विक नदी की पूजा के लिए भी शराब और मांस उपर्युक्त सामग्री बन गयी थी, सीता गंगा पार करके ज्यों ही बिदा होने लगी, वह गंगा से वादा करती हैं, हे देवि मैं अपनी राम नगरी को वापस आ कर तुम्हारी शराब के हजारों घड़ों और मांस मिश्रित औदन (भात) से पूजा करुँगी।



सीता राम के मांस खाने व शराब पीने का वर्णन- आकर राजा बन जाते है।

जब राम रावण को मार करके अयोध्या वापस -

सीतामदायहस्तेन मधु मैरेयकं शुचि

पाययामास काकुत्स्थः शचीमिव पुरंदर ॥118॥

अर्थात : जैसे देवराज इन्द्र शची को सुधापान कराते हैं उसी तरह कुकुत्स्थभूषण श्रीराम ने अपने हाथों से सीता को शराब पिलाया।



मांसानि च सुमुस्तानि फलानि विविधानि च।

रामस्याभ्यवहार्यार्थं किंकरास्तूर्णमाहरन्॥119॥

अर्थात : सेवक गण श्री राम के भोजन के लिए वहां तुरन्त ही मांस मीठा फल राजोभोग्य पदार्थ (भांति-भांति की रसोई) ले आये।

उपानृत्यांश्च राजानं नृत्यगतिविशारदा:।

अप्सरोगंधाश्च किंनरोपरिवर्तिता:॥120॥

(वा.रा. उत्तरकाण्ड सर्ग 42)



अर्थात : उस समय राजा राम के समीप नृत्य और गीत की कला में निपुण अप्सराये और नाग कन्याें किन्नरियों के साथ मिल कर नृत्य करने लगी।

नोट : जो राम सीता मांस खाते व शराब पीते थे और अप्सराओं किन्नरियों का नाच गाना सुनते थे। उन्हें पुरुषोत्तम नहीं कहा जा सकता है।

राजा दशरथ के पुत्रेष्टि यज्ञ में ३०० पशु की बलि प्रमाण - राजा दशरथ ने राम लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न को पैदा करने के लिए पुत्रेष्टि यज्ञ



१० / हिन्दू धर्म ग्रन्थों की सत्यता
किया था जिसमें 300 पशु बाधे गये थे।

पशूनां त्रिशत तत्र पूपेष नियतं तदा ।

अश्वरत्नोत्तमं तत्र राज्ञो दशरथस्यह।।32।।

कौरल्या त हत्यं तत्र परिचय समन्ततः।

कृपाणैविर्ससौरनं त्रिभिः परमया मुदा ।।33।।

पतचिणा तदा सार्थे सुस्थितेन च चेतसा ।

अवसद् रजनीमेकां कौश्ल्या धर्मकाम्यया ।। 34।।

होताध्वर्युस्त योन्दाता हस्तेन समयोजन्।

महिषया परिवृत्याथ बाधातानपशं तथा।।35।।

पतत्त्रिणस्तस्य वपामुद्यत्य नियेतन्द्रियः।

ऋत्क्पिरमसम्पन्नः श्रपयामास शास्त्रतः ।।3611

धूमगन्ध वपायास्त जिघ्रति स्म नराधिपः।

यथाकाल यथान्यायं निर्णदन् पापमात्मनः ।।3711

(बा.रा. बालकाण्ड सर्ग 14)



अर्थात : कौशल्या ने तीन बार तलवार चलाकर घोड़े का बध किया उस घोड़े की चरबी को ऋत्विक (ऋष्यश्रंग) ने शास्त्र विधान के अनुसार पकाया, उसकी गंध सूघने से राजा दशरथ के सब पाप नष्ट हो गये।



बाह्मणवैदिक युग में ईद की तरह गोमांस खाते थे प्रमाण :

सवत्सरं पु गव्येन पयसा पायसेन च।

वार्धीणसस्य मांसेन तृप्तिद्वविशं वार्षिकी।। 27111

(मनुस्मृति अध्याय 3)
अर्थात : गाय, बर्थी का मांस तथा दूध व दूध से बनी चीजों से पितरों का तर्पण करने से वे 22 साल तक तृप्त रहते हैं।



वृहदरण्योपनिषद में : लिखा है कि गुणी पुत्र की प्राप्ति के लिए गाय व सांड का मांस खाना चाहिए। जो मनुष्य चाहे कि मेरा पुत्र पण्डित, शीलवान, सभा को जीतने वाला, वेदों का व्याख्याता तथा पूरी आयु वाला हो तो, उसे पत्नी के साथ सांड व बैल का मांस घी भात के साथ खाना चाहिए।



प्रमाण-अथय इच्छछेत्पुत्रों मे पंडितो विगीतः।

शुभ्रषितां वाच भाषिता जायेत सर्वान्वेदाननुब्रवीत् सर्वमायुरियादिति मांसौदनं पाचाचित्वा सर्पिभन्तम

श्नीयातामीश्वरौ जनयित्वा औक्षेण वार्षभेण वा। (6,4,18)

तैत्तरीय ब्राह्मण मे: जिन कामेष्टि यज्ञ का वर्णन है उसमें स्पष्ट किया गया है

कि किस प्रकार का बैल किस देवता को चढ़ाना चाहिए।

मनुस्मृति में अजीगर्तः सुते हन्तुपुपासर्प दवुभुक्षितः।



हिन्दू धर्म ग्रन्थों की सत्यता / ११
न चालिप्यत पापेन क्षुत्प्रतौकारमाचर ।।105।।

अर्थात : भूख से व्याकुल अजीगर्त ऋषि पुत्र का वध करने को तैयार हो गये। (यज्ञ में बलि देने के लिए) किन्तु क्षुधा को मिटाने के लिए ऐसा करने पर भी वे पाप के भागी नहीं हुए। इससे यह पता चलता है कि लोग नर मांस भी खाते थे।



शंकर भगवान का कुत्ते का मांस -

श्वमांसभिच्छन्नोर्तोऽतुं धर्माधर्मविचक्षणः।

प्रणानां परिरक्षार्थ वामदेवो न लिप्तवान 1110611



अर्थात : धर्म - अधर्म को जानने वाले वामदेव ऋषि (शंकर भगवान) ने प्रणों की रक्षा के लिए क्षुधा से अर्त होकर कुत्ते का मांस खाने की इच्छा की और उस पाप से वे लिप्त नहीं हुए।



विश्वामित्र ऋषि का कुत्ते का मांस-

क्षुधार्तश्वाम भभ्यागाद्विश्वामितः श्वजाधजीम्।

चाण्डालहस्तादादाय धर्माधर्मविचक्षणः ।।10811



अर्थात : धर्मन्तु-अधर्म को जानने वाले विश्वामित्र ऋषि भूख से अर्त होकर चाण्डाल के हाथ से कुत्ते के जंघे का मांस लेकर खाने को तैयार हुए।



भारद्वाज का अपने पुत्र के साथ-

भारद्वाजः क्षुधातंस्तु सुपुत्रो विजने बने।

वहीर्गाः प्रतिजग्राह बूभोस्तष्णों महातपः ।।10711



अर्थात- निर्जन वन मे क्षुधा से पीड़ित महातपस्वी भरद्वाज ऋषि पुत्र के साथ वृध नामक बढ़ई से बहुत सी गायें मांगी थी।



मनुस्मृति भाषा प्रकाश अध्याय 10 पे. 4 से 422 तक

कृष्ण के व्याह में लाखों गायों के काटने का प्रस्ताव था-

गवां लक्षं छोदनं च हरिणानां द्विलक्षकम् ।

चतुर्लक्षम् शशानां च कूर्माणा च तथा कुरू।।61।।

दक्षलक्ष छागलाना भेटानां तच्चुर्गणम् ।।62।।

एतेषां पक्वं मासं भोनार्थ च कारय ।।63।।

ब्रहावैवर्त पुराण जन्म खंड (अध्याय 105)



अर्थातः (कृष्ण की पटरानी रूक्मिणी के विवाह की सामग्री के रुप मे उसके भाई द्वारा रखा गया भोजन व्यवस्था मे एक लाख गाय, दो लाख हिरन, चार लाख खरगोश, चार लाख कछुवे, 10 लाख बकरे, 16 लाख भेड़ मारने का उसने भाई द्वारा रखा गया था।



ब्रह्मवैवर्त पुराण के प्रकृति खण्ड अध्याय 61 श्लोक 66 में लिखा है कि पाच सौ करोण गायों का मांस ब्रह्मण लोग खाते है।



आपस्तम्ब धर्मसूत्र मे - लिखा गया है कि श्राध्द में यदि गौ का मांस परोसा



१२ / हिन्दू धर्म ग्रन्थों की सत्यता
जाय तो पितरों की एक साल की तृप्ति हो जाती है। विभिन्न मांसों से होने वाली तृप्ति की विभिन्न अवधियां बताते हुए लिखा गया है।



संवत्सर गव्येन प्रीतिः, भूयांसमतो माहिषण। एतेन ग्राम्यारण्यानां पशूनांमांसं मेध्यं ।। 16।। मड्‌गोपस्तरणे खड्गमांसेनानन्त्यं कालम् । तथा शतबलेर्मत्स्यस्य मांसेन बाघीणसत्य च ।।25।।



आपस्तम्ब धर्म सू. 2, 7, 12, 25, 2, 7, 17, 3
अर्थात : श्राद्ध में गोमांस खिलाने से पितर एक वर्ष के लिए संतुष्ट हो जाते है। भैसे का मांस खिलाने से वे उससे भी अधिक समय के लिए ऐ ही नियम खरगोस आदि जंगली पशुओं और बकरी आदि ग्रामीण पशुओं के मांस के बारे में है। यदि गैंडे के चर्म पर बैठा कर ब्राह्मणों को गैंडे का ही मांस खिलाया जाये तो पितर अनंत समय के लिए संतुष्ट हो जाते हैं, 'शतवलि' नाम की मछली के मांस खिलाने से भी ऐसा ही होता है।



महाभारत में भी ऐसा ही वर्णन है -

गव्येन दतं श्राद्धे तु संतत्सरमिहोच्यते ।।5।।

(अनुशासन पर्व अ. 88)



अर्थात गौ के मांस से श्राद्ध करने पर पितरों की एक साल की तृप्ति होती



हैं।



पुराणों और स्मृतियों में श्राद्ध में परोसे गये मांस न खाने से नरक होता है।



नियुक्तिस्तु यथान्यायं यो मांसं मानवः।

स प्रेत्य पुशतां याति सम्भावानेकविंशतिम्।। 35।।

(मनुस्मृति 5)



अर्थात जो श्राद्ध और मधुपर्क मे परोसे गए मांस को नहीं खाता, वह मरकर सम्भवतः 21 जन्मों तक पशु बनता हैं।



और - क्रतो श्राध्दे नियुक्तो वा अनश्नन् पतति द्विजः।

(मनुस्मृति 3/55)



अर्थात - यज्ञ और श्राद्ध में जो द्विज मांस नही खाता वह पतित हो ऐसा ही कर्म पुराण (2/17/40) में लिखा गया है।



ऐसा ही विष्णु धर्मोत्तर पुराण (1/140/49-50 में लिखा गया है)



महाभारत में रंतिदेव नामक एक राजा का वर्णन -

राज्ञो महानसे पूर्वे रन्तिदेवसय वै द्विज ।

द्वे सहस्त्रे तु बध्येते पशूनामन्वहं तदा।।8।।

अहन्यहानि बध्येते द्वे सहस्त्रे गवां तथा।

समांसं ददतो हत्यन्नं रन्देिवस्य नित्यशः ।।

अतुला कीर्तिरभव नृपस्य द्विज सत्तम ।।90।।



अर्थात - राजा रतिदेव की रसोई के लिए दो हजार पशु प्रतिदिन काटे जाते थे, मांस सहित अन्न का दान करने के कारण राजा रति देव की अतुलनीय कीर्ति



हिन्दू धर्म ग्रन्थों की सत्यता / १३
हुई।



(अध्याय 208 व 199 महाभारत वन पर्व)



रतिदेव के विषय में यहां तक वर्णन मिलता है कि राजा रति देव ने जो गायो की खाले उतारी थी उससे खून चू-चूकर एक महानदी बह निकली वह नदी चर्मवती (चम्बल) कहलाई।



प्रमाण-
महानदी चर्मराशेरूत्क्लेदात ससृजे यतः ।।122।। ततश्चर्मण्वतीत्येवं विख्याता सा महानदी ।।123।।1



(शांति पर्व, अध्याय 29)
राजा विश्चरक्ष - कटे हुए वृक्षो की तरह यज्ञ में पड़े बैलों को देखकर और गौओं का विलाप सुनकर परेशान हो जाता है उनके प्रति दया भाव से कहता है कि गौओं का कल्याण हो।



प्रमाण-
हिन्नस्थूणं वृक्ष दृष्ट्वा विलापं च गवां भृशम् ।।।।। गोग्रहे यज्ञवाटस्य प्रेक्षमाणः स पार्थिवः ।।2।। स्वास्ति गोभ्योऽस्तु लोके ततो निर्वचनं कृतम् ।।3।।



(शांति पर्व अध्याय 265)

ब्रहह्मवैवर्त पुराण में -

हविष्यमत्स्यामांसैस्तु शशस्य नकुलस्य च।

सौकरच्छागलैणेय रौरवैर्गवयेन च ।।1।।

औरभ्रगबरण्यरपयैश्च तथा मांसवृद्धया पितामहाः।

प्रयान्ति तृप्ति मांसैस्तु नित्यं ब्राधीणसामिवैः ।।211



अर्थात - हवन मे छोड़ी जाने वाली आहुति के द्रव्य, मछली, खरगोश, नेवला,



सूअर, छाग (बकरा), कस्तूरिया मृग, कृष्ण मृग, बन गाय और गाय के मांसो से पित्रगा क्रमशः एक-एक मास अधिक लाभ करते हैं। और गैड़े के मांस से सदा तृप्त रहते हैं।



पांच करोड़ गायों का मांस व मालपुए ब्राह्मण लोग खा गये



प्रमाण-

पंचकोटि गवां मांस सापूपं स्वान्नमेव च।।98।। एतेषां च नदी राशि भुंजते ब्राह्मणोन्मुने ।।199।। ब्रह्मवैववर्त

वशिष्ठ के मांस खाने का वर्णन

(पुराण प्रकृति खण्ड अ. 1, 6)

शस्त्रैसे अधपके इन्याम्न्न्नायं समांसे मधुपके इत्याम्नाय बहुमन्यमाना क्षेत्रियाभ्याश्रोताय वत्सरी महोक्ष महाजं वा निवपन्ति गृहमेधिनः।



त हिं धर्मसूत्रकाराः समाभनन्ति ।

(उत्तर रामचरित्रम के चतुर्थ अंक के विष्कस्मक मे)

१४ / हिन्द धर्म ग्रन्थों की सत्यता
अर्थात- मधुपर्क मांस युक्त होना चाहिए, इस बेदवचन का बहुत सम्मान करते हुए गृहस्थगण वेदज्ञ अतिथि के लिए बछिया व बड़ा बैल अथवा बड़ा बकरा भेट करते है। इस बेदवचन को धर्मसूत्रों के स्चने वाले भी अच्छी तरह मानते हैं।



नोट- यह बात बाल्मिकि के आश्रम में जब वशिष्ठि पहुंचे तो उनका सत्यकार दो वर्ष की बछिया को खिलाकर किया गया। इस पर बाल्मीकि के एक शिष्य (सौधातकि) को बड़ा कष्ट हुआ वह अपने सहपाठी भंडायान से कहता है कि यह वशिष्ठ तो कोई बाघ या भेड़िया है, जो आते ही उस बेचारी कल्याणिका (बछिया) को खा गया इस पर उसका सहपाठी उसे समझाता है।



भीष्म पितामह के मांस खाने का विवरण बताना भीष्म पितामह कहते है



कि जिस मांस को प्रोक्षण द्वारा अर्थात् पानी छिड़क कर मन्त्र द्वारा शुद्ध ना किया गया हो उसे नहीं खाना चाहिए। (महाभारत अनुशासन पर्व अध्याय 115) अगस्त ने अपने तप से पशुओं को प्रोक्षित करके पवित्र बना दिया है। इससे मांस के उपयोग से देवता पितरों की क्रियाएं भ्रष्ट और पाप योग्य नहीं होती हैं। प्रत्युत न्याय कुल है पितर भी मांस से तृप्त होते हैं। (महाभारत अनुशासन पर्व अ. 115. श्लोक 59 व 60 ) भीष्म कहते हैं हे परंतप, मांसरस से उत्तम पदार्थ दुनिया में नहीं हैं। क्योंकि, दुर्बलों, दुखियों और थके मांदों के लिए बहुत उपयोगी है। यह प्राणों को बढ़ाता है और बहुत शीघ्र पुष्टि करता हैं। हे परंतपः मांस से अधिक भक्ष्य भी कोई नहीं है।



(महाभारत अनुशासन पर्व अध्याय 6 श्लोक 7 से 10 तक)



भैरव काली का चण्डी आदि के पूजा सामग्री का वर्णन सिंह पर सवारी करने देवी मालती के फूलों, दीपों, पशुओं की बलियों, शराब, मांस और चरबी से पूजा करें यह है देवी कालिका की पूजा सामग्री। (भविष्य पुराण उत्तर पर्व अ. 61, श्लोक 51, 525-52)



मार्कण्डेय पुराण मे रक्तबीज राक्षस के बध के वर्णन में लिखा है कि कालिका ने उसका गला क्षेद कर गरम-गरम खून पीन लगी।



(मार्कण्डेय पुराण अ. 8 श्लोक 59)

इक्कीस जन्मों तक नरक-

नियुक्तस्तु यथान्यायं यो मांस नान्तिमानवः ।



स प्रोत्शप्रेत्यपशुतायाती सवानेकांसविशति। 5-53



अर्थात- शुद्ध और मधुपर्क तथा विधि नियुक्तु होने पर जो मनुष्य मांस नही खाता व मरने के इक्कीस जन्म तक पशु होता है। और भी देखे-



यज्ञार्थ पशवः सृष्टाः स्वयंमेद स्वयंभुवा।



यज्ञस्यमूत्यै सर्वस्य तस्माद्यज्ञे बधोऽवधः ।। 5-3911



ओषध्यः पशवो वक्षास्तिर्यचः पक्षिणस्तया।


हिन्दू धर्म ग्रन्थों की सत्यता /
१५

यज्ञार्थ निधनं याप्ताः प्राप्नुवन्त्युत्सृतीः पुनः ।। 5-40



(मनुस्मृति)

अर्थात- स्वयं ब्रह्मा ने यज्ञ के लिए और सब यज्ञों में पशुओं की समृद्धि के लिए पशुओं का निर्माण किया है। इसलिए यज्ञ में पशुओं का वध (अहिंसा) हैं। औषधि पशु, वृक्ष, कछुए, आदि और पक्षी ये सब यज्ञ के निमित्त मारे जाने पर भी उत्तम योनि में जन्म ग्रहण करते हैं।



नोट- बधिक बेद मन्त्र नहीं पढ़ सकता है इसलिए व जीव हत्या का भागीदार है पापी है, और ब्राह्मण सारे पशुओं को यज्ञ के बहाने बेद मंत्र पढ़कर खा जाये तो वह अहिंसक है ब्राह्मणों ने क्या अनोखा तरीका निकाला था मांस खाने का।



शास्त्रों के रचनाकारों ने यज्ञ के बारे में जितना भी अंधविश्वास फैला सकता था उसमे कोई कसर बाकी नहीं रखी है। जब कि वैज्ञानिक दृष्टिकोण से यज्ञ निरर्थक और हानिकारक है। वायु में कार्बन बढ़ाने तथा अन्य घी आदि का नाश बिना लाभ होता है।



मनुस्मृति में लिखा है- जंगली सुअर और जंगली भैसे के मांस दस मासं और



खरहे तथा कछुवे के मांस से ग्यारह मांस तक तृप्त रहते है। गाय के दूध या दूध से बनी चीजों से एक वर्ष तक वाधीणस के मासं से वारह वर्ष तक पितरों की तृप्ती होती है। कालशक, महाशल्क (मछली) गेड़े और लाल वर्ण के बकरे का मांस, शहद तथा नोगर आदि पवित्र अन्न इन सबसे पितरों का अनन्त काल तक तृप्ती होती है।



नोट- पितरों की होती हैं कि नहीं यह कौन देखने जाता है पर ब्राह्मणों की अवश्य होती है।



नरमेध - ऋगवेद 9-14-12 से 15 में शुनः शेप नामक पुरूष का वर्णन है जिसे नरमेध गो बलि चढ़ाने की तैयारी है। महाभारत अनुशासन पर्व अ. 3 से पता चलता है कि वह ऋचिक उर्फ अजिगर्त का पुत्र था। इसे राजा हरिश्चन्द्र के हाथों उसके पिता अजिगर्त न यज्ञ में बलि देने के लिए बेचा था। मनुस्मृति (अध्याय 10 श्लोक 15 "मन्वर्थ मुक्तावली" नामकी एक)



प्राचीन संस्कृत व्याख्या से पता चलता है कि। इसका पूरा वर्णन वा.रा. बालकाण्ड सर्ग 61 में श्लोक 5 से 24 तक में दिया गया है।



नोट- यही है हमारे धर्म ग्रन्थ जो पिता पुत्र के सम्बन्ध को बताते हैं। और आज का हमारा समाज उन धर्मग्रन्थों का वर्णन करते नहीं थकता है।



सोचिए जो लोग (देवी देवता) गाय, बैल, सूअर, कुत्ता, भैंसा, मनुष्यों का मांस खाते व शराब पीत थे क्या उन्हें ईश्वर मानकर पूजना अनिवार्य है। अगर नही तो इन धर्म ग्रन्थों के पीछे न पड़कर बेकार में समय ना बर्बाद करें। मनुष्य की सबसे बड़ी तपस्या है काम, क्रोध, लोभ, मोह पर विजय पाना अगर आप इस पर विजय पा लिए तो समझिये पूजा पूरी हो गयी, इससे आपके चरित्र की महानता



१६ / हिन्दू धर्म ग्रन्थों की सत्यता





आपके बाद भी अमर रहेगी। हरिश्चन्द्र चौधरी



स्वामी विवेकानन्द ने कहा है- भारत में एक ऐसा समय रहा है कि जब बिना गोमांस खाए कोई ब्राह्मण नहीं रह सकता था।



