Arun kumar dwivedi 18 Jan 2025 आलेख धार्मिक भगवान का जन्म 33615 0 Hindi :: हिंदी
आज हमारे शरीर और भगवान के मध्य एक अयाचित संबंध परिलक्षित होता है ।छोटी से छोटी घटना /दुर्घटना के क्षणों में हे भगवान,हाय भगवान,अरे भगवान हमारे मुख से निकल ही जाता है । वहीं बालपन में हम अपने कष्ट के क्षणों में अपने माता -पिता को स्मरण करते थे ।तो क्या समय के साथ माता-पिता का स्मरण ही भगवान के रूप में बदल जाता है या इसके पीछे कोई नया कारक काम करता है । हम सभी अवगत हैं कि यह परिवर्तन हमारे अंदर आयु बढ़ने के साथ होता है ।यही नहीं बल्कि कुछ और भी परिवर्तित होता है जैसे झूठ ,मक्कारी ,लोभ ,मोह, घृणा,क्रोध आदि मनोभावों से भी न सिर्फ परिचित होते हैं बल्कि उनके शिकार भी होते हैं । अब सवाल थोड़ा बदल गया ,क्या यह मनोभाव और भगवान दोनों का प्रवेश हमारे शरीर में साथ -साथ होता है या कि इसमें कुछ अंतर है । हजारों वर्ष पूर्व जब मानव पृथ्वी पर आया तो वह अपने अस्तित्व को सुरक्षित रखने के लिए ही रात दिन संघर्ष करता था । वन्य जीव और वनस्पतियां उसके क्षुधा तृप्ति के प्रमुख स्रोत थे ।उस समय उसे न तो अहिंसा ज्ञात था न ही भगवान।उस समय उसका बड़ा भगवान उसकी क्षुधा थी । परंतु जैसे-जैसे समय बदला वह यायावर से स्थिर हुआ तो उसने एक सत्ता की संरचना की ।वह सत्ता जो उसे जीवन के दुख,पीड़ा , व्याधि आदि से मुक्त करने में उसकी मदद करेगी ,ऐसा उसने अपने आपको भरोसा दिलाया। यह भरोसा /विश्वास और दृढ़ता प्राप्त करे इसके लिए उसने देवालय बनाए और उसमें अपनी ही संरचना को स्थापित किया। विश्व के इतिहास में इससे बड़ी