पशुओं के अंगों के बंटवारे के बारे में वर्णन पशुओं के अंगो के बारे में लिखा है कि जबड़े की दोनों हड्डियों और जीभ प्रस्तोता नामक पुरोहित को दी जानी चाहिए, बाज की शक्ल जैसी छाती उद्‌गाल को, गला और तालु प्रतिहर्ता को, कमर के नीचे दाहिनी ओर का हिस्सा होतृ को, बाया हिस्सा ब्रह्म को, दाई जांघ मैत्रावरूण को, बाई ब्राह्मणच्छसी को, दाहिने कंधे के साथ का हिस्सा मंत्रोच्चारण में साथ देने वाले उपगाताओं को, बायां कधा प्रतिप्रस्थाता को दाएं बाजू का निचला हिस्सा नेस्टा को बाएं बाजू का निचला हिस्सा पोता को, दाहिनी जांध के ऊपर का हिस्सा अच्छावाक को, बाई जांघ के ऊपर का हिस्सा अग्निघर को, दाएं बाजू के ऊपर का हिस्सा सदस्य को, पीछे की हड्‌डी और अंडकोष यज्ञकर्ता गृहस्थ को, दाया पांव भोज देने वाले गृहपति को, बायां पांव भोज देने वाले गृहपति की भार्या को, ऊपर का होंठ गृहपति और उसकी भार्या को आधा आधा देना चाहिए। पशु की पूंछ वे भार्याओं को देते हैं, परंतु यह उन्हें न देकर किसी ब्राह्मण को देनी चाहिए।



गरदन पर के माणिक व तीस कीकस ग्रावस्तुत को, तनों कीकस और पीठ के मांसल हिस्से का आंधा भाग उन्नेता को, गरदन पर के मांसल हिस्से का आधा और बाएं कान का कुछ भाग बध करने वाले का दिया जाना चाहिए, यदि बध करने वाला स्वयं ब्राह्मण न हो तो किसी ब्राह्मण को दे दे, सिरसुब्रह्मण्य को, सोम यज्ञ में यज्ञ की बलि बने पशु का हिस्सा जो यज्ञ भोज का है वह सब पुराहितों का है, केवल होतृ के लिए ऐच्छिक है।



यज्ञ में पशु के 26 टुकड़े यज्ञ में किए गये श्लोकों के कारण है जिससे यज्ञ किया जाता है। प्रति टुकडा यज्ञ के एक एक चरण की पहचान है। जो लोग इस तरह से पशु के 26 टुकड़ा करते है और इस तथा उस दोनों लोकों में प्रतिष्ठित हो जाते है।



जो लोग ऊपर बताये गये अनुसार पशु के मांस का बंटवारा करते है उनके लिए यह स्वर्ग का सोपान बन जाता है। लेकिन जो इस का उल्लंघन करके बांटते हैं वे पापी व अत्याचारी हैं।



नोट- ब्राह्मणों ने यह अपने फायदे के लिए कितना बढ़िया तरीका निकाला था क्योंकि बधिक मंत्र पढ़कर बध नहीं कर सकता था क्योंकि उसे पढ़ने लिखने का अधिकार ही नही मिला था इसलिए व मंत्र पढ़ नहीं सकता था अतः वह बध करता तो पापी व अत्याचारी हो जाता इसलिए बध करने के लिए ब्राह्मण को ही लोग बुलाते और ब्राह्मणों को उसमें हिस्सा मिलना था।



हिन्दू धर्म ग्रन्थों की सत्यता / १७







(ऐतेरय ब्राह्मण अध्याय 31)



"आपस्तम्ब गृह्मासूत्र" दिया गया है कि "बेदज्ञ ब्राह्मण" कोई स्नातक या आचार्य



घर पर आये तो उसका सम्मान मधुपर्क से करना चाहिए। मधुपर्क देने वाला गाय को उसके समाने करे। अगर वह आज्ञा दे तो गौरस्यपहतपा आदि मंत्र पढ़कर उसका बधकरके आगन्तुक को दे। आपस्तम्ब गृहसत्र खंड 13, पटल 5, सूत्र 15, 16, 17)



वर्तमान धर्मशास्त्रियों - का कहना है मधुपर्क में मधुदही आदि दिए जाते थे न कि मांस जबकि मानव गृहसूत्र (पु. 1 खंड 9, सूत्र 21 मे साफ लिखा है कि "ना मांसो मधुपर्क इति श्रुतिः "अर्थात मधुपर्क मांसरहित हो ही नहीं सकता, ऐसा बेदों का मत है।



सावधान रहे क्योंकि महोक्षं, महाजं, वत्सरी, महोछ, महाज, आलंभन, आलंभ, गवालंभ आदि जैसे शब्दों के अर्ध बदलों से बाज नही आते है।



जबकि -



ब्रह्मवैबर्त पुराण (अध्याय 115, 112-13 में लिखा गया है कि-



अश्वालम्भं गवालम्भं सन्यासं पलपैतृकम् ।



देवराच्च सुत्रोत्पत्रिः कलौ पंच विवर्जयत ।



अर्थात- अश्व का आलंभ, गौ का आलंभ, सन्यास, श्राद्ध में मांस परोसना देवर से नियोग द्वारा पुत्र उत्पन्न करवाना इन पांचों की कलियुग मे वर्जित है।



इसीतरह "वृहन्नादरदीय में बताया गया है कि मधपर्क पशोवर्धः, मासोदनं तथा श्राद्धे, नरमेधाश्वमेधकौ, गोमेधं मखं तथा इमान धर्मान कलियुगे वर्ज्यानाहूः मनीषिणः।



अर्थात- मधुपर्क में पशु मारना, श्राद्ध में मांस और भात देना, नरमेध, अश्वमेघ ओर गोमेध मख (यज्ञ) करना ये सब कलियुग में वर्जित है।



नोट- अगर मैं हिन्दू धर्म ग्रन्थों के मांस खाने व शराब पीने का ही वर्णन संग्रह करू तो एक मोटी पुस्तक तैयार जो जायेगी। अतः आप लोग इतने में ही संतोष करने की कृपा करें।



गंगा शिव के सिर पर, रही पुत्री समान। उनको उनके लिंग पर, डारत मुर्ख महान ।।



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१८ / हिन्दू धर्म ग्रन्थों की सत्यता
अध्याय 2
वर्णशंकरो का इतिहास अविश्वसनीय प्रसंग

राजा जन का जन्मा- राजा निमि निःसंतान मर गये ऋषियों ने राजा का ना होना भय माना इसलिए निमि के मृतक शरीर को मथा उससे लड़का उत्पन्न हुआ, जन्म लेने के कारण बालक का नाम "जनक" विदेह से उत्पन्न होने के कारण वैदेह मंथ से जन्म लेने से उसका नाम मिथिल पड़ा मिथिला नगरी इसी ने बसाई।



प्रमाण



अराजक भय नृपा मन्यमाना महर्षयः ।

देहं ममन्युः स्म निमेः कुमारः समजायत ।।12।।

जन्मना जनकः सोऽभूद वैदेहस्तु विदेहजः ।

मिथिलो मथनाज्जातो मिथिला येन निर्मिता ।।13।।

(श्रीमद्भागवत स्कन्ध 9 अध्याय 13)

पुरुष का बच्चे का जन्म देना-

युवानाम्बोऽभवत् तस्य सोऽनपत्यो वनं गतः । 25।।

भार्याशतेन निर्विष्ण ऋषयोऽस्य कृपालवः।

इष्टि स्म वर्तयाचकु रैन्द्री ते सुममहिताः । 12611

राजा तद् यज्ञसदनं प्रविष्टो निशि तषितः।

दृष्टा शयानान् विप्रांस्तान् पपो मन्त्रजलं स्वयम् ।। 27।।

उत्थितास्ते निशाभ्याथ व्युदक कलशं प्रभो।

प्रप्रच्छुः कस्य कर्मेदं पीतं पुंसवनं जलम् ।।2811

ततः काल उपावृत्ते कुक्षि निर्भिध दक्षिणम्। युवनाश्रवस्य तनयश्चक्र वर्ती जजान है।।3011

(श्रीमत‌द्भागवत स्कंध 9 अधय 6)



अर्थात - युवानाश्व नाम का राजा हुआ उसके पास कोई सन्तान नहीं था। वह दुखी होकर अपनी सौ पत्नियों के साथ बन मे चला गया, कृपालु ऋषियों ने एकाग्रता के साथ इन्द्रयज्ञ किया, रात में प्यासा राजा यज्ञशाला में गया और ब्राह्मणो


हिन्दू धर्म ग्रन्थों की सत्यता /
१९

को सोता देखकर मंत्र वाला पल पी गया. ब्राह्मणों ने उठ कर कलश को जल से खाली देखकर पूछा पुत्र उत्पन्न करने वाला जल किसने पिया है। इसके बाद प्रसव काल आने पर राजा की दाहिनी। कोख फाड़ कर एक चक्रवर्ती पुत्र उत्पन्न हुआ।



नोट - अफसोस है कि आज के वैज्ञानिक कोई ऐसी दवा नहीं बना पाये जो कि पुरूष के अन्दर गर्भाशय भी बना दे और गर्भ भी धारण करा दें. अगर बना देते



तो आज किसी का निरवंश नहीं होता.



बच्चा पैदा होने पर - मां के दूध के लिए रोने लगा तब ऋषियों ने कहा यह किसका दूध पीयेगा, इन्द्र ने कहा यह मेरा दूध पीयेगा और इतना कह कर इन्द्र ने अपनी तर्जनी अंगुली बच्चे के मुंह में डाल दी।



प्रमाण



- कंधास्याति कुमोराऽयं स्तन्यं रोरूयते भृशम्। मा धाता वत्स मा रोदीरितीन्द्रों देशिनीम्‌दाम् ।। 3911



नोट - अगर ऋषि लोग राजा के स्तन भी बना दिए होते तो बच्चे को इन्द्र की अंगुली नही पीना पड़ा होता। यह सब एक कपोल गाथा है जिस पर कोई भी बुद्धीजीव व्यक्ति विश्वास नहीं करेगा।



जरासन्ध का जन्म-
अन्यस्यां चापि भर्याया शकले द्वे बृहदथात ।।7।। ते मात्रा वहिरुत्सृष्टे जरयां चाभिसन्धिते। जीव जीपेति क्रीडन्त्या जरासन्धोऽभवत् सुत ।।৪।।

(श्रीमत‌द्भागवत् स्कंध 9 अ. 22)



अर्थात- वृहद्रथ की दूसरी पत्नी के गर्भ से मानव शरीर के दो भाग उत्पन्न हुए, माता ने उन्हे बाहर फेक दिया, जरा ने उन दोनों भाग को मिलाकर जियो-जियो कहते हुए खेल-खेल में जीवित कर दिया इसी कारण उस बालक का नाम जरासंध पड़ा।



नोट- क्या राजा के वहां भी बच्चे कूड़ें पर फेके जाते थे वह बच्चा अबैध नहीं था कि उसे गाड़ा या जलाया क्यों नहीं गया। अगर वह बच्चा राजा का होता तो उसे गाड़ा या जलाया गया होता, इससे यह सिद्ध होता है कि वह बच्चा अबैध था और भागवत कार ने एक मनगढ़त कहानी लिखकर जनता को गुमराह किया है।



कृपाचार्य और कृपी का जन्म-
तस्य सत्यधृतिः पुत्रो धनुर्वेद विशारदः।

शरद्वांस्तस्तत्सुतो यस्मादुर्वशीदर्शनात् किल ।।35।।

शरस्तम्बेऽयतद् रेतो मिथुन तदभूच्छभम्।

तद दृष्टा कृपयागृण्हाच्छन्तनुमृग्या चरन् ।

कृपः कुमारः कन्या च द्रोणपत्न्यभवत् कृपी।।6।।



२० / हिन्दू धर्म ग्रन्थों की सत्यता
(श्रीमद्भागवत् स्कंध 9 अध्याय 29)
अर्थात- उसका पुत्र (शतानन्द) सत्य घृपति हुआ जो धनुर्वेद मे निपुण था, सत्यधृति का पुत्र शरदवान हुआ एक बार उर्वशी को देखकर शरदवान का वीर्य फूस पर गिर पडा. वीर्य सुन्दर जोड़ा बन गया, राजा शांतुन उसे देखकर कृपा के कारण घर ले आए, और लड़के का कृपाचार्य तथा लड़की का नाम कृपी हुआ यही कृपी बाद में द्रोणाचार्य की पत्नी बनी।



नोट- कैसी अनोखी कहानी गढ़ी गयी है कि वीर्य पूस पर गिरा और तुरन्त सुन्दर बच्चों को जोड़ा बन गया मालूम पड़ता कि सब के सब धर्म ग्रन्थों के पात्र छप्पर फाड़ के पैदा हुए थे।



कर्ण का जन्म-
साऽऽप दुर्वाससो विद्यां देवहूती प्रतोषितात् । तस्यां वीर्यपरीक्षार्थमाजुहावं रवि शुचिम् ।। तदैवोपागतं देव वीक्ष्य विस्मितमानसा। प्रत्ययार्थ प्रयुक्ता में याहि देव क्षमस्व में।। 33।। अमोघं दर्शनं देवि आधित्से त्वमिचात्मजम्। योनिर्यथा न दुष्यते कर्ताहं ते सुमध्यमें।। 34।।

इति तस्यां स आधय गर्भ सुर्यो दिवं गतः। सद्यः कुमारः संजज्ञे द्वितीय इव भास्करः 113511

(श्रीम‌द्भागवत् स्कंध 9 अ. 24)



अर्थात - कुन्ती ने दुर्वासा को प्रसन्न करके देवाहुति देवताओं को बुलाने वाली विद्या प्राप्त की उस की परीक्षा लेने के लिए कुन्ती ने पवित्र सूर्य को बुलाया. तुरन्त सूर्यदेव को आया देख कुन्ती चकित हो गयी और कहीं मैंने विश्वास के लिए विद्या का प्रयोग किया है आप जाइए मुझे क्षमा कीजिए, सूर्यदेव बोले मेरा दर्शन व्यर्थ नहीं जाता मैं तुझ से एक पुत्र उत्पन्न करना चाहता हूं हे सुन्दरी मैं इस प्रकार गर्भाधान करूंगा की जिससे तेरी योनि दूषित ना हो, इसके बाद कुन्ती में गर्भाधान करके सूर्य आकाश में चले गये, तुरन्त ही एक दूसरे सूर्य के समान एक बालक ने जन्म लिया, उसे कुन्ती ने लोक लज्जा के डर से नदी के जल में छोड़ दिया।



नोट-सूर्यदेव के सामने कोई मजबूरी तो थी नहीं की कुन्ती कुंवारी को बिना गर्भाधान किए वापस नहीं जा सकते थे अगर कुन्ती पर खुश थे तो वे कुन्ती को और भी कोई वरदान दे सकते थे। और अगर गर्भाधान कर ही दिए तो अपने पुत्र को अपने साथ लेते गये होते तो बेचारी कुन्ती को बच्चे को नदी में नहीं छोड़ना पड़ता। सूर्य ने यह भी नहीं बताया कि वह किस रास्ते से गर्भाधान करेंगे। जिससे उसकी योनि दूषित नहीं होगी। हमारा तो मानना है कि सूर्यदेव को अपनी हवश मिटाना था सो मिटाए पर भागवत कार ने जनता को गुमराह करने के लिए योनि



हिन्दू धर्म ग्रन्थों की सत्यता / २१
दूषित न होगी की कहानी सूर्यदेव के पाप को छिपाने के लिए गढ़ दी है इन बातों से यह मालूम पड़ता है कि कर्ण भी एक अवैध पुत्र था। और सामाजिक दृष्टि से भी अवैध था क्योंकि बिना विवाह हुए ही वह कुंवारी कुन्ती और सूर्य का पुत्र था।



द्रोण का जन्म की कथा इस प्रकार दी गयी है कि पूर्वकाल में महर्षि
भारद्वाज (अग्निहोत्र) महर्षियों के साथ गंगा स्नान को गये वहां उन्होंने सौन्दर्य अप्सरा को नहा कर उठते देखा। वह योवन के मद में मस्त होकर झूम रही थी। पुनः नदी के तट पर उसका वस्त्र खिसक गया, नग्नावस्था में पुनः उसे देखकर महर्षि काम के वश हो गये, बुद्धिमान भारद्वाज का मन उस रमणी में रम गया और उनका वीर्य स्वखलित हो गया, उस वीर्य को उन्होंने एक द्रोण (एक विशेष यज्ञ पात्र) में रख दिया, महर्षि के उस द्रोण से द्रोण का जन्म हुआ।



नोट - आज के वैज्ञानिकों का कहना है कि बिना नर-मादा के वीर्य से बच्चे नहीं पैदा हो सकते है, लेकिन उस जमाने में ऋषि लोग केवल नर के वीर्य से बच्चा पैदा करते थे बिना गर्भासय के और वह भी एक दोनों में। इस तरह द्रोण भी उपरोक्त श्रेणियों में ही आते हैं बाद में भागवत कार ने एक यहां और नयी कहानी गढ़ दी है। (महाभारत आदि पर्व अ. 131 स्कंध 10)



ऋण्यश्रृंग का जन्म - नृत्य बादित्र गीतानि जुषन् ग्राम्ययजि योषिताम्। आसां क्रीडनको वश्यः ऋण्यश्रृंगो मृगी सुतः।


अर्थात-मृगी के पुत्र ऋष्यश्रृंग स्त्रियों के गाने बजाने नाच को देखकर सुनकर उनके वश में हो गये।



नोट-एक हिरनी (जानवर) के पेट से ऋण्यश्रृंग कार मनुष्य का जन्म असंभव है यहां भी सच्चाई को छुपा कर एक मनगढ़त कहानी दे दी गयी है। जनता को अपने लाभ के लिए गुमराह किया गया है।



वशिष्ठ का जन्म - मृगीजोऽथर्ष श्रृंगोऽपि वशिष्ठोगणिकत्मजाः (भविष्य पुराण वनपर्व अ. 42 स्कन्ध)
अर्थात- श्रृष्यश्रृंग हिरनी से उत्पन्न थे और वशिष्ठ गणिका के पुत्र थे।



निषाद जाति तथा निषाद का जन्म मुर्दे से-

विनिश्चित्यैवमृषयो विन्नस्य महीपतेः।

ममन्धुरूरूं तरसा तत्रासीद्वाहुको नरः ।।43।। निषीदेत्यब्रुवंस्तात स निषादस्ततोऽभवत् ।।45।।

तंतु तेऽवनतं दीनं किंकरोमीति वादिनम्।

(श्रीमद्भागवत् स्कंध 4 अ. 14)



अर्थात - ऐसा निश्चय करके उन्होंने मृत राजा की जांघ को बड़े जोर से मथा तो उसमें से एक बौना पुरूष उत्पन्न हुआ, उसने बड़ी दीनता से नम्रभाव से पूछा कि मैं क्या करूं, तो ऋषियों ने कहा निषिद (बैठ जा) इसी से वह निषाद कहलाया।



२२ / हिन्दू धर्म ग्रन्थों की सत्यता


नोट-ऋषियों ने लड़का पैदा करने के कितने तरीके अपनाये है साधारण मनुष्य सोच भी नहीं सकता है, कहीं मृगी के पेट, कहीं मुर्दे से कहीं, घड़े से, कही घास फूश से कहीं दोनें से इतना तरीका इन्होंने अपनाया है कि जिस पर लिखना भी बड़ी मुश्किल की बात है वैसे और आगे देखें।



व्यास जी का जन्म- कैवर्त (कहार) स्त्री से हुआ था
शुकदेव का जन्म- शुकी से हुआ था।

हनुमान जी के तीन पिता शंकर, सुवन, केसरी, नंदन तेज प्रताप महाजग

बंदन।

नोट- यह तो हनुमान जी के भक्त लोग ही जाने की हनुमान के असली पिता कौन थे।



अब कुछ नियोगस से पैदा होने वालों का वर्णन-



राम, लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न को पैदा करने के लिए रानियों या सम्भोग घोड़ों से कराया गया था-कैसे-



प्रयोग विधि देखें प्रमाण नं. १- वाल्मीकि रामायण लेखक ज्वाला प्रसाद मिश्र



मुरादाबाद ने बालकाण्ड सर्ग 14 श्लोंक 32 में 50 तक में लिखा है कि रानी कौशिल्या ने यज्ञ में घोड़े का पूजन करके तलवार से तीन बार प्रहार करके बध किया उसके बाद धर्म परम्परा की कामना से स्वस्याचित हो उस घोड़े के पास एक रात्रि रहीं उसके बाद यज्ञ में 16 पुरोहित ब्राह्मण घोड़े की चरबी लेकर शास्त्रानुसार होम करने लगे और बाद में घोड़े के सब अंगो को छेदकर विधि पूर्वक आहुति (मन्त्र द्वारा) अग्नि में घी वगैरह फेंकने लगे नरपति दशरथ व पुरोहितों ने समय के अनुसार अपने पाप कटने के लिए घोड़े की चरबी की सुगन्ध को सूंघने लगे। इसके कुछ श्लोक इसी पुस्तक में पर राजा दशरथ के पुत्रेष्टि यज्ञ में 300 पशु की बलि में देखें।



इसी तरह का प्रमाण नं. २ हिरवंश पुराण, द्वितीय खण्ड, पेज नं. 182-



183 लेखक वेदमूर्ति तपोनिष्ठ, पण्डित श्री राम शर्मा आचार्य, चारो बेद, 108 उपनिषद, षटदर्शन, 20 स्मृतियों और 18 पुराणों के प्रसिध्द भाष्यकार ने लिखा है कि अपने अनुयायियों सहित हस्तिनापुर में जाकर राजा जनमेजय ने हर्ष सहित राज्य का संचालन किया और प्रजा भी अपने राजा के दर्शन कर बहुत प्रसन्न हुई. कुछ समय के बाद महाराज जनमेजय विधि सहित अश्वमेघ यज्ञ के लिए दीक्षित हुए, फिर जब यज्ञ के घोड़े का बलि किया गया तब राजमहर्षि काशीराज सुता (काशीनरेश की कन्या) वपृष्टमा उस घोड़े के पास जा बैठी और उस यज्ञ में बलि किये हुए घोड़े के लिंग को अपनी योनी मे स्पर्श कराया, यह अश्वमेघ यज्ञ की प्रथा थी।



प्रमाण नं. ३- मरे हुए घोड़े से रानियों का सम्भोग-



हिन्दू धर्म ग्रन्थों की सत्यता / २३

ब्राह्मणों ने पुत्र पैदा करने के लिए अश्वमेध यज्ञ में घोड़े को मार करके मरे हुए घोड़े के लिंग से रानियों का सम्भोग कराने की प्रथा बना रखी थी।



पुत्रेष्टि यज्ञ- यहां केवल घोड़े के लिंग को स्पर्श कराने की शस्त्रोक्त विधि का



वर्णन है क्योंकि इस महायज्ञ की केवल इसी क्रिया का सीधा सम्बन्ध संतान प्राप्ति की इच्छा माना जाता है। संतान प्राप्ति की इच्छुक रानियों को घोड़े के लिंग से स्पर्श कराया जाता था। इसका पूरा विवरण अजुर्वेद के अध्याय 23 में मंडलम् 10 19 से 32 तक के मन्त्रों में दी गयी है। इनमें एक मन्त्र (अश्वश्नि भूपस्ये कुरूते वृषा बाजी" का भाण्य करते हुए महीधार लिखते है कि प्रधान रानी (यज्ञमान की बड़ी पत्नी) दशरथ के यज्ञ में कौशल्या स्वयं अश्व के गुप्तांग (प्रजनन लिंग) को आकर्षित करे अपनी योनि में स्थापित करें। और उस घोड़े में देवता की कल्पना करके सोचे कि वह घोड़ा मुझसे वीर्य स्थापित कर रहा है। "कैसा घोडा" वीर्य सिंचन करने वाला इसलिए उसे रैताधाः अतः विर्य को पूर्ण रुप से सिंचन करने वाला कहा गया है।



इस तथ्य से कुछ श्लोक नीचे दिये जा रहे हैं



प्रणाय स्वाहापानाय स्वाहा व्यानाय स्वाहा।



अम्बेड अम्बिकेऽभ्वालिके न मा नयति कथवन।



ससस्त्कश्वकः सु मद्रिकां काम्पीलावासिनीम् ।।18।।



गणानां त्वा गणपतिॐ हवामहे बसो मम्।



आहमजानि गर्भाधमा त्वमजासि गर्भधम् ।। 1911



ता ऽउभौ चतुरः पदः संप्रसारयाव सवर्गे लोके।



प्रोर्णवाथां वृषा बाजी रेतोधा रेतो दधातु ।।20।।



विस्तृत जानकारी के लिए यजुर्वेद अध्याय 23, म. 10 महिधर भाग्य



किया। धृतराष्ट का जन्म- अंबिका ने व्यास जी से नियोग कराकर धृतराष्ट्र को पैदा



पांडू - अंबिका ने व्यास से नियोग कराकर पांडू को पैदा किया।



विदुर दासी ने व्यास से नियोग कराकर विदुर को पैदा किया।



कर्ण - सूर्य कुन्ती का अवैध पुत्र था।



युधिष्ठिर - कुन्ती ने धर्मराज से नियोग कराके युधिष्ठिर को पैदा किया।



भीम - कुन्ती ने पवन को बुलाकर नियोग कराके भीम को पैदा किया।



अर्जुन कुन्ती ने इन्द्र से नियोग कराके अर्जुन को पैदा किया।



नकुल - माध्वीय ने अश्वनीय कुमारों से नियोग कराके नकुल व सहदेव को पैदा किया।



तारा - बाली सुग्रीव की पत्नी के मा बाप का पता नहीं।



अंगद के मा-बाप का पता नहीं वह बालि को मिला था।



२४ / हिन्दू धर्म ग्रन्थों की सत्यता

मन्दोदरी - के मां बाप का पता नहीं।

सीता - सीता के मां बाप का पता वह जनक को खेत में पड़ी मिली थी।



नोट- अगर इन लोगों के जन्म के बारे में ही संग्रह करु तो एक मोटी पुस्तक तैयार हो जायेगी। अतः आप लोग इतने से ही धर्म ग्रन्थ के पात्रों के जीवनी के बारे समझ जायें कि लगभग सभी के सभी इसी तरह पैदा हुए थे। हरिश्चन्द्र चौधरी



कुछ बातें और हमारे देश में ऐसे भी मंदिर मौजूद है जहां कामशास्त्र के



चौरासी आसन मूर्तियों के रूप में दिखाए गये है। स्त्री-पुरुष के सम्भोग की अवस्था में मूर्तिमंत्र कर शिवालयों मे शिवलिंग व योनि विराजमान कर के पूजा जाना यहां का परम धर्म है। उसी तरह से उस युग में नियोग कराके बच्चा पैदा करना एक आम बात थी लेकिन कलयुग में घोड़े का वध, गौ का बध, सन्यास, श्राद्ध में मांस परोसना, देवर से नियोग द्वारा बच्चा पैदा करना वर्जित है ब्रह्मवैवर्त पुराण के अनुसार।



प्रमाण- अश्वालम्भं गवालम्भं सन्यासं पलपैतृकम। देवराच्च सुतोत्पतिः कलौ पंच विवर्जयेत्।



इस पुस्तक के भावार्थ व हमारी बातें हमारे धर्म ग्रंथो में जितने भी पात्र



मिलेंगे लगभग सभी के सभी वर्णशंकर इनके जन्म के बारे में जो विवरण मिलता है उसे आज का समाज व वैज्ञानिक युग कभी भी स्वीकार नहीं कर सकता है। और इन वर्ण शंकरो, अवैध सन्तानों को देवी देवता मान कर पूजना कहां तक बुद्धिमानी होगी। किसी के पूजा पाठ करने धरने से कुछ नहीं होता क्योंकि ए आप की कोई भी मदद कर ही नहीं सकते। जो देवी देवता अपनी रक्षा नहीं कर सकता वह आपकी क्या रक्षा करेगा. विदेशो में हजारो मंदिरो को तोड़-फोड़ डाले गये आपके देवी-देवता कुछ भी नहीं कर पाये, यहां तक की अयोध्या में रामजन्म भूमि को तोड़कर बाबरी मस्जिद बना दिया गया था फिर भी आप के राम उसका कुछ नहीं बिगाड़ पाये कहा थे राम जब उनका घर गिराया जा रहा था जो अपना भला नही कर सकता वह दूसरों का क्या करेंगा। यह एक पाखंड, ढकोसला है ब्राह्मणों के कमाने खाने का जरिया इस पाखंड को जड से उखाड फेकिए और अच्छा कर्म करें आपको सफलता अवश्य मिलेगी। क्योंकि किसी ने कहा है कि-कर्म तेरे अच्छे



हैं, तो किस्मत तेरी दासी है।



नियत तेरे अच्छे है, तो घर में मथुरा काशी है।



नोट- इतने प्रमाणों के बाद भी जिन भाई को विश्वास नहीं हो वह मुख्य पुस्तक को अवश्य देखें यहा तक कि आपको ऐसे प्रसंग मिलेंगे। कि आप खुद कहेंगे कि हमने जो संग्रह किया है वह सत्य है

हिन्दू धर्म ग्रन्थों की सत्यता /



२५

अध्याय 3
व्यभिचारियों का इतिहास

राम के साथ गुदा मैथुन करने की इच्छा-प्रमाण-



पुरामहर्षय सर्वे दंडकारण्य वासिनः, दृष्टवा



रामं हरि तत्र भोक्तुमैच्छन्सु विग्रहम' ।।16411 ते सर्वे स्त्रीत्वमापन्ना समुद्भूतास्तु गोकुले बात्।। 165।।



(पदमपुराण, उत्तरखंड, अ. 245)



अर्थात- प्राची काल में दंडकारण्य वासी ऋषि विष्णु के अवतार राम को देखकर उनका सुन्दर शरीर भोगने के इच्छुक हुए वे ही स्त्रित्व को प्राप्त होकर गोकुल में जन्में, कामवासना के सहारे ही भगवान को पा कर संसार रूपी सागर से पार हो गये।



नोट- ऋषियों ने राम के सुन्दर शरीर को भोगना चाहा इसका अर्थ यह हुआ कि ऋषि लोग गुदा मैथुन के शौकीन थे। राम को चाहिए था कि सभी ऋषियों का वही मनोकामना पूरा कर दिए होते, द्वापर युग के लिए टाल कर नाहक ही उन ऋषियों को इतना लम्बा इन्तजार कराये और द्वापर युग में उन ऋषियों को भोगाने के बाजाय स्त्री बनाकर खुद भोगे जब कि वे सब पुरूष बनकर राम को भोगना चाहते थे। ऐसा करके राम ने ऋषियों के साथ बड़ा अन्याय किया।



राधा कौन थी-इसका कृष्ण के साथ क्या सम्बन्ध था- भागवत में कृष्ण का अनेक गोपियों के साथ नाचना, गाना और यौन सम्बन्ध स्थापित करना तो लिखा है पर राधा का नाम कहीं भी नहीं है रास पंचाध्यायी में एक गोपी का वर्णन आता है जो कृष्ण के साथ रास करती थी। जो अन्य गोपियों से अपने आप को उन के बालू पर कृष्ण के साथ-साथ एक नारी के पद चिन्ह देखे।



एवं कृष्ण पृछमा वृंदावन लतातरून।



व्यचक्षत वनोद्वेश पदानि परमात्मनः ।।24।।



पदानि व्यक्तिमेतांनी नदं सूनोर्महात्मनः।



तक्ष्यन्ते हिध्वजाम्भोजवजांकुश यवादिभि ।। 251



तैस्तेः पदैस्तत्पदीमन्विच्दन्त्योऽग्रतोऽवत्वा।



बध्वाः पदैः सुप्तृकतानि विलोक्यातिः ममबु वन्।।2611



२६ / हिन्दू धर्म ग्रन्थों की संत्यता

कस्याः पदानि चैतानि यातापाः नन्दसूजुना ।। असन्यस्त प्रकोष्ठायाः कारेणोः करिणा यथा।। 27।।



अनया राधितो नूनं भगवान् हरिरीश्वरः।



पन्नो विहाय गोविदंः प्रीतो पामनपद रहः ।।12811



तस्या अमूनि नाः क्षोभं कुर्वन्त्पुच्चैः पदानियत् ।। 30।।



यैकायहृत्य गोपीना रहो मुक्तोऽच्युताघरम् ।।30।।



नाखि लक्ष्यन्ते पदान्यत्र तस्या नूनं तृणाकुरैः। खिद्यत्सुजातांधिततामुन्निन्य प्रेयसी प्रियः ।।31।। इमान्यधिकमग्नानि पदानिबहतो वधूम।



गोप्यः पश्चत कृष्णस्य भाराक्रान्तस्य कामिनः ।।32।।



अत्रावरोपिता कान्ता पुश्पहेतार्महात्मना। अत्र प्रसूनावचयः प्रियार्थे प्रेयसा कृतः प्रपदाक्रमणे एते पश्यातासकले पदे ।। 33।। केश प्रसाधनं त्वत्र कामिन्याकामिना कृतम्। तानि चूडयता कान्तामुपविष्टमिह ध्रुवम् ।।34।।



(श्रीम‌द्भागवत् स्कंध 10, अध्याय 30)



अर्थात- वे गोपियां वृंदावन की लताओं और वृक्षों से कृष्ण के बारे में पूछती



फिरी उन्होंने बन में भगवान कृष्ण के चरण चिन्ह देखें, वे कहने लगी ऐ नंदन नंद कृष्ण के चरण ध्वजा, कमण, वज्र, अंकुश, जौ आदि के चिन्ह स्पष्ट दिखाई देते है। कृष्ण के चरण चिन्हो के सहारे वे नारिया आगे गयी, आगे उन्होने कृष्ण के साथ किसी नारी के चरण चिन्ह देखें, जिन्हें देखने से दुःखी होकर वे बोली, नंदननंद के साथ गयी हुई यह कौन है जिसके ये चरण चिन्ह है। वह कृष्ण के कंधे पर हाथ रख कर ऐसी चली है जैसे हथिनी हाथी के साथ चले, इसने निश्चय ही कृष्ण की पूजा की है। जिस से कृष्ण हम सब को छोड़कर प्रेम के कारण उसे एकान्त में ले गये हैं। उसे ये चरण चिन्ह हमें अत्यन्त दुःखदे रहे हैं। अरे सखी वह चाहे जो भी हो पर एकान्त में ले जाकर कृष्ण के अधर सुधा का रस पान कर रही है। यहां लता और अंकुरों के कारण कृष्ण उसे कन्धे पर बैठा लिया है। उसे उठाने के कारण कृष्ण के चरण चिन्ह गहरे हो गये हैं यहां कृष्ण फूलों के लिए प्यारी को उतारा है, यहां प्रिय ने प्यारी के लिए फूल तोंड़े हैं। पंजों के सहारे उचकने के कारण यहां उनके चरण चिन्ह अधूरे हैं। यहां कामी कृष्ण ने कामिनी का केशप्रसाधन किया, यहां उसके बालो का जूड़ा बनाते हुए कृष्ण बैठे है।



नोट इन बातों से पता चलता है कि भागवत लेखक को उस गोपी का नाम मालूम नहीं था जिसके साथ कृष्ण गये थे, अन्यथा उसे ना कहकर भागवत कार उसके नाम का वर्णन करता लगता है इसी गोपी विशेष का नाम राधा रख दिया गया और कृष्ण के बचपन से उसका सम्बन्ध जोड़ दिया गया है, हमारे कहने का तात्पर्य यह है



हिन्दू धर्म ग्रन्थों की सत्यता /

२७



कि न सीधी तरह से राधा का नाम आया है और न बरसाने में रहने वाले वृषभान की पुत्री का वर्णन है।



ब्रम्हावैवर्त पुराण के अनुसार राधा कृष्ण की पत्नी थी और उनके साथ सदा गोलोके में रहती थी, सुदामा के साप के कारण वह तीस करोण गोपियों के साथ कृष्ण की आज्ञा से पवित्र भारत भूमि में आई, कृष्ण ने राधा सहित अपनी उन पत्नियों से प्रसत्रता पूर्वक रमण किया। कृष्ण ने गोपियों से विवाह नही किया पर राधा का हाथ अवश्य पकड़ा था। ब्रह्मा उस विवाह के पुरोहित बने थे।



वृषभानु सुता राधा सुदाम्नाः शापकारणात् 11861।



पुण्यं च भारतं क्षेत्रं गोलोकादाजगाम सा।



तिशत् कोटि च गोपीना गृहीत्वा भर्तुराज्ञया ।।8611



ताभिः सार्ध्य स रेमे च स्वपत्नीभिर्म दान्वितः।



पाणीजग्राह राधायाः स्वय ब्रम्हा पुरोहितः 118811



(कृष्ण जन्म खंड अध्याय 115)



नोट - जब गोपियों के साथ विवाह किए बिना ही कृष्ण का काम चल रहा था तो राधा से विवाह का कृष्ण ने व्यर्थ ही कष्ट किया।



ब्रह्मा ने राधा-कृष्ण का विवाह किस परिस्थिति में कराया था-



एकदा कृष्ण सहितो नंदो वृंदावन ययो



चकार माययाऽस्मान्मेघाच्छन्न नभो गुर्ने।।3।।



एतस्मिन्नंते राधा जगाम कृष्ण सनिथिम् ।।7।।



जग्राह बालकं राधा जहास मधुरं मुखात्।।2811



कृत्वा वक्षसितं कामात श्लेषंचचुंब च।।38।।



एतस्मिनंतरे राधा माया सद्रतनमंऽपम्।



ददर्श रत्न कलशशतेन च मन्वितम् ।।39।।



सा देवी मण्डपं दृष्ट्वा जगामाभ्यांतरं मुदा ।। 44।।



ददर्श तत्र तांबूलं कर्पूरादि समन्वितम् ।। 45।।



पुरूष कमनीयं च किशोरं श्याम सुंदरम् ।।46।।



शयानं पुष्पशय्यायां सस्मित्र सुमनोहरम ।।47।।



क्रोडं बालक शुन्य व दृष्ट्वा तं नव यौवनम्।।5111



सर्वस्मृति स्वरूपा सा तथापि विस्मयं यथौ ।। 53।।



तामुवाच हरिस्तत्र स्मेराननेनसरोरूहाम्।।55।।



आगच्छ शयने साध्विः करू वक्षस्थले हिमाम् ।।6111



तिष्ठाम्यहं शयानतत्वम् कथामिर्यत् क्षणंगतम् ।। 8111



वक्षस्थले च शिरसि देहि में चरणांवुजम् ।।82।।



२८ / हिन्दू धर्म ग्रन्थों की सत्यता



चार प्रकार के चुंबन :



एतस्मिन्नन्स्तरे ब्रह्मा जगाम पुरतो हरेः। (86)



तस्याः हस्तं च श्रीकृष्ण ग्राहयामास तं विधिः। (125)



प्रणम्य राधा कृष्णं च जगाम स्वालपं मुद्रा। (137)



प्रणम्य श्रीहरि भक्तयां जगाम शयन हरेः। (139)



कृष्णश्चर्वित ताम्बूलं राधिकायै ददौ मुदा। (143)



राधाचर्वित ताम्बूलं ययाचे मधुसूदनः। (144) यः कामों ध्यायते नित्यं यस्पैकं चरणाम्बुजम् । वभूव तस्य स वशो राधा सन्तोष कारणात्। (146) करे धृत्वा च तां कृष्णः स्थपयामास वक्षपि। चकार शिधिलं वस्त्रं चुचम्ब च चतुर्विधम्। (148)



वभूव रतियुद्धेन विच्छिना क्षुद्रा घंटिका।



चुम्बने नौष्ठ रागश्च हाश्लेषण च पत्र।। (151)



पत्यंगेनेवा प्रत्यंग मंगेनांगं समश्लिषत्।



श्रृराष्टविधं कृष्णश्चकारं कामशस्त्रविद् ।। (152)



पुलंकाकित सर्वांगी वभूव नव संगामात् मुर्हामवाय सा राधा बुबुधे न दिवानिशम् पूनस्तां च समाशिलष्य समिस्तां बक्रलोचनाम। क्षतविक्षत सर्वांगी नखदंततैश्चकार है।। (153)



वभूव शब्दस्तत्रै श्रृंगार समरोदभवः। (154)



निर्जन कौतुकात कृष्णः कामशास्त्र विशारदः ।। (156)



निवृत्ते कामयुद्धे च सस्मिता वक्रलोचना।। (556)



वभूव शिशुरूपश्चकैशोरं च विहाय च। ददर्श बालरूपं त रूदतं पीड़ित क्षुधा। (163)



यशोदा बालक नीत्वा चुचम्ब च स्तनं ददौ।



वहिनिर्गता रांधा सा स्वगृहे गृह कर्माणि ।।



(166)



नित्यं नक्तं रतिं तत्र चकार हरिणा सह।। (178)



(ब्रह्मवैवर्त पुराण, कृष्ण जन्म, खंड 4, अध्याय 15)



अर्थात - एक बार नन्द जी कृष्ण के साथ वृंदावन में गये, कृष्ण ने अपनी माया से सहसा आकाश को बादलों से घिरा बनया दिया इसी समय राधा कृष्ण के समीप आई और बालक को गोद में ले कर मधुर-मधुर हंसने लगी, राधा ने काम के वशीभूत होकर बालक को कईबार छाती से लगाकर चूम लिया. इसी बीच राधा ने माया से बना सुन्दर रत्नों का एक मंडप देखा जो सैकड़ो रत्न कलशों से सुशोभित था, राधा मंडप को देखकर प्रसन्नता पूर्वक भीतर चली गयी, वहां कपूर आदि से युक्त पान देखा और



हिन्दू धर्म ग्रन्थों की सत्यता / २९

एक सांवले रंग का सुंदर नवयुवक, वह पुरूष फूलों की सैया पर लेटा हुआ मुस्कुरा रहा धा, राधा अपनी गोद को बालक से सूना देख और उस नवयुवक को वहां देखकर आश्चर्य में पड़ गयी, कृष्ण विकसित कमल के समान मुख वाली राधा से बोले भती मानस चारपाई पर आजा और मुझे अपनी छाती पर कर ले, राधा बोली मैं बैठी हूं और आप लेटे हैं, इतना समय बातों में व्यर्थ ही गया, मेरे सीने और शीश पर अपने चरण कमल रखिए, इसी समय ब्रह्माजी कृष्ण के समाने आए और राधा का हाथ कृष्ण के हाथ में थमा दिया, वह राधा और कृष्ण को प्रणाम करके प्रसत्रता से अपने घर चले गये। राधा ने भक्ति पूर्वक कृष्ण को प्रणाम किया और उनके बिस्तर पर गयी, कृष्ण ने अपना चबाया हुआ पान राधा को दिया और उसका चबाया हुआ पान मांगा, जो काम नित्य ही कृष्ण के चरण कमल का ध्यान करता रहता है कृष्ण राधा के संतोष के कारण उस के वश में हो गये, कृष्ण ने हाथ पकड़ कर राधा को सीने से लगा लिया, उसके कपडे ढीले करके चार प्रकार का चुंबन किया, संभोग रूपी युद्ध से छोटे-छोटे घुघरु वाली करधनी टूट गयी और चुम्बन से होठ के रंग नष्ट हो गये और आलींगन से पत्रक नष्ट हो गये, जब संगम संभोग के कारण उस राधा का सारा अंग पुल्कित हो गया, वह बेहोश हो गई. उसे दिन रात का ज्ञान नहीं रहा, काम शास्त्र के ज्ञाता कृष्ण ने प्रत्यंग से प्रत्यंग का और अंग से अंग का अलिंगन कर के राधा से आठ प्रकार का संभोग किया।



अश्लीलता का अन्त कृष्ण ने उस मुसकराती हुई तथा तिरछी नजर वाली राधा को चिपटा लिया और नख तथा दांतों से उसका सारा अंग घायल कर डाला, वह संभोग रूपी युद्ध के कारण बड़ी हलचल हुई, कामशास्त्र विशेषज्ञ कृष्ण ने निर्जन में राधा से सम्भोग किया, कामयुद्ध अर्थात संभोग समाप्त होने पर तिरछी चितवन वाली राधा मुस्कराने लगी, कृष्ण अपना युवारूप छोड़कर बालक बन गये। और भूख से रोते हुए बालक रूप दिखाया, राधा बालक को यशोदा को देने को तैयार हो गई, यशोदा ने बालक को लेकर चूमा और उस के मुह में स्तन दे दिया. राधा वहां से बाहर निकल आई और अपने घर के कामों में लग गयी, राधा कृष्ण के साथ नित्य ही सम्भोग करती थी।



नोट - इस प्रकार राधा और कृष्ण का विवाह हुआ जिसमें ब्रह्मा जी पुरोहित बने थे अगर ब्रह्माजी बिना बुलाए वहां न आये होते तब भी उन दोनों को जो करना था वही करते, जाहिर है। कि ब्रह्मा के आने की कल्पना केवल पाप पर परदा डालने के लिए किया गया है कृष्ण की बात लिखने में शर्म आती है कि दो वर्ष के उम्र में जब संभोग करना होता था तब नौजवान बन जाते थे और बाकी समय में दो वर्ष का बालक बन कर मां का दूध पीते थे। आज कलयुग में भी एक साधारण मनुष्य कम से कम 15 वर्ष के बाद भी संभोग करता है। पर कृष्ण दो वर्ष की उम्र में ही सम्भोग करना शुरू कर दिया था और राधा को जब सम्भोग करना होता था तब कृष्ण बालक को गोद में ले



३० / हिन्दू धर्म ग्रन्थों की सत्यता

लेती और एकान्त में ले जा कर सम्भोग कराती थी और घर के लोग समझते थे की बच्चे को खेलाने ले गयी है। यहां कौन जानता था कि भीतर ही भीतर दोनों क्या गुल खिलाते है।



कृष्ण - पुराणों के मतानुसार कृष्ण बचपन से ही आशीकाना मिजाज के थे, गोपियों के साथ कृष्ण का यौन सम्बन्ध था इस विषय पर सारा कृष्ण साहित्य एक मत है इन गोपियों में विवाहित कुंवारी तथा वृद्धाएं भी समलित थीं, जो कि अपने पतियों, भाईयो पिताओ के मना करने पर भी नहीं मानती थी।



प्रमाण -तात्वार्यमाण पतिभिः पितृभिभ्रति॒िवंधुभिः गोंविदा पहृतात्मानो न न्यवर्तत मोहिताः 11811 अंतर्गृहगताः काश्चित् गोप्योऽलब्ध विनिर्गमाः। कृष्णं तद्भावनायुक्तादध्युमीलित लोचनाः ।।9।। दुःसह प्रेष्ठविरहतीब्रता पधुताशुभाः ध्यान ।।1011 प्राप्ताच्युताश्लेषनिवृत्या क्षीणमंगला ।। (श्रीम‌द्भागवत स्कन्द 10 अध्याय 29)



नोट - कृष्ण और गोपियों का अनुचित संबंध था यह बात भागवत मे स्वीकार की गयी है।



उपरोक्त भावार्थ घर वालो के मना करने के बावजूद गोपिया कृष्ण से मिलने गई. जो घर से नहीं निकल सकी, उन्होंने कृष्ण के आलिंगन का ध्यान करते-करते प्राण त्याग दिए।



तमेव परमात्मानं जारवुद्धयाऽपि संगताः।



जुहुर्गणमयं देहें सद्य, प्रक्षीणबंधना ।।11।।



(श्रीम‌द्भागवत स्कंध 10, अ. 29)



अर्थात - कृष्ण के साथ जारबुद्धि से संगत होने के कारण भी उन गोपियों के सांसरिक बंधन नष्ट हो गया तथा उन्होंने अपना भौतिक शरीर छोड दिया।



भागवत के अनुसार विष्णु पुराण भी कृष्ण और गोपियों के अनुचित संबंध स्वीकार करता है।



प्रमाण - ताः वार्यमाणाः पतिभिः पितृभिभ्रतृिभिस्तथा, कृष्ण गोपांगना रात्रौ समयंति रतिप्रियाः 115911 (विष्णु पुराण, अंश 5, अध्याय 13)



अर्थात - वे रतिप्रिय गोपिया अपने पतियों, पिताओं, और भाईयों के रोकने पर भी रात में कृष्ण के साथ रमण करती थी।



बिना पैसे की गुलामी - गोपियां कृष्ण की बिना पैसे की गुलाम थी, कृष्ण उनके सम्भोग के पति थे।



सुरजजाथ! तेऽशुल्कदासिका वरदं निघ्नतो नेहकिंवधः (भागवत स्कंध 10, अध्याय 31-2)



हिन्दू धर्म ग्रन्थों की सत्यता / ३१

अर्थात- हमारे प्रेमपूर्ण हृदय के स्वामी हम तुम्हारी बिना मोल की दासी हैं, तुम सौन्दर्य को चुराने वाले नेत्रों से हमें घायल कर चुके हो. हमारे मनोरथ पूर्ण करने वाले प्राणेश्वर। क्या नेत्रो से मारना नहीं है।



नोट- पौराणि पंडित लोग कहते है कि कृष्ण और गोपियों का यौन सम्बन्ध नहीं धा, कृष्ण नाच गाकर केवल मनोरंजन करते थे इतने प्रमाणों के बाद भी लोगों को भुलावा देने के लिए यह बात कहीं जाती है और प्रमाण देखें रात में कृष्ण गोपियों के साथ जंगल में बुलाकर क्या-क्या करते थे, जिसका विवरण नीचे दिया जा रहा है।



नद्याः पुहिलंनभाविश्व गोपीभिहिमं बालुकम्। रेमे तत्तरलानदं कुकुदामोद वायुना ।। (45) वाहुप्रसार परिरंभ करालकोरू नीवीस्तना। लंभन नर्म नखाग्र पातैः ।। क्ष्वेल्यावलोके हसितै, ब्रर्जसदरी गांमुत्तंमदन रतिपतिं रमयांचकार ।।46।।



(श्रीमद्भागवत् स्कंध 10 अध्याय 29)



अर्थात - कृष्ण ने गोपियों के साथ ठंडी बालू वाले नदी पुलिन पर प्रवेश करके रमण किया, वह स्थान कुमुद की चंचल और सुगंधित वायु से आनंददायक था। बाहें फैलाना, आलिंगन करना, गोपियों के हाथ पकड़ना, दबाना, बाल खीचना, जंघाओ पर हाथ फेरना नीबी एवं स्तनो का स्पर्श करना, गोपियों के नर्म अंगों को नाखूनों से नोचना, तिरछी निगाहों से देखना, हंसी मजाक करना आदि क्रियाओं से गोपियों में काम वासना बढ़ाते हुए कृष्ण ने रमण किया



नोट - जो इतनी क्रियाएं कृष्ण करते थे वह केवल मनोरंजन तक का ही संबंध था। जब कि ऐ सभी क्रियाएं संभोग के पहले की है। वैसे भागवत कार ने सब कुछ लिख दिया है सम्भोग करना भी एक मनोरंजन ही है इस तरह लोग सही ही कहते हैं कि कृष्ण गोपियों के साथ मनोरंजन करते थे।



ब्रह्मवैवर्त पुराण में थोड़ा खुलकर वर्णन-



एकता हरिर्नक्तं वनं वृन्दावनं पयौ। (6) 1



चकार तत्र कुतुकाद विनोद मुरलीस्वरम्।



गोपीनां कामुकी नां च वामवर्धन कारणम् ।। (18)



कामशास्त्रेषु पदगोप्य चुंबनाष्ट विद्यपरम्।



कामिनीनां मनोहारि चकार रसिकेश्वर ।।74।।



अगैरंगानि प्रत्यंगैः प्रत्यंगानि स्मरातुरः ।



चकाराश्लेषणं तत्र कामुकीनां सुखावहम् ।। (75)



एवं गृहेगृहे रम्ये नानां मूर्तिविधाय च ।।



रेमे गोपांगनाभिश्च सुरम्ये रासमंडले।। (70)'



३२ / हिन्दू धर्म ग्रन्थों की सत्यता

अभ्यतर रतिं कृत्वा तार्हिः क्रीडा चकारह। काचित कामवहितुरा कृष्ण बलादाकृष्ण कौतुकात ।। हस्ताद् वंशी निजग्राह वसनं च चकर्षह।। (85)



काचित काम प्रमत्ता च नग्नं कृत्वालु माधवम्। निजग्राह पीतवंस्त्र परिहरस्यं पुर्नददौ ।। 86।। अंगारोद्रेकतसत्त्र वभुव सुंदरो रवः। मूर्छामवापुस्ताः सर्वा नव संगममात्रतः ।।105।। नखदंत प्रहारं च प्रचकार परस्परम्। कृष्णः कररूहाघातं ददौ तासां कुचोपरि।।107।1 श्रोणिदेशे सुकठिने नख चिहनं चकारह। नीविविस्त्रंसिता तासां कवरी क्षुद्रघटिका ।।108।। दूरीभूत सुवसनं सुवेषं समेरोहरम्। आलिंगनं नवविधं चुंबनाष्टविधं मुदा ।।109।। श्रृंगार षोडष विधं चकार रसिकेश्वरः। अंगैरंगानि प्रत्यंगैः प्रत्यंगानि च योषिताम्।। 110।। गोपिभिः सह जग्मुश्च मायाः श्रीकृष्णरूपिकाः। एवं रेमे कौतुकेन कामाः त्रिशंद दिवानिशम्। तथापि मानसं पूर्ण न च किंचित् वभूवह।



(ब्रह्मवैवर्त पुराण कृष्ण जन्म खंड 4, अ. 28)



अर्थात - एक बार कृष्ण राम में वृंदावन गये वहां उन्होंने कौतुकापूर्वक मनोविनोद



करने वाली मुरली बजाई. वह मुरली कामुकी गोपियों में कामवासना बढ़ाने वाली थी। गोपियां उसे सुनकर बन में गयी। रसिक श्रेष्ठ कृष्ण ने गोपियों के आठ प्रकार के उत्तम चुंबन लिए जो काम शास्त्र में भी स्पष्ट नहीं हैं वे चुंबन कामिनी गोपियों के मन हरने वाले थे, कामवासना से आतुर कृष्ण ने अपने अंगो से गोपियों के अंग और प्रत्यंगो से प्रत्यंग चिपकाकर उन कामुकियों को सुख देने वाला आलिंगन किया, यह तो बात हुई वन में पहुंचने वाली गोपियों की घर में बंद गोपियों भी कृष्ण के संपर्क सुख से वंचित नही रही। इस प्रकार कृष्ण ने अपनी विभिन्न मूर्तियां बना बनाकर गोपियों के साथ सुंदर घर-घर में तथा रास मंडल में रमण किया, अंदर (परदे के आड़ में संभोग करके बाहर खेल करने लगे, किसी कामातुरा गोपी ने कृष्ण को बलपूर्वक खींच लिया, हाथ से बंशी छीन ली उनका कपड़ा खींचा, किसी काम मतवाली से कृष्ण को नंगा करके उनका पीला कपड़ा ले लिया और हंसने लगी, वहां श्रृंगार (संभोग) की अधिकता से सुंदर शब्द हुआ। वे सब गोपियां नए संभोग के कारण मूर्छित हो गई, गोपियों और कृष्ण ने एक दूसरे पर नाखून तथा दांतो का प्रहार किया, कृष्ण ने उनके स्तनों पर नाखूनों की चोट की उन के कठोर नितंबों पर श्रीकृष्ण ने नाखूनों के निशान बना दिये, उन



हिन्दू धर्म ग्रन्थों की सत्यता / ३३



गोपियों की नीवी ढीली हो गई, बालों को जुड़ा खुल गया, पैरों और कमर के छोटे-छोटे धुधर अस्त व्यस्त हो गये, उनके सुन्दर बस्त्र और मनोहर वेश अलग हो गए क्योंकि कृष्ण ने नौ प्रकार का आलिंगन और आठ प्रकार का चुंबन किया, रसिक वर कृष्ण ने अपने अंग प्रत्यंगो से गोपियों के अंग प्रत्यंग का सोलह प्रकार का श्रृंगार (संभोग) किया, श्रीकृष्ण का रूप धारण किए हुए उनकी माया (मायारूपी कृष्ण) गोपियों के साथ गई, कामवाणों से पीड़ित गोपियों आनंदपूर्वक जल में कीड़ा की, इस प्रकार कृष्ण कौतुक पूर्वक 30 दिन और रात लगातार रमण करते रहे फिर भी उनका मन तनिक भी पूरा नहीं हुआ।



नोट - साधारण मनुष्य एक बार में केवल एक ही नारी के साथ संभोग कर सकता है। वह भी एक सीमा तक लेकिन कृष्ण तो ईश्वर थे और ईश्वर कुछ भी कर सकता है, वह एक बार में माया से चाहे जितना रूप बना ले और चाहे जितनी औरतों को भोग ले। कृष्ण ने जो गोपियां बन में पहुंची उनके साथ जो नहीं पहुंची उनके पास पहुंच कर उनके घर-घर में, जल में, बाहर अनेकों के साथ लगातार 30 दिन रात सम्भोग किया फिर भी उनका मन नहीं भरा, लगता है कृष्ण सम्भोग करने के लिए ही अवतार लिया था, यह हिन्दुओं के भगवान श्रीकृष्ण का चरित्र है भगवान इसलिए कि कृष्ण पृथ्वी पर आकर अपनी सारी माया शक्ति का प्रयोग संभोग करने के लिए ही लगा दिया था, क्या कृष्ण और गोपियों का सम्बन्ध सामाजिक दृष्टि से उचित था कि एक ही व्यक्ति अपने गांव के आस-पास की रहने वाली अपनी जाति की सभी स्त्रियों के साथ सम्भोग करे। वह इतना भी विचार ना करे की सामाने वाली औरत किसकी बहू या बेटी है, और वह भी धर्म की स्थापना करने वाले ईश्वर जबकि श्रीकृष्ण ने गीता में कहा है कि साधारण मनुष्य श्रेष्ठ मनुष्यों का ही अनुसरण करते हैं तो क्या आज के समाज के लोगों को कृष्ण का अनुसरण करना चाहिए। अगर समाज कृष्ण का अनुसरण करना शुरू कर दे तो इस देश का क्या होता आप खुद सोचे।



कृष्ण का अपनी मामी व बेटी के साथ राधा और कृष्ण की उम्र का अंतर



सकारण था. ब्रह्मवैवर्त पुराण में राधा कृष्ण की मामी बताई गयी है। और इसी पुराण में राधा की उत्पत्ति कृष्ण के बाएं अंग से बताई गई है। दोनों में कौन सही माया जाय फिर भी दोनों में किसी भी सम्बन्ध में कृष्ण का यौन सम्बन्ध गलत था।



प्रमाण -



आविभूव कन्यैका कृष्णस्य वामपर्वतः 112511



तेने राधा समाख्याता गुणवद्भिर्द्विजोत्तम ।।2611



(ब्रह्मवैवर्त पुराण, ब्रह्मपर्व, अध्याय 5)



सार्ध रायाण वैश्येन तत्संबंध चकार स ।।41।।



गोलोके गोपकृष्णांशः संवधात् कृष्णमातुलः 114911



(ब्रह्मवैवर्त पुराण, ब्रह्मपर्व अ. 49)



३४ / हिन्दू धर्म ग्रन्थों की सत्यता

स्खा। अर्थात - कृष्ण के बाए भाग से एक कन्या उत्पन्न हुई, गुणवानों ने उसका नाम राधा



उस राधा का विवाह रायाण नामक वैश्य के साथ कर दिया गया, कृष्ण की जो माता यशोदा थी, रायाण उनका सगा भाई था, गोलोक में तो रायाण कृष्ण का अंश था, पर ब्रज के संबंध मे मामा लगता था।

नोट - कृष्ण के अंश से उत्पन्न होने के कारण राधा कृष्ण की बेटी हुई, और उनके मामा के साथ विवाह होने के कारण कृष्ण की मामी हुई दोनों ही दृष्टि से राधा कृष्ण का यौन संबंध अनुचित था।



राधा की मां भी कामुकी ब्रह्मवैवर्त पुराण में राधा की मां को, भी राधा के समान कामुकी बताया गया है।



तत्कन्या राधिका देवी मातुल्या च कामुकी। चकार नाना भावं से सुशीला स्वापिनंइति ।।811 चतुष्टयष्ठिट कलामानं श्रृंगारं च चकार सः। तया विशिष्टया साकं रासे रसरसोत्सुकः ।।9।। तां नखाग्र क्षतक्षोणी नखक्षतपयोधराम्। लुप्त चंदन सिन्द्रां कवरी शिथिलां सतीम् ।।1011 सुख संभोग मग्नां च नग्नां च शोकमूर्च्छिताम। पुलकांचित सर्वांगी निद्रादेवी समाययौ ।।11।।



(ब्रह्मवैबर्त पुराण, कृष्ण जन्म खंड, अ. 69)



अर्थात - उसकी कन्या राधिका देवी अपनी माता के समान ही कामुकी थी, वह



अच्छे स्वभाव वाली राधा अपने पति के प्रति नाना भाव दिखाती थी, कृष्ण ने चौसठ कलाओं के अनुसार राधा के साथ सम्भोग किया, उस राधा के साथ कृष्ण रास के आनन्द के लिए उत्सुक रहते थे, नाखूनों के घावों के कारण राधा के नितंब तथा स्तन घायल हो गए, उसका चन्दन और सिन्दूर लुप्त हो गया तथा उस सती का जूडा दीला हो गया, राधा सुखकारी संभोग में तल्लीन होकर नंगी हो गयी और कष्ट के कारण उसे मूर्च्छा आ गई. पुलक के कारण राधा का सारा अंग भर गया, राधा को नींद आ गई।



नोट - उक्त प्रसंग में राधा को सुशीला और सती कहा गया है अगर सुशीला और सती नारियां ऐसी थी तो वहां की दुःशीला और वेश्याएं कैसी रही होंगी।



विपरीत रति का स्थाई मजा लेने के लिए पार्वती कृष्ण बनी और शिव राधा बने - महाभागवत में राधा और कृष्ण के बारे में एक बात और कही गयी है, संभाग का स्थाई मजा लेने के लिए पार्वती कृष्ण बनी और शिवज़ी राधा का रूप धारण किए।



प्रमाण -



कृष्णों भूत्वा स्वयं गौरी चक्रे विहरणं मुने!



हिन्दू धर्म ग्रन्थों की सत्यता / ३५

पुरूपेण जगद्धात्रिः प्राप्तायां कृष्णता त्वापि । वृषभानोंः सुता राधा स्वरूपाऽहं स्वयं शिवे।।20।।



(महाभागवत, अध्याय 49)



अर्थात - हे मुनि जी। गौरी ने स्वयं कृष्ण बनकर बिहार किया, शिवजी पार्वती से कहते हैं हे जग‌द्धात्रि! जब तुम कृष्ण बन जाओगी तो मैं वृषभानु की लड़की राधा



के रूप में जन्म लूंगा।



नोट- श्रीम‌द्भागवत् के अनुसार राम द्वापर में कृष्ण के रूप में जन्म लिए थे। और महाभागवत के अनुसार शिवजी राधा के रूप में जन्म लिए और पार्बती कृष्ण बनी, उन दोनों मे श्रीम‌द्भागवत और महाभागवत कौन सही और कौन गलत है।



राधा ने कृष्ण से खुलकर प्यार करने के लिए अपने पति को नपुंसक बनाया -महाभागवत में यह भी बताया गया है कि राधा ने कृष्ण से खुलकर प्यार करने के लिए अपने पति को नपुंसक बना दिया था।



प्रमाण -



शंयस्तु जन्म संप्राप्य बृषभानु गृहेततः स्त्रीरूपं लीलयास्याम राधेत्याख्या मुपागतम् ।।34।। तां राधामुपसंयेमे को पिगोपो महामुने। क्लीवत्वं सहसा प्राप शंभोरिच्छानुसारतः ।।3511 सा राधानुदिनं गत्वा कृष्णं कमल लोचनम् ।।36।।



(महाभागवत, अध्याय 51)



अर्थात - फिर शिवजी ने वृषभानु के घर में जन्म लिया और राधा के नाम से प्रसिद्ध हुए, किसी गोप ने उस राधा के साथ विवाह किया राधा की इच्छानुसार वह नपुंसक हो गया, वह राधा कमल नयन कृष्ण के पास प्रतिदिन जाती थी।



नोट - राधा को अपने पति को नपुंसक बनाने की क्या जरूरत थी, राधा को अपने पति को छोड़कर हमेशा के लिए कृष्ण के पास चली आती, इससे उस बेचारे की जिन्दगी सही सलामत रहती वह दूसरा शादी कर लेता नपुंसक बन जाने से वही जीते-जीते मर गया वह किसी काम का नहीं रह गया।



कृष्ण का वृद्धाओं के साथ - आनंद रामायण मे लिखा है कि कृष्ण ने युवती गोपियां ही नहीं बल्कि अधेड़ और वृद्धाओं को भी नहीं छोड़ा।



प्रमाण-



स वासां काम पूर्त्यर्थ निशि निद्राविवर्जितः, बंधुभ्यां गोपिका मुक्त्वा मातृतुल्य वयोउधिकाः ।।4711



(आनन्द रामायण राज्यसंर्ग 3)



अर्थात - कृष्ण ने रात-रात भर जागकर अपने साथियों सहित अपने से अधिक उम्म्र वाली और माता जैसी लगने वाली गोपियों को भोगा। ऐसा कृष्ण ने गोपियों की इच्छा पूर्ति



३६ / हिन्दू धर्म ग्रन्थों की सत्यता



के लिए किया।



नोट - उपरोक्त बातों से यह लगता है कि वहां की लगभग सभी औरतें एक जैसी थी। कोई भी गोपी पतिव्रता नहीं थी अगर रही भी तो कहने मात्र के लिए। हमारे धर्म शास्त्रियों को भी यह बात अवश्य खटकती होगी कि कृष्ण ने ऐसा क्यों किया। लेकिन धर्मशास्त्रों से ही इसका समाधान निकलता है। और वह यह है कि कृष्ण ईश्वर है। और वह कुछ भी कर सकते हैं उन्हें कोई दोष नहीं लगता।



क्योंकि



पार्वती ने कृष्ण के कारनामें सुनकर शिव से कहा-धर्मसंरक्षणायार्थ जगत्याम् तीर्थ सः ।।



परदाराभिगमनं कथं कुर्योज्जनार्दनः ।।174।।



शिवने कहा-



तयापहृत पापत्वात् सामर्थ्याद व्यापिनः प्रभो। दोषोऽत्रनास्ति सुभगे देवस्य परमात्मनः ।।17511



(पदुम्पुराण, उत्तरखंड, अध्याय 244)



पार्बती ने कहा- उस विष्णु ने तो धर्म की रक्षा के लिए संसार में अवतार लिया था फिर उन्होंने पर नारी (परदारागमन्) क्यों किया।



शिवजी ने कहा- वह व्यापक प्रभु पापरहित है उन्हें कोई दोर्ष नहीं लगता है।



नोट - कितना अच्छा उदाहरण है कि कृष्ण ईश्वर हैं उन्हे कोई पाप नहीं लगता है। मालूम पड़ता है कि ईश्वर को विशेष कर कृष्णको पाप करनेकी पूरी छूट मिली थी वह कितना भी पाप कुकर्म करें उन्हें कोई दोष नहीं लगता था। जब हमारे भगवान ही सारा दुष्कर्म करेंगे तो हम लोग क्या करेंगे। दुःसकर्म करने के लिए हम सभी है ही जब घर का मालिक ही चोर होगा तो बाकी सदस्य क्या होंगे।



पौराणिक साहित्य के अनुसार कृष्ण ने लगभग एक लाख नारियों के साथ



संबंध स्थापित किया, ब्रज में रहकर कृष्ण ने गोपियों से प्रेम किया, वे गोपियां सामान स्तर की थी। क्योंकि ब्रज में कृष्ण स्वयं ही गोप सुत के रूप में पलकर बड़े हुए, वह नरकासुर के वहां से जो सोलह हजार लड़कियां लाए थे वे ही राजकुमारियां थी रूक्मिणि आदि आठ पत्नियों से कृष्ण ने विवाह किया था।



कुब्जा के साथ कृष्ण को प्रेम किसी भी प्रकार से उचित नहीं था। कुब्जा का प्रसंग कृष्ण की ऐयासी प्रवति का ही द्योतक है। मथुरा में पहुंच कर कृष्ण की भेंट सर्वप्रथम कुब्जा से हुई। कृष्ण ने ऊंच-नीच का ध्यान छोड़कर उसी से प्रेम संबंध स्थापित कर लिया। क्योंकि मथुरा में श्रीकृष्ण को नई प्रेमिका खोजने में समय लगता और कृष्ण बिना प्रेमिका के रह नही पाते। एक दासी से प्रेम सम्बन्ध बनाने का एक और मनोवैज्ञानिक कारण यह था कि जिस तरह एक देहाती आदमी शहर में जाकर हीन भावना का शिकार हो जाता है वह उच्चवर्ग के लोगों से सम्पर्क न करके निम्न वर्ग के लोगों से ही सम्पर्क बढ़ाता है। उसी तरह कृष्ण ने कंश की दासी कुब्जा से संबंध बना



हिन्दू धर्म ग्रन्थों की सत्यता / ३७

लिया। कृष्ण के पूछने पर कुब्जा ने अपना परिचय इस प्रकार किया, दास्यस्मि अहं, सुंदर कंससम्मता त्रिबक्रनाना होनुलेपकर्मणि,



मदभावितं भोजपतेरतिप्रियं बिना यवां कोऽन्यतमस्र्दहति ।



(भागवत् स्कंध 10, अध्याय 42-3)



अर्थात - हे सुन्दर! मै कंस के यहां अनुलेप कर्म में रत त्रिबका तीन जगह से कुबड़ी नाम की दासी हूं। भोज नरेश कंस को अति प्रिय मेरा अनुलेप (चंदन) आप दोनों से सिवा और कौन चाह सकता है।



भागवत के अनुसार कुब्जा पहली ही मुलाकात में मोहित हो गयी थी-



रूपपेशलमाधुर्यहसितालापवीक्षितैः।



धर्षितात्मा ददौ सान्द्रमुभयोर नूलेपनम् ।।4।।



अर्थात - उसने रूप, सुकुमारता, रसिकता, हंसी, बातचीत एवं चितवन से मुग्ध होकर दोनों को गाढ़ा चन्दन दिया।



(भागवत, स्कन्ध 10, अध्याय 42)



नोट - इसमें कुब्जा का दोष नहीं हैं, क्योंकि कृष्ण ने इसके लिए स्वयं कुब्जा को उत्साहित किया था।



प्रमाण



अथ ब्रजन् राजपथेन माधवः।



विलोक्य कुब्जां युवतीवरानां प्रपच्छ



स्त्रियं गृहीताम्ड़विलेपभाजनाम् यान्ती प्रहसन् रसप्रदः कांत्वं वरोर्वेतदु हानुलेपनं कस्याम्ड़ नेवाकथयस्व साधुनः ।।211



(भागवत स्कंध 10 अध्याय 42-1-2)



अर्थात - कृष्ण राजमार्ग पर जा रहे थे कि उन्होंने एक सुन्दर मुख वाली कुबड़ी युवती को अंगविलेष का बरतन ले जाते हुए देखा, रसिक कृष्ण ने हंसते हुए उस राह चलती से पूछा, है सुन्दर जंघाओ वाली तुम कौन हो, हे सुंदर अंगो वाली यह अनुलेप किसका है हमें ठीक से बताओ।



नोट - जिस औरत को सारा नगर कुरूप कुबड़ी कहकर अपमानित करता था। उसे कोई बरोरू और अंगना कहे इससे अधिक आकर्षण उसके लिए क्या हो सकता है। कोई भी नारी अपने-आपको कुरूप नहीं समझती, जिसे सब कुरूप कहकर घृणा करते थे उसे कोई सुन्दरी कह दे तो वह उस पर न्योछावर हो जाती है। कुब्जा को कृष्ण के प्रति आकर्षित होने का यही कारण था।



सभी लोग सुन्दर नारियों से प्रेम करते है कृष्ण भी ब्रज में यही करते रहे। मथुरा में कोई सुन्दरी नहीं मिले तो कुबड़ी से ही प्रेम कर लिया और बाद में उसे सुन्दर बनाने की सोची, कृष्ण ईश्वर थे वे सब कुछ कर सकते थे फिर उन्हें अपने कुबड़ी प्रेमी का को सुन्दर बनाने में क्या अड़चन थी।



३८ / हिन्दू धर्म ग्रन्थों की सत्यता

ऋज्वी कुर्तु मनष्चक्रे दर्शयन् दर्दर्न फलम्। (6) पभ्दयामाक्रम्य प्रपदे द्वयग्डुयुत्तानपाणिना । प्रगृहा चुबुकऽध्यात्ममुदनीनम दच्युतः ।।6।। सातदर्जुसमानांगी बृहच्छोणि पयोधरा। मुकुन्दस्पर्शनात सद्यो वभूव प्रेमदोत्तमा ।।8।। ततो रूपगुणौदार्य सम्पन्ना प्राह केशवम्। उत्तरीयान्तमाकृष्य स्मयनती जातहृच्छया ।।9।। एहिवीर गृहं यामो न त्वां त्यक्तुमिहोत्सहे। त्वयोन्मथितचित्तायाः प्रसीद पुरुषर्षभ ।।90।। एवं स्त्रिया याच्यमानः कृष्णो रामस्य पश्चतः । मुखं वीक्ष्यानुगानां च प्रहसंस्तामुवाच ह ।।1111 एष्यामि ते गृहं सुभूः पुंसामाधिविकर्शनम् । साधिताथोऽगृहाणा नः पान्थानां त्वं परायणम् ।।12।।



(भागवत स्कन्ध 10, अध्याय 42)



अर्थात - भगवान श्रीकृष्ण ने प्रसन्न होकर उस तीन जगह से टेढ़ी सुमुखी कुब्जा



को सीधी करने का विचार किया, वह उसे अपने दर्शन का फल भी दिखाना चाहते थे, कृष्ण ने अपने दोनों पैरों से कुब्जा के पैरों पंजो को दबा दिया और उठे हुए हाथ की दो अंगुलियो से ठोड़ी पकड़कर उसे उचका दिया, इतने से ही वह सीधी और समान शरीर वाली बन गयी, उसके नितंब और स्तन विशाला हो गये, कृष्ण के छूते ही वह नारियों में श्रेष्ठ बन गयी, रूप, गुण और उदारता से युक्त वह कुब्जा तब कृष्ण के प्रति कामासक्त होती हुई उनके दुपट्टे का सिरा खींच कर बोली हे वीर आओ हम लोग घर चलें मै तुम्हे छोड़ना नहीं चाहती, तुमने मेरा मन मथ डाला है, हे पुरूष श्रेष्ठ आप प्रसन्न हो बड़े भाई बलराम के सामने ही नारी ने कृष्ण से काम याचना की, कृष्ण ने नौकरों का मुख देखकर हंसते हुए कुब्जा को उत्तर दिया हे सुन्दर भौहों वाली मैं तुम्हारे घर आउंगा तुम्हारा घर मनुष्यों का मानसिक कष्ट मिटाने वाला है, मैं तुम्हारी इच्छा पूरी करूंगा, हम बेघर पर्थियों का तो तुम्ही सहारा हो।



नोट - बड़े भाई और नौकरों के सामने ही कुब्जा ने कृष्ण को अपने घर चलने का प्रस्ताव किया और कृष्ण ने उसे स्वीकार भी किया। कृष्ण जब निर्लज्ज होकर कुब्जा का प्रस्ताव बड़े भाई के सामने स्वीकार कर लिया तो कृष्ण को उसी समय कुब्जा के घर चले जाना चाहिए था। बलराम और नौकर कुछ समय वहीं इन्तजार कर लेते, कृष्ण ने कुब्जा का घर "पुरूषों का आधिविकर्षण" कहा है। इसे आम भाषा में दिल बहलाने या गम गलत करने का स्थान कहा जाता है तो क्या कुब्जा वेश्या भी थी क्या कृष्ण जैसे बेघर वार मुसाफिरों को वेश्या के घर का ही सहारा था।



कंस वध के बाद कृष्ण का कुब्जा के घर जाना- कंस वध के बाद कृष्ण कुब्जा के



हिन्दू धर्म ग्रन्थों की सत्यता /



३९

घर गये और



अथ विज्ञाय भगवान् सर्वत्मा सर्वदर्शनः सैरेन्ध्याः कामतप्तायाः प्रियामिच्छन् गृहं ययौ ।।1



महार्होपस्कैराढ्यं कामोपायोपवृंहितम्। मुक्तादामपताकामिर्वितान शयनासनैः ।।2।।



गृहं तमायान्तमवेक्ष्य साऽऽसनात्। सद्यः समुत्थाय हिं जात सम्भ्रमा। यथोपराम्य सखीभिरच्युतं. सभाजयामासं सदासनादिभिः ।।3।।



तथोद्वव साधु तयाभिपूजितो, न्यषिददुर्व्याभमिमृश्य चासनम्। कृष्णाऽपि तूर्ण शयनं महाधनं, विवेश लोका चरितान्यनुब्रतः ।।4।।



सा मज्जनालिलेपंदुकूलभूषण, सगमन्धताम्बूलसुधासवादिभिः प्रसाधितात्मापसारं माधवं। सवी डलीलोत्स्मितविभ्रमेक्षितैः ।।5।।



कंकणभूषिते करे। प्रगृहा शय्यामधिवेश्य रामयाऽनुलेपार्पणपुण्यलेश्यां ।।6।। रानऽम्न्तप्तकुच योरूरसस्तथाक्ष्णो-जिघ्रन्त्यनन्तचरणेन रूजो मृजन्ती दोर्थ्यास्तनान्तरगतं परिरभ्य कान्त-मानन्द मूर्तिमजहाति दीर्घतायम् ।।6।।



सैवंकैवत्यनाथं तं प्राप्य दुष्प्रापमीश्वरम्।



अंगरामगार्पणेनाहो दुर्भगेदभयाचतं ।।8।। आहोष्यमामिह प्रेष्ठ दिनानि कातिचिन्मया। रमस्व नोत्सहे त्यक्तुं संग तेऽमुब्रूहेक्षण।।9।। तस्यैकामवरं दत्वा मानयित्का च मानदः। सहाद्धवेन सर्वेशः स्वधममागमदर्चितम् ।।10।।



(भागवत स्कंध 10. अध्याय 48)



अर्थात - सर्वदर्शन, सर्वात्मा भगवान कृष्ण कामतप्ता सैरन्धरी कुब्जा दासी के वहां उसका प्रिय करने की इच्छा से उसके घर गये, उस कुब्जा का बहुमूल्य समान से भरा पड़ा था, उसमें मोती की मालाएं, झंडे तंबू और सोने के पलंग उपस्थित थे। वह सुगंधित धूप, दीप माला और सुगंधित वस्तुओं से सुशोभित था, कृष्ण को घर आया



४० / हिन्दू धर्म ग्रन्थों की सत्यता

देखकर कुब्जा संभ्रमशीघ्रता से उठ बैठी, संखियों के साथ कृष्ण की अगवानी की और सुन्दर आसन आदि से उन का स्वागत किया, कुब्जा ने उध्दव की भी ठीक से पूजा की वह आसन लेकर धरती पर बैठ गये, कृष्ण भी सांसारिक आचरण का अनुगमन करते हुए मुल्यवान उसकी सेज पर तुरन्त जा बैठे, तब कुब्जा स्नान, अंगराग, वस्त्र, आभूषण, हार, गन्ध (इत्र आदि) ताम्बूल और शराब आदि से अपने को खूब सजाकर लीलमयी लजीली मुस्कान तथा हाव-भाव के साथ कृष्ण की ओर देखती हुई उनके पास आई। कृष्ण ने नव संगम की लज्जा से शंकित प्रिया कुब्जा को उसका कंगन शोभित हाथ पकड़कर उसे चारपाई पर बैठा लिया, अनुलेप (चन्दन) अर्पण कर के थोड़ा सा पुण्य कमाने वाली कुब्जा के साथ कृष्ण ने रमण किया कुब्जा ने अपे कामतप्त कुर्ची पर हृदय पर तथा आंखों पर कृष्ण के पैर रखे तथा उन्हें सूंघ कर अपना काम रोग शांत किया, कुब्जा ने आनंद मूर्ति को हाथों से लपेट कर दोनों स्तनों को बीच में आलिंगन करके चिरसंचित दुःख दूर कर लिया इस प्रकार उस कृष्ण को पा लिया, वह अभागिनी इस प्रकार याचना करने लगी हे प्रिय! कुछ दिन मेरे साथ निवास कीजिए। तथा रमण करिए हे कमल नयन मैं आपका साथ नही छोड़ना चाहती, सबका सम्मान करने वाले कृष्ण ने कुब्जा को अभिष्ट वर दिया। और उसका सम्मान किया, फिर कुछ दिन रहकर कृष्ण उद्धव के साथ अपने घर चले गये।



नोट - कुब्जा के ठाट बाट से यह मालूम पड़ता है कि वास्तव में कुब्जा वेश्या थी। नहीं तो एक साधारण दासी के पास उसके महल में जितना सोना, चांदी, मोती माला आदि का वर्णन मिलता है वह कहां से आता और उसके हाथ-भाव से भी यही मालूम पड़ता है।



कुब्जा पहले जन्म में वेश्या थी- कुब्जा इस जन्म में वेश्या रही हो या न रही हो



लेकिन त्रेता युग में वह आन्नद रामायण विलास काण्डल अध्याय 8 श्लोक 48 से 61 तथा 97-98 के पढ़ने से साफ पता चलता है कि वह राम औतार में पिंगला नाम की वेश्या थी और राम के पास गयी थी तथा सीता के श्राप के कारण द्वापर में कुबड़ी हुई थी।



ब्रह्मवैवर्त पुराण में कुब्जा कृष्ण की आराधना करने वाले वैष्णव धर्म के दूसरे पुराण ब्रह्मवैबर्त में कुब्जा को पूर्वजन्म में रावण की बहन शुर्पनखा माना गया है। वह उस जन्म में राम को प्राप्त नहीं कर सकी थी ब्रह्मवैवर्त पुराण में कृष्ण और कुब्जा के संभोग का भी थोड़ा बर्णन है।



निद्रां च लेभे सा कुब्जा निद्रेशोऽपि ययौ मुदा।।53।। बोधयामास तां कृष्णो न दासीश्चापि निद्राताः।



तामुवाच जगन्नाथो जगन्नाथप्रियां सतीम् ।।55।।



त्यज निद्रां महाभागेः श्रृंगार देहि सुंदरी।



पुरा शूर्पणखा त्वं च भगिनी रावणस्य च।।56।।



हिन्दू धर्म ग्रन्थों की सत्यता /



४१

रामजन्मानि मद्वेतोस्त्वया कांते तपः कृतम् ।।57।1



अधुना सुखसंभोग कृत्वा गच्छ ममालयम् ।।5811 इत्युक्त्वा श्रीनिवासश्चकृत्वा तामेव वक्षसि । नम्नां चकार श्रृंगारं चुम्बनं चापि कामुकीम् ।।59।।



सा सस्मिता च श्रीकृष्णं नवसंगम लज्जिता।



चुचुंम्ब गंड़े क्रोडे तां चकार कमलां यथा । 160।।



सुरते विरतिर्नास्ति दंपति रति पाण्डितौ। नाना प्रकारं सुरतं वभूव तत्र नारद् ।।61।।



स्तनश्रोणि युगं तस्या विक्षतं च चकारह।



भगवान् नखैस्तीक्ष्पौदर्शनैरधनं वरम् ।।621। निशावसान् समये वीर्याधारं चकार सः।



सुखसम्भोग भोगेने मूर्छामाप च सुंदरी 1163।।



तत्रा जगाम तां तन्द्रा कृष्ण वक्षःस्थलस्थिताम् ।।6411 भगवानपि तत्रैव क्षणं स्थित्वा स्वमंदिरम्। जगाम यत्र नंदश्च सानंदो नंदनंदन ।। 69।।



(ब्रह्मवैवर्त पुराण, अध्या 72)



अर्थात (कुब्जा) अपने घर में सो गयी, श्रीकृष्ण आनन्दपूर्वक वहां पहुंच गये, कृष्ण ने उस कुब्जा को जगाया, उसकी सोती हुई दासियों को नही) विष्णु की प्रिया उस साध्वी कुब्जा से बोले हे भागशालिनी नींद छोड़ दे मुझे श्रृंगारदान दे, पूर्व जन्म में तू रावण की बहन सुर्पेण्खा थी, हे प्रिये। जब मैंने राम जन्मलियाथा तो तूने मेरे कारण बड़ी तपस्या की थी, अब सुखदायक सम्भोग कर के मेरे धाम (मोक्ष) को जाओ। ऐसा कहकर कृष्ण ने उसे छाती पर डाल लिया, उन्होंने कुब्जा को नंगा करके सम्भोग किया तथा उस कामुकी का चुंबन लिया, उस कुब्जा ने मुस्कराते हुए और जब संगम से लज्जित होते हुए श्रीकृष्ण का गाल चूमा और लक्ष्मी के समान उन्हें भुजाओं मे भर लिया, कुब्जा तथा कृष्ण दोनों ही संभोग में कुशल थे, अतः उनका सुख समाप्त नहीं हो रहा था, वही अनेक प्रकार का सूरत हुआ, भगवान कृष्ण ने अपने तीखे नाखूनों से उसके दोनों स्तनों तथा नितंबो को घायल कर दिया, एवं दातों से सुन्दर होठों को काट लिया, उन्होंने रात्रि को समाप्ती पर कुब्जा में विर्याधान किया, सुख दायक सम्भोग के कारण वह सुन्दरी बेहोश हो गयी और कृष्ण की छाती पर पड़े-पड़े सो गयी, भगवान कृष्ण भी वहां थोड़ी देर ठहर कर अपने घर आ गये जहां नन्द ठहरे हुए थे।



नोट- ब्रह्मवैवर्त पुराण के अनुसार कुब्जा साधारण नारी नही थी उसके यहां बहुत सी दासिया थी, राम को पाने के लिए शुर्वेण्खा ने जो तप किया था, उसे कौन नहीं जानता, नाक, कान कटवा लेना क्या साधारण तपस्या है और वह भी एक नारी को



४२ / हिन्दू धर्म ग्रन्थों की सत्यता

तपस्या का फल अवश्य मिलना चाहिए, यदि ईश्वर अपने भक्तो को तपस्या का फल नहीं देंगे तो उनका फिर तपस्या कौन करेगा, बिना लाभ का धंधा कम से कम सांसारिक लोग तो कर ही नहीं सकते लेखक ने कृष्ण और कुब्जा के लिए "दंपति" शब्द का प्रयोग किया है, जब कि दंपति शब्द पति-पत्नी के लिए किया जाता है, तो क्या कुब्जा भी कृष्ण की पत्नी थी, लेकिन किसी भी ग्रन्थ में कुब्जा कृष्ण के विवाह का वर्णन नहीं मिलता है।



जब कि कुब्जा ब्रह्मवैवर्त पुराण के अनुसार वृद्धा थी



प्रमाण - श्रीमद्भागवत में कुब्जा को युवती तथा ब्रह्मवैवर्त पुराण में वृद्धा बताया गया है, इसमें कौन गलत है कौन सही यह कृष्ण के भक्त लोग ही जानें।



त्वया कुब्जा च सुंभक्ता वध्दा क्षत्रियमानिनी, अपुत्रिणी चाधिकांगी मूलास्पृश्या च प्राक्तनात् ।।



(कृष्ण जन्म खंड, उत्तरार्थ अध्याय 124)



अर्थात - हे कृष्ण, तुमने कुब्जा के साथ संभोग किया जो वृद्धा, स्वयं को क्षत्रिय मानने वाली, पुत्ररहित, अधिक अंग वाली मूला तथा पहले से ही अछूत थी।



ब्रह्मा का अपनी बेटी के साथ संभोग करने का संकल्प-



प्रमाण - वाचं दुहितरं तन्वी स्वयम्भूर्हरती मनः।



अकामां चकमेक्षतः सकाम इति नः श्रुतम् ।। 28।।



तम धर्म कृतमति विलोक्य पितरं सुताः।



मारीचिमुख्या मुनयो विश्रम्भात्प्रत्यबोधयन् ।। 29।।



नैतत्पूर्वैः कृतं त्वद्य न कारिण्यन्ति चापेर । यत्तवं दुहितरं गच्छेरनिगृह्याडंजं प्रभः



अर्थात - विदुर जी। भगवान ब्रह्मा की कन्या सरस्वती बड़ी ही सुन्दर सुकुमारी



और मनोहर थी। एक बार ब्रह्मा ने उसे देखकर काम मोहित हो गये, यद्यपि वह वासना हीन थी, उन्हें ऐसा अधर्म संकल्प करते देख उनके पुत्र मारीचि ने तथा ऋषियों ने रोका और समझाया पिताजी, आप समर्थ है फिर भी अपने मन में उत्पन्न काम वेग को न रोक कर पुत्री गमन जैसी दुष्कर्म पाप करने का संकल्प कर रहे हैं, ऐसा तो आप से पूर्ववर्ती किसी ब्रह्मा ने नही किया था और न कोई आगे करेगा।



नोट - यहां पर ब्रह्मा मान गये हैं लेकिन ब्रह्मा की पत्नी सरस्वती ही है। यह प्रमाण नहीं मिल पाया है कि ब्रह्मा ने कब सरस्वती से शादी की।



कुछ और देवताओं के वर्णन संक्षिप्त में -



प्ररासर मुनी का योजना गन्धा एक नबालिग लड़की से सम्भोग करना कहां तक उचित था।



वृहस्पति महाराज का अपनी भाभी के साथ सम्भोग करना कहां उचित था, जिससे ग्रीन ब्राह्मण वंश का जन्म हुआ।



इन्द्र का गौतम ऋषी की नारी अहिल्या के साथ रूप बदलकर सम्भोग करना



हिन्दू धर्म ग्रन्थों की सत्यता / ४३

कहां तक ठीक था।



भगवान विष्णु का जालंधर की औरत बिन्दा के साथ रूप बदलकर सम्भोग करना कहां तक न्याय था।



नोट - ये है हिन्दू धर्म ग्रन्थों के नायक, हमारे सबसे बड़े-बड़े देवताओं के चरित्र जो किसी की भी सुन्दर और हो, चाहे वह बेटी या मां के समान ही क्यों न हो उसके साथ छल, कपट किसी भी तरह से सम्भोग करना इनका परम कर्तव्य था। और जब बड़े-बड़े देवता लोग ऐसा करते थे तो छोटे-छोटे देवता मुनि लोग तो कही भी मुंह काला करने से नहीं चूकते रहे होंगे। इन्हीं धर्म ग्रंथों पर हमारे पूर्वज व हम नाज करते आ रहे है। और उनकी प्रशंसा करते नही थकते है।



ब्राह्मण अछूत नारियों के साथ व्यभिचार करना तीर्थ समझते थे



प्रमाण - महर्षि दयानन्द सरस्वती ने पुस्तक 'सत्यार्थ प्रकाश" मे लिखा है पेज



318 से 323



रजस्वला पुष्कर तीर्थ, चाण्डाली तु स्वयं काशी। चर्मकारी प्रयाग, स्याद्रजकी मथुरा मता।। (अयोध्या) पुक्कस प्रोक्त (रुद्रयामलतंत्र)



अर्थात - रजस्वला के साथ समागम करने से जानो पुस्कर का स्नान बराबर फल मिलता है, चाण्डाली (मेहतारी) के साथ सम्भोग करने से काशी की यात्रा के समान है, धोबीन के साथ सम्भोग करने से मथुरा यात्रा और कंजरी के साथ समागम करने से अयोध्या तीर्थ करने के बराबर है।



नोट- अगर इनके बताये गये नियमों के अनुसार आज के समाज लोग तीर्थ करना शुरू कर दें, तो इस का पतन होने से कोई नहीं बचा सकता है।



विवाह न करने पर पवन देव ने कुबड़ी बनाया- बाल्मीकि रामायाण सर्ग 32



श्लोक 13 से 23 तक में लिखा है कि कुशनाम की सौ राज्य कन्यायें गाती, बजाती और नृत्य करती हुई परम अमोद प्रमोद में मग्न हो गयी। उनकी सुन्दरता को देखकर वायु देव ने उन सभी से अपने साथ शादी करने को कहा। इस पर वे कन्यायें कहने लगी कि हमारे पिताजी जिनको हमारा हाथ पकड़ा देगें हम सभी उन्हीं की हो जाऊंगी, इसलिए आप हम सभी से यह अनुचित प्रस्ताव करके हमारा अपमान कर रहे हैं। इस पर वायु देवता नाराज हो कर उन सभी को कुबड़ी बना दिया।



नोट- यह है हमारे देवताओं का चरित्र कैसा अन्याय कैसी जबरदस्ती।



४४ / हिन्दू धर्म ग्रन्थों की सत्यता

अध्याय 4
रावण की उपेक्षा क्यों राम की नहीं



जबकि - रावण एक चरित्रवान ऐतिहासिक नायक है फिर भी धर्म ग्रन्थों में राव



की पर्याप्त उपेक्षा की गयी है। जिसका लक्ष्य इतिहास को तोड़-मरोड़कर रावण को अति विकृत रूप में प्रस्तुत करके चरित्र्य हत्या करना है। यह इतिहास के प्रति भयंकर अन्याय है ही साथ ही साथ ही साथ सामाजिक न्याय के बुनियादी सिद्धान्तों के प्रति विश्वासघात भी है। जबकि रावण एक चरित्रवान राजा था इसलिए रावण के चरित्र का सही तौर पर विश्लेषण यथावत अध्यात्मक इतिहास सुरक्षित रखने की दृष्टी से अनिवार्य हो गया है। क्योंकि ऐसे नायकों के जिन्होंने न केवल अपने युग में वरन इतिहास में सर्वदा सर्वदा के लिए एक अमिट छाप छोड़ दी है। जिसके ऊपर इतिहास की आधार शिला निर्मित है। उनके चरित्र को विकृत करने का पूरा सफल प्रयास किया गया है। चाहे जिन कारणों से की गयी हो इस दृष्टी से सिर्फ रावण के चरित्र का वर्णन करना अनिवार्य हो गया है।



रावण - यह शब्द उच्चारित होते है जो लोग रामायण से जरा भी परिचित हैं एक अति कुरूप दशमुखों वाला और बींस भुजाओ वाले अत्यन्त वीभत्स व्यक्ति का छाया चित्र मन में बना लेता है। जबकि महर्षि बाल्मीकि के मतानुसार तो रावण महात्मा और पुण्यात्मा था केवल पक्षपात्र के कारण रावण को घृणित शब्दों से याद करते हैं, जबकी बाल्मीकि महर्षि ने रावण के बारे निम्न प्रकार लिखा है।



महाजनंसमाकीर्ण सिंहैरिव महद् बनम् ।।11।।



अर्थात- जिस प्रकार बन सिंहों से परिपूर्ण रहते हैं उसी प्रकार वह नगरी महानों (महापंडितों) से समाकुल थी ।



नोट-जिस नगरी से विद्वानों का समुदाय था वहा का राजा कैसा रहा होगा यह आप खुद सोचें।



महात्मनों महद् वेश्म महारत्नपरिच्छदम्।।13।।



महारत्नसमाकीर्ण ददर्श स महाकपिः ।।1411



(वा.रा. 5, 6)



अर्थात- उस महात्मा रावण को जो महारत्नो से समाकीर्ण थी, उसे हनुमान



हिन्दू धर्म ग्रन्थों की सत्यता / ४५

ने देखा। कांजचनाडंगदसंनद्धौ ददर्श स महात्मनः (5, 10, 15)



था। अर्थात- उस महात्मा रावण की भुजा में मणिमय सुवर्ण बाजूबन्द पड़ा हुआ



स रावणं महात्मानं बिजने मन्त्रिसंनिधौ (6, 10, 12)



था। अर्थात- वहां उस महात्मा रावण के साथ मंत्रियों के अलावा अन्य कोई न



नोट - उपरोक्त श्लोकों में महर्षि बाल्मीकी ने निष्पक्ष भाव से रावण को महात्मा की उपाधि से विभूषित किया है। फिर भी लोग महर्शि द्वारा प्रतिपादित सिध्दान्तों की अवहेलना करके रावण को अनेक कुरूचिपूर्ण संबोधन से संबोधित करते है। जैसे- पातकी, नीच, कलंकी, दुष्ट, व्यभिचारी, पापी आदि शब्दों से अभिभूषित करते है। जिस महर्षि को संपूर्ण साहित्य संसार आदि कवि तथा राम चरित्र दृष्टा कहकर अभिनंदित करता है उन्ही के महावाक्यों को जब कुदृष्टि प्रतिपादित करने का प्रयास करते हुए अपनी विद्वता का सबुत पेश करते है।



एक अन्य उदाहरण पर दृष्टपात करें हनुमान सीता की खोज में लंका गये हुए है। प्रातः काल के सुहावने समय में जब सीता खोज में व्यस्त थे उसी समय प्रत्येक राक्षस के घर से निःसत होती हुई कर्ण मधुर वेदध्वनि उन्होने सुनी।



षडंगवेदविदुषा क्रतुप्रवरयाजिनाम्।



शुश्राव ब्रह्माघोषान स विरात्रे ब्रह्मरक्षसाम ।। (5,18,2)



अर्थात- शत्यवसानानंतर षडंग बेदों के ज्ञाता और उत्तमोत्तम यज्ञो के करने वाले ब्राह्मणत्व से विशिष्ट राक्षसों के बेदपाठ की ध्वनि हनुमान ने सुनी।



बेद पाठात भवोविप्र - अतएव लंका में रहने वाला प्रत्येक राक्षस विप्र हुआ, क्योंकि बेदपाठ की ध्वनि प्रत्येक राक्षस के घर से आ रही थी, ऐसा हनुमान ने देखा।



नोट- लंका में रहने वाले सभी विप्र थे और उन्हे राक्षस कहा जाता है। जब कि सभी षडंग बेदों के ज्ञाता थे, तो यहा पर रहने वाले उनसे बडे ही राक्षस हुए। क्योंकि यहा पर षडंग बेदों के ज्ञाता बड़े मुश्किल से एक आध मिलेंगें। जबकि जिस रावन को लोग नीच पातकी कहते नहीं थकते उसकी राजधानी में घर-घर वेद्याठी थे, तथा घर-घर हवन कुडं थे। ऐसा हनुमान ने स्वय देखा तब भी लोग रावण को नीच पातकी अधर्मी आदि कहते ही रहेंगे। क्योंकि वर्तमान व्यास पंडितों के वाक्य कटुता तथा उनके मन में भरी हुई अंधभक्ति भावना पढ़ने समझने के बाद भी उन्हे आगे आने का साहस नहीं करने देती।



रावन के महलो में सदा वैद्यविद्या के अनुसार ही कर्मानुष्ठादि सम्पन्न होते थे। इसलिए हम जिन देवताओं को पूजते हैं वह रावण को पूजते थे। (आदर करते थे)



४६ / हिन्दू धर्म ग्रन्थों की सत्यता

तथा आज्ञा पालन करने के लिए सदैव तैयार रहते थे। अगर कोई कहे कि रावण के डर से देवता लोग उसकी सेवा टहल करते थे तो प्रश्न यह उठता है कि क्या देवता लोग मिट्टी के माधव के समान व्यर्थ एवं भीरू थे। और जो हिन्दू अपनी रक्षा के उद्देश्य से उनकी पूजा अर्चना करते है तो वह व्यर्थ ही करते है। क्योंकि जो देवता खुद अपनी रक्षा नही कर सकता वह दूसरों का क्या करेगा। लेकिन ऐसा नही है। क्योंकि महर्षि बाल्मीकि का रामायण कहता है कि रावण पुण्यात्मा एवं धर्मात्मा था जिससे देवता स्वयं उसके गुणों पर मुग्ध होकर उसकी पूजा व उपासना करके अपने आपको धन्य समझते थे ।



प्रमाण -



गृहाणि नानाससुराजितानि, देवा सुरैश्चापि सुपूजितानि । सवैश्चदोषौः परिवर्जितानि, कपिर्ददश स्ववलर्जितानि 113 (बाल्मीकि रामाण 5,7)



अर्थात- विविध प्रकार के रत्न द्रव्यों से परिपूर्ण, क्या देवता क्या असुर सब से पूजित (अर्थात क्या देवता क्या असुर सभी इन में रहने तथा रावण की पूजा करने की अभिलाषा रखते थे। समस्त दोषो से सहित तथा रावण के स्वभुजबल से अर्जित इन उत्तम भवनों को हनुमान ने देखा ।



नोट- यदि हम यह मान भी लें कि देवता लोग रावण के डर से रावण को पूजते थे तो महर्षि बाल्मीकि ने श्लोक में "सुपूजितानि तथा सर्वेश्च दोषैः परिवजितानि"



शब्द का प्रयोग महाकवि ने क्यों किया। क्या ए शब्द आदर तथा सम्मान के द्योतक नहीं है क्या ये रावण की निष्कलंकता प्रमाणित नहीं करते, यहां 'सु' शब्द से महर्षि ने देवों का रावण की पूजा के प्रति अनुराग दिखाया है अतः यह सिद्ध होता है कि देवता स्वइच्छा से रावण की पूजा व सेवा टहल करते थे, न कि रावण के डर से।



और- हनुमान लंका का शोभा एवं पवित्रता को देखकर सोचे सवर्गोऽयं देवलोकोऽयामिन्द्रस्यापि पुरी भवेत।



सिद्धिर्वेयं परा हि स्यादित्यमन्यत मारूतिः ।।301। (बा.रा. 5, 9)



अर्थात- यह साक्षात् स्वर्गलोक है, देवलोक है इन्द्र की अमरावती नगरी है, अथवा अन्य कोई परिसिद्धि है।



महर्षि बाल्मीकि रावण की प्रशंसा करते नहीं अघाते है एक स्थान पर वह कहते है।



न तत्र काश्चित् प्रमदाः प्रसह्य वीर्योपपन्नेगुणेन लब्धाः न चान्यकामापि न



हिन्दू धर्म ग्रन्थों की सत्यता / ४७



चान्यपूर्व बिना बरार्टी जनकात्मजा तु।। (बा. रा. 5, 9, 70) अर्थात - रावण बड़ा पराक्रमी था फिर भी वह बलपूर्वक वह किसी को हरकर



नहीं लाया था. (जो वह चाहता तो आसानी से कर सकता था) सम्मान योग जानकी को छोड़कर अन्य बहुत सी स्त्रियां रावण के सौंदर्यादि गुर्गों पर मुग्ध होकर स्वयं ही उसके साथ चली आई थी। उन में से कोई भी स्त्री ऐसी नहीं थी जो दूसरे किसी को प्यार करती हो अथवा अन्य किसी पुरुष के साथ संयोग हुआ हो. अर्थात हनुमान ने वहां जितनी भी स्त्रियों को देखा वे सब रावण को पति मानने वाली थी उनमें अकुलीन, कुल्टा तो एक भी नहीं थी।



नोट - महर्षि उपरोक्त श्लोकां में कहते है कि बिना कामिनी के इच्छा के



उसमें किसी को अपनी औरत नहीं बनाया क्या यही रावण के चरित्र की उदारता का परिचायक नहीं है कि उसने सीता का हरण करके लगभग ढाई मास तक अपने पास रखा पर उसके सातित्व के हरण का कभी प्रयास नहीं किया कुछ लोग कहते हैं कि सीता ऐसी तेजस्विनी थी कि रावण उनके पास बुरी नियत से जाता तो वह उनके तेज से जलकर भष्म हो जाता, लेकिन ये सब कहने की बात है जनता को भुलावा देने के लिए साफ झूठ बोलते हैं। क्योंकि पंचवटी में जब रावण सीता को अपने गोद में उठाया तो उन्होंने क्यों नही भष्म किया। अगर उनके पास ऐसी कोई शक्ति होती तो वह रावण को पंचवटी में ही जलाकर भष्म कर चुकी होती. तो इससे साफ जाहिर होता है कि सीता के पास कोई ऐसी शक्ति नहीं थी जो रावण को जलाकर भस्म कर सके।



रावण के जीवन काल में केवल एक कलंक आता है और वह सीता हरण का लेकिन रावण ने सीता का हरण करके कोई अनुचित कार्य नहीं किया था, क्योंकि रावण की बहन सुर्पेण्खा का नाक, कान राम के कहने पर लक्ष्मण ने काट लिया था। अब सवाल यह उठता है कि लक्ष्मण ने सुर्येण्खा का नाक, कान क्यो काटा, तो उसमे सुर्पेण्खा को कोई दोष नहीं था। कारण "श्वेतकेतु कथा" में कहा गया है कि उस समय स्त्रियां स्वतंत्र थी वे बिना रोक-टोक के कहीं भी आ जा सकती थीं। और सुर्पेण्खा को केवल राम के सुन्दरता पर मोहित होकर उनके पास शादी का प्रस्ताव लेकर गयी थी। इस पर दोनों भाई उसका पूरा उपहास उड़ाये राम कहे मेरी शादी हो गयी है, मेरा भाई लक्ष्मण कुंवारा है उससे शादी कर लो जब कि लक्ष्मण की भी शादी जनक पुर में उर्मिला के साथ हो गयी थी, राम ने ऐसा झूठा क्यों बोला-



सीतहि चितई कहीं प्रभु बाता, अहई कुआर मोरलघु भ्राता और जब सुर्येण्खा लक्ष्मण के पास गयी तो वह राम के पास यह कह कर भेज दिये।



सुंदरी सुनु मै उन्ह कर दासा। पराधीन नहिं तोर सुपासा।।



४८ / हिन्दू धर्म ग्रन्थों की सत्यता

(तो क्या लक्ष्मण राम के गुलाम थे। चाहे जो रहा हो आगे देखें। फिर लक्ष्मण के पास, लक्ष्मण राम के पास, राम लक्ष्मण के पास अर्थात एक दूसरे, दूसरे के पास भेजते रहे इस पर सुर्पेण्खा का नाराज होना वाजिब था, और वह नाराज हो गयी अगर इन दोनों भाई को शादी नहीं करनी थी तो साफ कह देते कि हम दोनों भाई तुमसे शादी नहीं करेंगे हम दोनों की शादी हो गयी है सुर्पेण्खा का उपहास उड़ाकर उसे नाराज करने की क्या जरूरत थी लेकिन इन दोनों भाई को केवल लुप्त लेना था और ले रहे थे, यह बात जब सुर्येण्खा के समझ मे आई तब वह नाराज हो गयी इस पर राम ने लक्ष्मण से कह कर सुर्येण्खा के नाक कान दोनों कटवा दिये, इसमें सुर्पेण्खा का क्या दोष था जो कि दोनों भाई उसका उपहास उड़ाये और बाद में नाक, कान भी काट दिये, इसलिए रावण ने अपनी बहन के अपमानका बदला लेने के लिए जैसा को तैसा सीता का हरण किया इसमें उसका कोई दोष नही था। कौन ऐसा भाई होगा जो अपनी बहन के अपमान का बदला नहीं लेना चाहेगा वह बुझदिल से बुझदिल क्यों न हो, जब कि रावण एक पराक्रमी राजा था अब आप सोचे कि पहले-पहल गलत कौन था राम या रावण।



रामचरित मानस में रावण राम चरित मानस में तुलसी दास ने राक्षसों को



कुरूप विभत्स, बड़े-बड़े मुख वाले तथा रावण को राक्षस राज को सुरमें के समान काला आदि। जैसे तमाम बातें लिखी गयी हैं। जो महर्षि बाल्मीकि के मतानुसार पूरा का गलत है और तुलसीदास की अपनी सोंच। क्योंकि महर्षि बाल्मीकि के राक्षसों के बारे में जो लिखा है उससे साबित होता है कि राक्षस ऐसे नहीं थे जैसा तुलसी दास ने दर्शाया है।



प्रमाण - सृष्टि के आरंभ में ब्रह्मा ने अपने पुत्रों को बुलाकर मानव रक्षा करने को कहा उन पुत्रों में से जिन लोगों ने कहा कि हम रक्षा करेंगे वही राक्षस कहलाये। रक्षाम इति यैर्युक्ति राक्षसास्ते भवंतुवः ।



अर्थात - सृष्टि के आरंभ में ही जिन्होंने धर्म, कर्म व मनुष्यों के रक्षा का भार



लिया वे ही राक्षस कहलाए।



नोट - धर्म, कर्म तथा मनुष्यो की रक्षा करने वालों को ही हम हेय दृष्टि से देखते हैं। और धर्म, कर्म तथा मनुष्यों का नाश करने वालों को आज हम पूज्यनीय मानकर पूजा करते हैं।



रावण की सुन्दरता के बारे में बाल्मीकि द्वारा किया गया वर्णन देखिए।



राजर्षिविप्रदैत्यानां गन्धर्वाणां च योषितः।



रसक्षसा चाभवन् कन्यास्तस्त कामवशंगताः।। (बाल्मीकि रा. 5, 9, 68)



अर्थात- राजर्षि, ब्रह्मण, दैत्य तथा गंधर्वो की कन्याएं रावण के रूप को देखकर रसवती हो उठी तथा कामदेव के द्वारा वशीभूत कर ली गयी।

हिन्दू धर्म ग्रन्थों की सत्यता /४९
नोट- जिस रावण को तुलसी दास ने कुरूप, काला, वीभत्स कहा है अगर वह वैसा होता है उसे देखकर गंधों आदि की कन्याएं उस पर कभी भी मोहित नहीं होती, इससे सिद्ध होता है कि रावण बहुत ही सुन्दर था तुलसी दास ने उसके बारे में बहुत ही गलत लिखा है।



रावण की औरतो की सुन्दरता- जब हनुमान सीता को खोजते हुए अतः पुर में सोई हुई रावण की स्त्रियों को देखा तो वह बहुत ही मुग्ध हुए और सोचे।



इमानि मुखपद्यानि नियतं मत्तषढ्पदाः।



अम्बुजानीव फुल्लानि प्रार्थयन्ति पुनः पुनः 113811



अर्थात- मतवाले भौरे विकसित कमल की तरह ही इन सुन्दर स्त्रियों के मुख कमलो की सदा अभिलाषा किया करते हैं। इस प्रकार हनुमान ने उस सुन्दरियों के मुख कमलों को तथा जलोत्पन्न कमल पुष्पों की सादृष्य माना।



पागल हुए हनुमान- पर वही हनुमान सीता को न खोज पाने पर एक जगह बैठकर सोचते है।



प्रमाण- विरूपरूपा विकृता विवर्चसो महानना दीर्घवि



रूपदर्शना समीक्ष्य ताः राक्षसराजयोषितो भयाद् विनष्टा

जनकेश्वरात्मजा। (वा.रा. 5, 12, 4)


अर्थात- इन कुरूप, विकराल बुरे रंगवाली, बड़े-बड़े मुखों वाली दीर्घकारा और भयंकर नयनों वाली रावण की स्त्रियों को देखकर सीता हर के मारे स्वयं तो नही मर गयी



नोट- उपरोक्त दोनों श्लोको से जमीन आसमान का अन्तर है। एक में रावण की औरतों को पद्मुखी कहकर उनकी सुन्दरता का वर्णन करते है, और वही हनुमान दूसरे श्लोक में कुरूप, बड़े-बड़े मुख वाली, विकराल, भयंकर आखों वाली आदि सोचकर हनुमान रावण की पत्नियों के डर से सीता को मर जाने की बात सोचते है। इससे तो यही सिद्ध होता है कि हनुमान रावण की लंका तथा उसकी सुन्दर औरतो को देखकर पागल हो गये थे।



सर्वसम्पूर्ण रावण - रावण महापंडित, वेदपाठी, वैज्ञानिक कूटनीतिज्ञ सब



कुछ जिस रावण की राजधानी में प्रत्येक राक्षस बेदज्ञ तथा वेदपाठी था, जहां घर-घर में हवन कुंड विद्यमान थे। जिस की राजधानी महापंडितो शास्त्रज्ञों से अलंकृत थी जहां बड़े-बड़े बैदिक यज्ञ हुआ करते थे, उसी रावण को यज्ञ में देवताओं को प्राप्त अंश का हरण कर लेने वाला, बह्मघाती, दुष्ट रावण कहकर उन राम भक्तों ने अपनी तुच्छ विचार धार्मिक असहिष्णुता तथा अनुदारता का परिचय दिया है। उन्होंने भले ही इसे भक्ति समझ कर अज्ञानावेश में किया हो पर इतिहास तथा संस्कृत का प्रत्येक छात्र उन्हें रावण चरित्र हत्यारा तथा दंगी कहकर ही संबोधित



५० / हिन्दू धर्म ग्रन्थों की सत्यता
करेगा।



सीतहरण पर अनेक ग्रर्हित विशेषण देकर इन अंध राम भक्तों ने धरती आकाश एक कर देने में अपनी संपूर्ण योग्यता का परिचय दिया है। पर यह भूलकर भी उन में से किसी ने राम से छह पूछने की जुर्रत नहीं की, कि आखिर उन्होंने एक अबलानारी के नाक, कान केवल उपहास के लिए क्यों कटवा दिया, क्या मानव शरीर का मूल्य तब मक्खी मच्छरों से भी गया गुजरा था, आखिर उस अबला के नाक-कान किस अपराध में काटे गये। क्या इसी अपराध पर कि वह विवाह कि इच्छा से राम व लक्ष्मण के पास गयी थी, जो कि शास्त्र एवं समाज द्वारा अनुमोदित तत्कालीन साधारण प्रथा थी। धर्म ग्रन्थों व पुराणों के अनुसार उस समय औरतें स्वतंत्र थी, वे बिना रोक टोक के कहीं भी आ जा सकती थी, अपनी बहन की दुर्दशा देखकर उसकी अस्मत लुटती देखकर जिस भाई का लहू खौल न उठे व लहू नहीं पानी वह भाई नहीं बल्कि एक नंपुसक से भी गया गुजरा मर्द है और रावण नंपुसक नहीं एक पराक्रमी राजा था, इसी कारण से वह अपनी बहन का बदला देने के लिए सीता का हरण कर लिया जो कि अत्यंत स्वाभाविक था, तो रावण ने कौन सा अपराध किया, अपराध करने की शुरूआत राम ने की थी रावण ने नहीं।



रावण के जीवन में केवल सीताहरण का कलंक आता है, लेकिन राम के चरित्र



पर भी एक नजर देखने का कष्ट करें।



राम चरित्र पर एक नजर-



राम के झूठ बोलने का वर्णन-



छुअत टूट रघुपतिहु न दोसू। मुनि बिनुकाज करिअ कत रोसू ।।



नोट- अपने भाई राम को परशुराम के क्रोध से बचाने के लिए परशुराम से साफ झूठ बोलते हैं। जिस धनुष को दस हजार राजा एक ही बार में अपना बल लगाकर टस से मस नहीं कर पाये। वह छूते ही कैसे टूट गया इससे साफ जाहिर होता है कि लक्ष्मण ने साफ झूठ बोला.

इसके बाद - लक्ष्मण के झूठ बोलने के बाद राम का झूठ बोलना छूअतहि टूट पिनाक पुराना, मैं केहि हेतु करौ अभिमाना।

नोट - अपने भाई का अनुसरण करते हुए राम ने भी साफ झूठ बोला।

भूप सहस दस एकहि बारा, लगे उठावन टरई न टारा।

और आगे देखे - सुर्पेण्खा राम की सुन्दरता पर मोहित होकर राम से विवाह का प्रस्ताव रखती है तब राम कहते है।

सीतहि चितई कही प्रभु वाता, अहई कुआंर मोर लघु भ्राता।

नोट-जब कि सभी लोग जानते हैं कि चारों भाइयों के शादी जनकपुर में हो गयी थी। और लक्ष्मण की औरत का नाम उर्मिला था फिर भी राम ने सुर्पेण्खा से

हिन्दू धर्म ग्रन्थों की सत्यतां / ५१
झूठ बोला। और लक्ष्मण को कुवांरा बताया।
राम का एक और झूठ - सीता हरण के बारे में जटायु राम को पहले ही बता चुका था कि सीता को रावण हर कर ले गया है। उसके बाद मर्यादा पुरुषोत्तम राम को अपने भाई से यह कहने की क्या आवश्यकता थी।

गीध कहते है तब कह गीध वचन धरि धीरा, सुनहु राम भंजन भव भीरा। नाथ दसानन यह गति कीन्हि। तेहिं खल जनक सुता हरि लीन्हीं लैदच्छिन दिसि गयउ गोंसाई। बिलपति अति कुररी की नाई।

फिर भी राम लक्ष्मण से कहते हैं -

वरषा गत निर्मल रितु आई। सुधि न तात सीता के पाई।

एक बार कैसेहूं सुधि जानौं। कालहु जाति निमिष महं आनौं। कतहूं रहउ जौ जीवति होई। तात जतन करि आनऊं सोई।

नोट - जटायु ने बता दिया था कि दसानन सीता को हर कर ले गया है तो राम को झूठ बोलने की क्या आवश्यकता थी। क्या राम लंका के राजा रावण को जिसके नाम का डंका तीनों त्रिलोक में बजता था और उनकी पत्नी को हर ले गया था। उसे इतनी जल्दी भूल गये जिसकी बहन का नाक कान काट लिये थे उस

रावण को क्या राम नहीं जानते थे।
शंबूक ऋषि की हत्या शंबूक ऋषि की हत्या राम ने अपनी तलवार से गर्दन काटकर की थी। जानते है क्यों-क्योंकि वह शूद्र होकर तपस्या कर रहा था। और आज भी हमारे धर्म ग्रंथों के अनुसार शूद्र को तप करने का कोई अधिकार नहीं है।

राम और रावण के चरित्र की तुलना अगर रावण शराब पीता था तो राम भी शराब पीते थे, अगर रावण मांस खाता था तो राम भी मांस खाते थे। रावण ऋषियों को सताता था तो राम शूद्र ऋषियों का वध कर देते थे। रावण झूठ नहीं बोलता था पर राम झूठ बोलते थे।

नोट- अगर राम और रावण के चरित्र के बारे में गौर किया जाये तो राम के चरित्र से रावण का चरित्र बहुत ही अच्छा था। राम रावण के चरित्र के बारे में बहुत ही की संग्रह किया हूं अतः पाठकगण क्षमा करें।

५२ / हिन्दू धर्म ग्रन्थों की सत्यता
अध्याय 5
अंध भक्त तुलसी दास का पागलपन
हमें लगता है कि तुलसीदास भांग पीकर राम चरित मानस लिखते थे नहीं तो ऐसा नहीं लिखते जैसा कि नीचे कुछ प्रमाण दिया जा रहा है।

जैसे- भवनवेद धुनि अति मृदुबानी, जनु खग मुखर समय जनु सानी।

कौतुक देखि पतंग भुलाना, एक मास तेई जात न जाना।।

मास दिवस कर दिवस भा मरम न जानई कोई।

रथ समेत रबि थाकेउ निसा कवन विधि होई।।

नोट- आज के जमाने में लगभग सभी लोग जानते है कि सूर्य स्थिर है पृथ्वी चलती है जिससे दिन और रात होती है। जब की तुलसी सूर्य को जहां पर चलने रूकने का वर्णन करते है। और भूप सहस दस एकहि बारा, लगे उठावन टरइ न टारा।

नोट- महर्षि दधिचि के पसली की हड्‌डी की बनी वह धनुष कितनी बड़ी थी कि दस हजार राजाओं ने एक साथ उसे पकड़ा। अगर एक राजा एक फुट में पकड़ा रहा होगा तब भी उस धनुष की लम्बाई दस हजार फुट की रही होगी तो दधिचि की लम्बाई कितनी रही होगी। आप खुद सोचे।

फिर कबहुं न मिल भरि उदर अहारा, आजु दीन्ह विधि एकहि बारा। डरपे गीध वचन सुनि काना, अब भा मरन सत्य हम जाना।

कपि सब उठे गीध कहें देखी, जामवंत मन सोच विसेषी।
नोट- क्या तुलसी को यह नहीं मालूम था कि गीध मरे हुए का मांस खाता है जीवित को नहीं। और वहां तो हनुमान, जाम्बुवंत, अंगद आदि जैसे महान बलवान थे उन्हें एक गीथ से डर जाने की बात कुछ समझ में नहीं आता एक पंख बिहिन गीध उनका क्या कर लेता, और जब एक गीध से डर गये तो वे रावण की सेना से क्या लड़ते।

और देखे सोरह जोजन मुख तेहि ठयऊ, तुरत पवन सुत बत्तिस भयऊ

नोट- सोरह जोजन वाली सुरसा तथा बत्तिस जोजन वाले हनुमान कहां पर खड़े थे, उधर लंका का इधर हनुमान के वानर साथी और इतने बड़े मुख वाली सुरसा के पैरों के तालू और हनुमान के तालू पैरों के पंजे की लम्बाई कम से कम 8 सौ जोजन

हिन्दू धर्म ग्रन्थों की सत्यता /५३
रही ही होगी। जब की समुद्र की चौ. तुलसी को अनुसार 100 जोजन ही था।

और देखे - कुंभकरन रनरंग विरूद्धा, सन्मुख चला काल जनु क्रूद्धा।

कोटि-कोटि कपि धरि-धरि खाई, जनु टीड़ी गिरि गुहा समाई।।

नोट- कुंभकरन की लम्बाई चो. का नाप तुलसी बाबा ने यहा नहीं दिया है। खैर सोचना यह है कि वह करोड़ों वानरों को एक ही साथ कैसे पकड़ता था उसके हथेली की ल.चौ. कितनी रही होगी कि करोड़ो वानरों के एक साथ पकड़ कर मुंह में डालता था।

और देखे - कोटिन्ह गहि शरीर सन मर्दा, कोटिन्ह मीजि मिलब महि गर्दा मुख नासा श्रवनन्हि की बाटा, निसरि पराहिं भालू कपि ठाटा ।।

नोट - उसके खाये हुए भालू, बन्दर मुंह और नाक कान से कैसे निकल भागते थे। जाहिर है कि खाने के बाद वह मुंह बंद कर लेता रहा होगा तो मुख से निकल भागने का सवाल ही नहीं उठता है और नाक के रास्ते भागना सम्भव है। लेकिन कान के रास्ते भागना तो एक दम असम्भव है। क्योंकि मुख और कान का रास्ता एक नहीं होता है। लेकिन तुलसी बाबा को यह ध्यान ही नहीं रहा कि वह क्या लिख रहे है क्या नहीं जो मन आया सो लिख दिया।

और लाजवाब-

रूंड प्रचंड मुंड बिनु धावहि, घरू-धरु मारू मारू धुनि गावहिं ।। जंबुक निकर कटकक्ट कट्टार्हि, खाहि हुआहि अघाहि दपट्टहि ।।

कोटिन्ह रूंड मुंड बिनु डोल्लहि। सीस परे जय जय बोल्लहि।।

नोट - पता नहीं सिर कट जाने पर बिना मुखका धड़ पकड़ो पकड़ो मारो का गाना गा रहे थे बिना मुख का किस रास्ते आवाज आ रही थी यह तुलसी बाबा या राम के भक्त ही जाने यह मेरे समझ के बाहर है।

और देखें - लैसिर बाहुं चले नराचा, सिर भुज हीन रूंड महि नाचा धरनि धसहिं धर धाव प्रचण्डा, तब सर हति प्रभु कृति दुई खण्डा।

गरजेऊ मरत घोर रव भारी राम रन हतो पचारि।।

नोट- ऊपर बिना सिर के धड़ द्वारा बोलने वाले राक्षस थे, लेकिन राक्षस राज रावण का बिना सिर के धड़ को दो खण्ड हो जाने पर कैसे बोलता रहा होगा। आप जाने

तुलसी बाबा और राम भक्त यह मेरे समझ के बाहर है।

और देखे मन्दोदरी आगे भुज सीसा, धरि सर चले जहां जगदीश ।।

अब तब सिर जम्बुक खाहीं राम विमुख यह अनुचित नाही।।

नोट- तुलसीदास एक तरफ लिख रहे है कि रावण के सिर और हाथ राम के बाण मन्दोदरी के आगे रखकर चले आते है। और एक तरफ लिख रहे है कि रावण के सिर और हाथ गीदड़ खा रहे है। क्या मन्दोदरी इसी समय के लिए अपने घर में गीदड़ पाल रखे थे।

एक और आश्चर्य - राम ने बचपन में काग भुशुडि को पकड़ने के लिए हाथ फैलाया और कौआ भागचला। कौआ भागते-भागते सात आवरण पार कर गया फिर

५४ / हिन्दू धर्म ग्रन्थों की सत्यता

राम का हाथ कौआ का पीछा नहीं छोड़ा।

प्रमाण - जानु पानि धाये मोहि धरना, श्यामल गात अरून कर चरना।

जिमि-जिमि द्वारि उड़ाऊँ अकाशा, तहँ भुज हरि देखहुँ निज पासा ।।

"नोट- कौआ आकाश में उड़ात जा रहा था और राम का हाथ वह अपने पास ही रहा था राम तो कुछ भी कर सकते थे क्योंकि वे ईश्वर थे लेकिन देखने वाले राम के हाथ की लम्बाई देखकर बेचारे अवश्य ही चकित हो गये होंगे। उनका हाथ राकेट की तरह आकाश में दिखाई देता रहा होगा।

नोट- राम के मुख में कौआ घुस गया और कौआ वहां पर जितनी चीजों को देखा उसका वर्णन नहीं किया जा सकता है फिर थोड़ा वर्णन नीचे दे रहा हूं।

ब्रह्मलोक लंगि, गयऊ मैं चितयऊ पाछ उड़ात। जुग अंगुल कर बीच सब राम भुजहि मोहि तात ।।

सप्तावरण भेद कर जहां लेग गति मोरि।

गयऊ तहां प्रभु भुज निरखि व्याकुल भयऊं बहोरि ।।

मूदेऊ नयन त्रसित जब भयऊ, पुनि चितवत कोसलपुर गयऊ।

मोहि विलोकि राम मुसुकाही, विहसति तरत गयऊ मुख मांही ।।

उदर माझ सुनु अण्डल राया, देखऊ बहु ब्रह्माण्ड निकाया। अति विचित्र तहं लोक अनेका, रचना अधिक एक ते एका।। कोटिन्हा चतुरानन गौरीशा, अगनित भूधर भूमि विसाला। एक एक ब्रह्माण्ड महं रहऊं वरष सत एक। एहि बिधि देखत फिरऊं मैं अंड कटाह अनेक। भ्रमत मोहि ब्रह्मांड अनेका। बीते मनहुं कल्प सत एका। फिरत फिरत निज आश्रम आयऊ। तहं पुनि रहि कछु काल गवांयऊँ निज प्रभु जन्म अवध सुनि पाउऊं निभर प्रेम हरषि उठि धायऊं। देखऊं, जन्म महोत्सव जाई। जेहि विधि प्रथम कहा मैं गाई। देखि कृपाल विकल मोहि विहंसे तब रघुवीर।

विहंसतही मुख बाहेर आयऊं सुनु मतिधीर।
नोट- आज तक किसी मनुष्य के मुख से जिन्दा गौरेया घुसने की बात नहीं सुनी थी पर यहां राम के मुख में जिन्दा कौआ घुस गया। खैर राम ईश्वर थे उनके मुख से कौआ घूसे या गीथ हमें तो यह देखना है कि राम का पेट कितना बड़ा था कि कौआ राम के पेट में इतना सब कुछ देखा कि जिसका वर्णन नहीं किया जा सकता है। सोचने की बात है कि राज दशरथ के पुत्र राम क्या लावारिसों की तरह पड़े रहते थे कि उनके मुख से कौआ आ जा रहा था और कोई मना करने वाला नहीं था। बचपन में राम का मुख कितना बड़ा था कि जिन्दा कौआ उनके मुख में घुस गया।

इस तरह का वर्णन राम चरित मानस में अनेक हैं जिसको लिख पाना इस छोटी सी पुस्तक में सम्भव नहीं है।

हिन्दू धर्म ग्रन्थों की सत्यता / ५५
अध्याय 6
छुट पुट घटनाएं
दिति के गर्भासय में इन्द्र घुस गये श्रीम‌द्भागवत स्कन्धं 6 अध्याय 18 में दिया

गया है कि सोई हुई दिति के गर्भ में इन्द्र घुस गये और उन्होंने गर्भ के कुल 49 टुकड़े कर दिये। जब इन्द्र उन टुकड़े के टुकडे करने लगे तब उन सबो ने हाथ जोड़कर इन्द्र से कहा हमें मत मारो हम तुम्हारे भाई है। इसका वर्णन बा. रा. श्लोक 16 से 21 तक मे भी है।

नोट- दिति का गर्भासय गर्भासय न होकर 50 पुरूषों के अच्छा खासा हाल रहा होगा होगा जहां 49 गर्भ के पुरूष तथा एक इन्द्र कुल 50 आदमी खड़े रहे होंगे। और दिति भी पता नहीं कौन सी नींद सो रही थी कि गर्भ के 49 टुकड़े हो जाने पर भी उसकी नींद नहीं टूटी और वह गर्भ भी कैसा था कि 49 खण्ड हो जाने पर जिन्दा था मरा नहीं। भागवत कार ने यह नहीं लिखा है कि इन्द्र किस रास्ते दिति के गर्भ में घुसे नहीं तो मैं आप को अवश्य बताता।

एक हजार वर्ष तक लड़ते रहे श्रीम‌द्भागवत में दिया गया है कि गजेन्द्र और

ग्राह अपनी अपनी पूरी शक्ति लगाकर युद्ध में भिड़े हुए थे। कभी गजेन्द्र ग्राह को कभी ग्राह गजेन्द्र को भीतर खींच ले जाता इस तरह दोनों को लड़ते-लड़ते एक हजार वर्ष बीत गया और दोनो जीते रहे।

नोट - दोनो बिना खाये पिये एक हजार वर्ष तक कैसे जीते रहे उन्हें तो भूख से मर जाना चाहिए था ऐसी बातों पर अन्धे राम भक्त ही विश्वास कर सकते है।

राम ने दशरथ को पागल और मूर्ख कहा वा. रा. अध्याया काण्ड सर्ग 53, श्लोक 9-10 में राम ने लक्ष्मण से कहा हे लक्ष्मण अपने ऊपर आये संकट से और राजा के पागल पन को देखकर मुझे ऐसा मालूम होता है कि अर्थ और धर्म की अपेक्षा काम (संभोग) का गौरव अधिक है। पिता जी ने मुझे त्याग दिया नहीं तो कौन ऐसा मूर्ख पुरूष होगा जो एक स्त्री के लिए अपने आज्ञाकारी पुत्र का परित्याग कर दे।

राम का कैकेई द्वारा दशरथ की हत्या करने की शंका- बा. रा. अयोध्या काण्ड सर्ग 53 श्लोक 6,7, 14 में राम ने लक्ष्मण से कहा है। हे लक्ष्मण महाराज बड़े दुःखी से सो रहे होंगे लेकिन कैकेई सफल मनोरथ पूर्ण होने से संतुष्ट होगी। सौम्य में समझता हूं कि दशरथ के प्राणों का अन्त करने मुझे देश निकाल देने और भरत को राज्य दिलाने के लिए ही इस राज भवन में आई थीं।

५६ / हिन्दू धर्म ग्रन्थों की सत्यता
राम ने लक्ष्मण से कहा हमारी, तुम्हारी माता को कैकेई जहर देकर मार भी सकती है - बा. रा. अयोध्या काण्ड सर्ग 53 श्लोक 18 में राम ने लक्ष्मण से कहा है कि हे लक्ष्मण कैकेई के कर्म बड़े खोटे (नींच) है वह द्वेषवश अन्याय भी कर सकती है तथा हमारी, तुम्हारी माता को जहर देकर मार भी सकती है।

लक्ष्मण ने दशरथ को पापी बताया- वा. रा. अयोध्या काण्ड सर्ग 23 श्लोक 8 में लक्ष्मण ने राम से कहा है। धर्मात्मन् आप को उन दोनों पापियों पर संदेह क्यों नहीं होता, संसार में कितने ही ऐसे पापसक्त मनुष्य हैं जो दूसरो को ठगने के लिए धर्म को ढोंग बनाये रहते हैं।

नोट- तो क्या दशरथ कैकेई पापी व धर्म ढोंगी भी थे।
लक्ष्मण का दशरथ को मार डालने को तैयार होना बा. रा. अयोध्या काण्ड सर्ग 23 श्लोक 37 में लक्ष्मण ने राम से कहा है कि प्रभो आज राजा दशरथ की प्रभुता को मिटाने और आप के प्रभुत्व की स्थापना करने के लिए अस्त्रबल से सम्पन्न मुझ लक्ष्मण का प्रभाव प्रकट होगा।

राम ने कहा कैकेई ने राजा के साथ धोखा किया बा. रा. अयोध्या काण्ड 24 श्लोक 11 राम ने अपनी मां से कहा है हे मां कैकेई ने राजा के साथ धोखा किया है। इधर मैं वन को चला जा रहा हूं इस दशा में तुम भी उनका साथ छोड़ दोगी तो निश्चय ही वे जीवित नहीं रहेंगे।

राम ने सीता को प्यार से मांस खिलाया बा. रा. अयोध्या काण्ड सर्ग 96 श्लोक 1-2 में लिखा है कि राम सीता को मन्दाकिनी नदी का दर्शन कराकर राम सीता के साथ समतल प्रदेश में बैठ गये और मां से उनकी मानसिक प्रसन्नता को बढ़ाने लगे, रघुनन्दन ने सीता से कहा यह मांस परम पवित्र है, यह बहुत स्वादिष्ट है तथा इस को अच्छी तरह आग पर सेका गया है।

राम ने मांस से जटायु का. पिण्डदान किया बा. रा. अरण्यकाण्ड सर्ग 68,

श्लोक 32-33 में दिया गया है कि जटायु के मर जाने के बाद राम ने जटायु का पिण्डदान मांस से किया।

कबन्ध ने राम से कहा बा.रा. अरण्यकाण्ड सर्ग 73, श्लोक 11 से 17 तक में दिया गया है कि कबन्ध ने राम से कहा कि वहां पर मांस, मछली के ढेर भोज्य पदार्थ के रूप में उपलब्ध होंगे। आपके प्रति भक्ति भाव से सम्पन्न लक्ष्मण आप को वे भक्ष्य पदार्थ अर्पित करेंगे, आप दोनों भाई मोटे मोटे सुप्रसिध्द जलचर पक्षियों तथा श्रेष्ठ मछली रोहू वक्रतुण्ड और नलमीन आदि मत्स्यों को थोंड़ा-थोड़ा करके खाईयेगा।

राम के भाई भरत की कई पत्नियां थी- बा.रा. अयोध्या काण्ड सर्ग 100 श्लोक

49 में राम ने भरत से कहा है कि भरत क्या तुम अपनी स्त्रियों को संतुष्ट रखते हो। क्या वे तुम्हारे द्वारा सुरक्षित रहती हैं, तुम उन पर अधिक विश्वास तो नहीं करते, तुम उन्हें अपनी गुप्त बात तो नहीं बता देते।

नोट - इस श्लोक में भरत के अनेक औरतों के होने का पूरा प्रमाण है क्योंकि राम. ने स्त्री न कहकर स्त्रियों जैसे शब्द का प्रयोग किया है और अपने औरतों पर न विश्वास करने तथा गुप्त बात न बताने के बारे में भी भरत को समझाया है। इस श्लोक

हिन्दू धर्म ग्रन्थों की सत्यता /
से यह शिक्षा मिलती है कि अपनी अर्धागिनी पर विश्वास नहीं करना चाहिए और उन्हें गुप्त बात नही बतानी चाहिए, जबकि यह बात अपनी पत्नी के साथ विश्वास करना है। इस तरह यह ग्रंथ अपनी पत्नी से विश्वासघात करना भी सिखाता है।

भरत की अनेक औरतों का प्रमाण एक और बा.रा. अयोध्याकाण्ड सर्ग 100 श्लोक 72 में भी भरत के कई औरतों का वर्णन राम द्वारा की गयी है।

अयोमुखी का नामक, कान और स्तन लक्ष्मण ने काट दिया- बा.रा. अरण्यकाण्ड सर्ग 69 श्लोक 17 में दिया है कि लक्ष्मण ने अपनी तलवार से अधोमुखी के नामक, कान और स्तन काट लिए।

नोट- लगता है कि राम लक्ष्मण को औरतों के नाक, कान और स्तन काटने से बड़ा आनन्द आता था विशेष कर लक्ष्मण को क्योंकि ऐ दोनो भाइयों के नाक, कान स्तन काटने के प्रमाण कई जगह मिले हैं जैसे ताड़का के नाक, कान काटना, अयोमुखी के कान, नाक, स्तन काटना। मालूम पड़ता है कि दोनों भाइयों को इसके लिए विशेष ट्रेनिंग दी गयी थी।

लक्ष्मण ने सुर्येण्खा से कहा बा. रा. अरण्यकाण्ड सर्ग 18 श्लोक 11 में लक्ष्मण ने सुपेंण्खा से कहा है कुरूप, ओछी, विकृत, धंसे हुए पेट वाली और वृद्धा भार्या (सीता) को त्याग कर ये तुम्हें सादर ग्रहण करेंगे।

नोट - इस तरह की बांतों से लक्ष्मण ने सुर्येण्खा को मनोवैज्ञानिक तौर से राम के प्रति आकर्षित किया था।

सीता ने लक्ष्मण को विश्वासघाती शत्रु कहा बा.रा. अरण्य काण्ड. सर्ग 45
श्लोक 5 से 8 तक 21 से 25 तक में सीता ने लक्ष्मण से कहा है कि सुमित्रा कुमार तुम मित्र के रूप में अपने भाई के शत्रु हो, तुम मुझे पाने के लिए इस समय राम का विनाश चाहते हो, मेरे लिए तुम्हारे मन में लोभ है। तुम्हारे मन में अपने भाई के प्रति प्रेम नहीं है। अनार्य, निर्दयी, कूरकर्मा कुलांगर मैं तुझे खूब समझती हूं। श्रीराम किसी भारी विपत्ति में पड़ जाये यही तुझे प्रिय है। लक्ष्मण तेरे जैसे क्रूर एवं सदा छिपे हुए शत्रुओं के मन में इस तरह का पापपूर्ण विचार होना कोई आश्चर्य की बात नहीं है। तू बड़ा दुष्ट है राम को अकेला बन में आते देख मुझे प्राप्त करने के लिए तू भी उनके पीछे-पीछे चला आया है, परन्तु लक्ष्मण तेरा मनोरथ कभी पूरा नहीं होंगा।

नोट- औरतें एक ही निगाह में अपने प्रति पुरूषों के चेहरे को समझ लेने में काफी हद तक सफल रही है। कि सामने वाला पुरूष उसे किस निगाह से देख रहा है। जब कि सीता लक्ष्मण के साथ काफी समय तक रही।

राम बालि के हत्या का कारण बताते है बा.रा.कि. किश्किन्धाकाण्ड सर्ग 18

श्लोक 18-19. में राम बाली ने कहा है कि अपने छोटे भाई की स्त्री रूपा से सहवास करते हो, जो तुम्हारी पुत्रवधू के समान है। कामवश उसका उपभोग करते हो अतः पापाचारी हो, इस तरह तुम धर्म भ्रष्ट हो अपने भाई की स्त्री को गले लगाते हो। तुम्हे इसी अपराध का दण्ड दिया गया है।

राम के विचार से बड़े भाई की औरत के साथ सहवास करना पाप नहीं है क्योंकि- वही राम बा.रा. किष्किन्धाकाण्ड सर्ग 29 श्लोक 4 के अनुसार (बालि बध

५८ / हिन्दू धर्म ग्रन्थों की सत्यता
के बाद सुग्रीव अपने बड़े भाई की पत्नी (तारा) के साथ सहवास करता है और वह अपनी विधवा भाभी को पत्नी बना लेता है तो सुग्रीव पापाचारी, धर्म भ्रष्ट, पथभ्रष्ट पापाचारी नही होता है। क्योंकि यह सब जानते हुए भी राम सुग्रीव का वध नहीं करते है और इसी तरह रावण के मर जाने के बाद विभीषण रावण की पत्नी विधवा मन्दोदरी से सहवास करता है तब श्रीराम चुप रहते हैं। राम का यह एक तरफा न्याय था। कि उनका स्वार्थ।

राम ने अपने स्वार्थ के लिए कबन्ध को जिन्दा जला दिया- बा.रा. सर्ग 72 अरण्यकाण्ड के अनुसार राम ने कबन्ध को जिन्दा जला दिया।

कुंजर की पुत्री, केसरी की पत्नी अन्जना के साथ पवन देव का समागम बा.रा. कष्किन्धाकाण्ड सर्ग 66 श्लोक 14 से 20 तक में दिया गया है कि अन्जना के सुन्दरता पर पवन देव मुग्ध हो गये और उसके साथ समागम किये जिससे हनुमान का जन्म हुआ।

अहिल्या गौतम ऋषि की पत्नी ने जानकर इन्द्र से संभोग कराया था और बहुत खुश हुई थी - बा. रा. वा. का. सर्ग 48 श्लोक 19-20 में लिखा है कि महर्षि गौतम के रूप में आये इन्द्र को पहचानने के बाद ही इन्द्र से संभोग कराई थी। और इन्द्र के संभोग से संतुष्ट होकर इन्द्र से कही देव चले जाइए। गौतम के कोप से आप मेरी अपनी रक्षा करें।

गौतम के श्राप से अहिल्या अदृश्य हो गयी थी बा.रा. बा.का. सर्ग 48 श्लोक 30 के अनुसार अहिल्या अदृश्य हो गयी थी। जब कि राम चरित मानस के अनुसार पत्थर हो गयी थी। जिसका उद्धार राम के चरण स्पर्श से हुआ था।

राम ने दशरथ को कामी बताया- बा.रा. अयोध्याकाण्ड सर्ग 53 स. 8 ते 17 तक मे पूरे वर्णन के साथ लिखा गया है कि राम ने कहा कि दशरथ कामवश होकर मुझ जैसे आज्ञाकारी पुत्र का त्याग किया है।

लक्ष्मण ने ताड़का के नाक-कान काटे बा. रा. बाल. सर्ग 26 श्लोक 18 में लिखा गया है कि ताड़का के दोनों भुजा कट जाने के बाद लक्ष्मण ने ताड़का के नाक-कान काट दिये।

लक्ष्मण ने कहा सीता मर जाये बा.रा. अरण्यकाण्ड सर्ग 66 श्लोक 14 मे लक्ष्मण ने कहा कि अगर सीता मर जाये या नष्ट हो जायें तब भी आप को एक गंवार मनुष्य की तरह शोक नही करना चाहिए।

राम ने लक्ष्मण से कहा मुझे काम देव सता रहा है बा. रा. कि. काण्ड सर्ग 1 श्लोक 23 में राम ने लक्ष्मण के से कहा है कि मुझे काम देव सता रहा है।

राजा दशरथ ने कहा राम के मनोरंजन के लिए वेश्यायें भी भेजी जायें- बा.रा. अयोध्या सर्ग 26 श्लोक 1 से 10 तक दशरथ ने सुमन्त से कहा है कि मेरा धन दौलत सेना आदि के साथ राम के मनोरंजन के लिए वेश्याएं भी राम के साथ बन में भेजी जाने की आज्ञा दो।

नोट - क्या राम वेश्या गामी थे राज-दशरथ उनके सुविधा के लिए वेश्या भेजने की व्यवस्था कर रहे थे।

सीता से हनुमान ने कहा राम के लिंग चिकने है बा.रा. सुन्दर काण्ड सर्ग 35

हिन्दू धर्म ग्रन्थों की सत्यता / ५९
श्लोक 17 में हनुमान ने सीता से कहा है उनके तीन अंग वक्षस्थल कलाई और मुठ्ठी सुदृढ़ है। भौहे, भुजाएं और मेढूं ये तीन अंग लंबे है। केशों का अग्र भाग, अण्ड कोष और घुटने ये तीन समान बराबर है। वक्षःस्थल, नाभि के किनारे का भाग ये तीन उभरे हुए हैं, नेत्रों के कोने, नख, और हाथ पैर के तलबे ये तीन लाल है, लिंगा का अग्रभाग, दोनों पैरों की रेखाये और सिर के बाल ये तीन चिकने है तथा स्वर, चाल और नाभी ये तीन गम्भीर है। अशोक वाटिका में हनुमान सीता से अपना परिचय देते समय राम के उपरोक्त शरीर का वर्णन करते है।

नोट - हनुमान सीता को एक तरफ माता कहते है और दूसरी तरफ अपने पिता के लिंग का वर्णन भी अपनी माता से करतें है यह बात समझ में नहीं आई और सभी की दृष्टि से समझना भी नहीं चाहता हूं। यह भगवान के भक्त लोग ही जानें।

बालब्रह्मचारी कहे जाने वाले हनुमान कम से कम १६ औरतों के पति थे-
बा.रा. युद्धकाण्ड सर्ग 125 श्लोक 44, 45 में लिखा गया है कि फिर भी मैं तुम्हें एक लाख गाँएं, सौ उत्तम गांव तथा उत्तर आचार-विचार वाली सोलह कुंवारी कन्याएं पत्नी के रूप में देता हूं उन कन्याओं के कानों में सुन्दर कुण्डल जगमगाते होंगे, और उनकी अंग कान्ति सोने के समान होगी उनकी नासिका सुघड़ छाती मनोहर और मुख चन्द्रमा के समान सुन्दर होंगे। वे कुलीन होने के साथ- साथ सब प्रकार के आभूषणों से सुसज्जित होंगी।

यह भरत हनुमान को देते हैं जब हनुमान राम को लंका से वापस अयोध्या आने की खबर भरत को बताते हैं-

नोट - बाल ब्रह्मचारी कहे जाने वाले हनुमान को गांवों, गौओं तथा सुन्दर कुंवारी कन्याओं के क्या जरूरत थी। उन्हें इन सब चीजों की क्या जरूरत थी उन्हें यह सब लेने से इनकार कर देना चाहिए था। इससे यह सिद्ध होता है कि हनुमान भी सुन्दर कन्याओं के शौकीन थे।

ब्राह्मण ज्ञान, विवेक, बुद्धि, समता, विन्रमता, विद्यादान सत्य पथ पर अग्रसर होने के लिए प्रेरणा प्रदान करने वाला ही ब्राह्मण हैं।

क्षत्रिय - समाज तथा देश की सेवा करने वाला धीर वीर दृढप्रतिज्ञ सैनिक देश के ऊपर प्रत्येक आपत्ति और मुसीबतों से लड़ने वाला ही क्षत्रिय है।

वैश्य - देश की सम्पति में वृद्धि करने वाला, समाज की चहुमुखी विकास आर्थिक सुव्यवस्था को दृढ़ बनाने वाला कर्म मार्गी ही वैश्य है।

शूद्र - बीमार, गरीब, कमजोर, बच्चों और वृद्धों की सेवा करने वाला ही शूद्र है।

नोट - ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र इनके कर्म महान है। इनका अपने स्थान पर कर्मानुसार बने रहना अति आवश्यक है। क्योंकि इनमें से किसी एक को भी अपने स्थान से हट जाने पर पूरे देश और समाज की व्यवस्था का संतुलन बिगड़ जायेंगा। इनकी कोई अलग से जाती नहीं होती है। ऐ सभी धर्म वर्गों में से अपने तत्कालीन कर्मानुसार ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र हो जाते है।

६० / हिन्दू धर्म ग्रन्थों की सत्यता
                    अध्याय 7
स्वर्ग पथ
1) समय - आप ने अपना बहुत सा समय व्यर्थ के कार्यों में नष्ट किया दूसरों के बुराइयों को देखकर, बुराइयों और कमजोरियों को बता कर उनकी खराबियों तथा नुकसानों पर चुप चाप खुश होकर आप अपना समय नष्ट करके अपनी उन्नति को रोक दिया है। जो मनुष्य दूसरों की आलोचना या ईर्ष्या में ही लगा रहता है उन्हीं के बुरे परिणामों को देखता रहता है उसे यह ज्ञान नहीं है कि उसका इनबातों से कोई अपना लाभ नहीं है।

2) आत्मशुद्धि होने पर ही आपको अपने वास्तविक ज्ञान के दर्शन होंगे मन को साफ करने के लिए राग द्वेष छोड़कर तन, मन, धन से सेवा कार्य कीजिए। अपना उपकार करने वालों के प्रति उपकार कीजिए। एससे प्रेम कीजिए प्रेम ही आपका वास्तविक स्वरूप है।

मनुष्य ही ईश्वर है प्रकृति सभी जीवों पर नियन्त्रण करने तथा उसकी

देखभाल करने के लिए मनुष्य को शारीरिक, मानसिक तथा अध्यात्मिक शक्तियों का समावेश करके पृथ्वी पर राज करने के लिए बनाया है। यह मनुष्य प्रकृति के निर्माण का सिरमौर सभी शक्तियों का भण्डार प्रकृति का अनुपम पुत्र मनुष्य ही है। प्रकृति ने मनुष्य को अपने रूप में बनाकर अपनी पूरी शक्तियों का समावेश किया है प्रकृति ने सभी मनुष्यों को अपनी अनुपम रचना की रक्षा के लिए ईश्वर के रूप में अवतरित किया है।

उद्देश्य - प्रण करों की मन को अपने कर्म के उद्देश्य में केंद्रित करोगे। चारो तरफ से घेरकर अपनी इच्छाशक्ति को अपने लक्ष्य की प्राप्ति में स्थिर रखोगे तो निश्चिय ही सभी बाधायें इच्छाशक्तियों के सामने झुक जायेंगी और अन्त में सफलता आपको अवश्य मिलेगा।

एकाग्रचित - मन को एकाग्र किए बिना किसी भी प्रकार का अभ्यास सफल नहीं हो सकता है।

मुर्खता - क्रोध, भय, काम बैर आदि मनुष्य को अन्धा बना देती है। इस मनोविकारों की उत्तेजना से वृद्धी पंगु हो जाती है। न्याय के जगह मनुष्य प्रतिशोध की भावना से उत्तेजित हो जाता है। और उत्तेजना में मनुष्य का विवेक शून्य हो

हिन्दू धर्म ग्रन्थों की सत्यता / ६१
जाता है और वह मूर्खता कर बैठता है और बाद में मन शान्त होने पर अपने गलतियों पर पक्षताता है। इसलिए कोई भी काम करे तो क्रोध में नहीं बल्कि शान्तचित में सोच

समझकर।
समाज - यदि हमे एक अच्छे समाज का निर्माण करना है तो सर्व प्रथम स्वतंत्रता का आरम्भ अपने अन्दर के शत्रुओं पर विजय प्राप्त करके करना होगा, हमारे अन्दर जो शत्रु है काम, क्रोध, मोह, लोभ, हिंसा, द्वेष, स्वार्थ पर विजय पाना होगा अपने अन्दर के आशुरी शक्तियों का दमन करके हम एक अच्छे समाज का निर्माण कर सकेंगे। क्योंकि मनुष्यों के ये 6 शत्रु है। और जब मनुष्य इनके वश में होता है तब वह राक्षस तुल्य बन जाता है और इन मनोविकारों के क्षणिक आवेश में प्रायः मूर्खता पूर्ण जघयन्त्र कार्य कर बैठता है।

काम - को जितने के लिए हमें ठीक विरोधी भाव को उत्पन्न करना होगा तथा अपनी मां, बेटी, बहनों की तरह दूसरों की मां, बेटी, बहन को समझना पड़ेगा तथा वासना को उसकाने वाले सिनेमा, नाटक, गंदे गीत गंदी पुस्तकें अश्लील चित्र स्त्रियों का संसर्ग, गुप्त स्त्रिचिन्तन, वासना, उत्पन्न करने वाली कवितायें कहानियों, उपन्यास, गंदा, साहित्य आदि से दूर रहना ही सर्वोत्तम होगा और सांसारिक स्वास्थ्य के लिए लाभदायक भी।

क्रोध - को वश में करने के लिए उपाय है कि क्रोध को एक पागलपन का दौरा समझें और जब क्रोध का आवेश बढ़ जाये तब उस समय एकान्त में चले जायें और कोई काम न करें? क्योंकि क्रौध में किया गया काम हमेशा मूखर्ता पूर्ण कार्य होता है।

लोभ लोभ पर विजय पाने के लिए अपने आप की कमाई पर संतोष करें? और दूसरे के धन को मिट्टी के समान समझें क्योंकि अन्याय, अधर्म का धन आज नहीं तो कल हाथ, से निकल जायेगा। हराम का पैसा कभी भी नहीं टिकता यह हमें अपने मनमें अच्छी तरह बैठानी होगी।

आत्मा अगर आप यह सोंच लेंगे कि सांसारिक वस्तुओं के व्यर्थ मोह में पड़ जायेंगे तो किसी भी प्रकार आत्मा जैसे दिव्य तत्व की प्राप्ती नहीं कर पायेंगे तो आप का लोभ, मोह स्वतः ही खत्म हो जायेगा।

घमंड - को परास्त करने के लिए यह आप सोंच ले कि इस पृथ्वी पर बड़े बड़े धनी, वीर, रुपवान पैदा हुए लेकिन सब का घमंड एक न एक दिन टूट गया तो हमारी क्या विशात है हम इन बातों पर क्यों घमंड करे। क्योंकि लक्ष्मी चलायमान हैं। आज यहां तो कल वहां परसों वहां यह कब किस जगह किसके पास चली जाय इस पर विश्वास नहीं किया जा सकता है। यह आप सोचकर अमल करें और यही सत्य भी है।

समता - अर्थात सबसे बराबरी का स्वभाव रखना उत्तम गुण है। इसके पालन करने से प्रेम उत्पन्न होता है। समता समस्त सिद्धियों की जननी है। जिसके हृदय में

६२ / हिन्दू धर्म ग्रन्थों की सत्यता
समता भाव रहता है। वही पुरूष सम्पूर्ण लोगों में में श्रेष्ठ योगियों में गणना करने योग्य और आदर्श होता है अतः सबको बराबरी का दर्जा देना एक आदर्श व्यक्ति की पहचान है।

मंजिल -एक से अधिक मार्गो पर चलने वाल व्यक्ति अपने रास्ते से भटक जाता है। और वह अपनी मंजिल पर नहीं पहुंच पाता अतः हमें अपने उ‌द्देश्य की पूर्ति के लिए साधन बनाते हुए अपने लक्ष्य की ओर ही बढ़ना चाहिए। इधर उधर क्या हो रहा है इस पर कभी भी ध्यान नहीं देना चाहिए।

भाग्य - जो व्यक्ति व्यर्थ की कल्पना की तरांगो में उछल-कूद करता रहता है और हाथ पर हाथ धरे बैठा रहता है निष्क्रिय होकर अपने भाग्य के सहारे बैठ जाता है। उसकी भाग्य की बैठ जाती है इसलिए भाग्य को जगाने के लिए मनुष्य को उत्तम कर्म करना चाहिए।



जीवनधन - की रक्षा के लिए वासना पर विजय प्राप्त करना जरूरी है। उसके फंदे में कभी नहीं फसंना चाहिए जीवनधन सर्वोत्तम धन है।



आत्मविश्वास की कमी के कारण ही हम अपनी मंजिल पर नहीं पहुंच पाते है क्योंकि आत्मविश्वास ही सफलता की कुंजी हैं अतः आत्मविश्वास को बनाये रखें सफलता आपको अवश्य मिलेगी।



सावधान - इस मनुष्य रूपी रथ को खींचने वाली इन्द्रियां उपद्रवी घोड़े की तरह काम करती हैं। जिस पर आत्मा सवार रहती है ये इन्द्रिया हमेशा आत्मा को खाई में गिराने का प्रयास करती रहती हैं। अतः आपको इन इन्द्रियों से सावधान रहना पड़ेगा कहीं ये आपके आत्मा को किसी खाई में न गिरा दें जिस व्यक्ति की आत्मा गिर कर मर जाती है। वह अपने स्वार्थ के वशीभूत होकर देश, समाज, दूसरों के भले के बारे में कुछ नहीं सोच पाता। ऐसे लोगों को हमेशा लोग नफरत की दृष्ट से देखते हैं।



पशु - जो व्यक्ति काम, क्रोध, ईर्ष्या, लोभ, मोह, अहंकार का दास है। जो क्षणिक आवेश में आकर उद्धिन्न हो उठता है। मारता, पीटता, गाली देता है। वह पशु के श्रेणी में आता हैं क्योंकि पशु का जीवन इन्द्रिय सुर्खे तथा शारीरिक वासना की तृप्ति मात्र के निमित्त होता है। वह खाओ, पीओ, मौज में ही विश्वास रखता है।



स्वर्ग - जिस प्रकार गंदी नाली में पड़े हुए कीड़े गंदी नाली में ही अपना स्वर्ग समझते हैं उसी प्रकार आज के जो धोखेबाज स्वार्थी, व्यभिचारी दुष्कर्म करने वाले व्यक्ति वासना मय जीवन को स्वर्ग समझते है। नरक रूपी अग्नि में जलते हुए भी उसी से मित्रता किये हुए है जबकि असली स्वर्ग ठीक इसके विपरीत है।मान



सम्मान जैसे-जैसे विज्ञान उन्नति करता जा रहा है मनुष्य सांसारिक



ऐश्वरों, भोग, विलाश, मिथ्या प्रदर्शन, झूठी शान से मानवता के पवित्र गुणों का हनन करता जा रहा है। पुत्र पिता की, छोटे, बड़ों, शिष्य गुरू, का मान सम्मान का ध्यान न देकर अपने स्वार्थों में ही ध्यान दे रहा है। उचित, अनुचित को न सोच समझकर एक दूसरे को लूटने में लगे हुए हैं जबकि यह मानवता की हत्या है।



झूठ - झूठ बोलने वाला व्यक्ति यह समझता है कि उसके झूठ को कोई पकड़ नही



हिन्दू धर्म ग्रन्थों की सत्यता  ६३
पा रहा है जब कि इसका परिणाम बहुत भयानक होता है। जबकि इससे न स्थाई लाभमिलता है न आन्तरिक सुख प्राप्त होता है।



नसा गांजा, चरस, अफीम, शराब, आदि में लिप्त व्यक्ति अपने पसीने की कमाई इन व्यर्थ की निन्दनीय पदार्थों में खर्च करके समाज तथा अपना नुकसान कर रहा है। जबकि उसे परोपरकार दीन सेवा आवश्यक भोजन आदि र खर्च करना चाहिए।



गुलाम जिस व्यक्ति की जीवन की आवश्यकताएं श्रृंगार, लालच, कामवासना आदि के तरफ बढ़ती रहती है वहीं संसार का सबसे बड़ा गुलाम है। उसके गुलामी का अन्त नहीं है।



कमाई आप अपने आस-पास ध्यान से देखिए आप ने अपने लिए कितनी स्थाई चीजों को एकत्र किया है। जो धन आप संगह किये वह पहले दूसरे का था आज आपका है। कल दूसरे का हो जायेगा। अपने बेटी बेटा को देखें वह कल आपसे अलग हो जायेगा. जिसे आप अपनी पत्नी कहते हैं। वह दूसरे की बेटी है वह भी आप से अलग हो सकती है। कुछ समय तक आप के साथ हैं। लक्ष्मी का एक दूसरे के पास आना जाना इसका धर्म है। फिर आप इसके पीछे क्यों पड़े हैं। धन, जन, जीवन, जायदाद सब मिथ्या है। एक भ्रम है यह मोह जाल है यह आप को सत्य मार्ग से भटकाते रहते हैं।



पवित्रता दो प्रकार की होती है बाहरी पवित्रता आन्तरिक पवित्रता। आज कल लोग बाहरी पवित्रता पर विशेष ध्यान दे रहे है। जबकि बिना आन्तरिक पवित्रता से कुछ भी होने वाला नहीं है। आप कितनो क्रीम, पाउडर, साबुन का प्रयोग करके इस नस्वर मिट्टी की मूरत को साफ करें आप को कुछ भी नहीं मिलेगा जब तक आपका मन स्वच्छ नहीं होगा। अगर आप को कुछ एना है तो अपने मन को पहले स्वच्छ करें।



ईज्जत अगर आप चाहते हैं कि लोग हमारी इज्जत करें हमारा मान सम्मान करें हमें अच्छी नजरों से देखें तो सबसे पहले आपको दूसरों को मान-सम्मान देना होगा दूसरों की इज्जत करनी होगी तभी आप को सच्चा मान सम्मान इज्जत मिलेगी।



कार्य - जो बाते, जो कार्य आपको अपने प्रति बुरी लगती हो वह बाते, कार्य आप दूसरों के प्रति न करें। जैसे आपको कोई अपशब्द कहता है तो आपको बुरा लगता है उसी तरह दूसरे को आप अपशब्द कहते है तो उसे बुरा लगता है। इसलिए आप इस तरह का कार्य न करें।



स्वर्ग पथ के मुख्य सार चोरी करने वाले, झूठ बोलने वाले, धोखा छल, फरेब, कामी, लोभी, दम्भी, क्रोधी, ईर्ष्यावान की आत्मा सो गयी है मैंने इस स्वर्ग पथ अध्याय के माध्यम से उनकी आत्मा को जगाने का प्रयास किया है।

६४ / हिन्दू धर्म ग्रन्थों की सत्यता

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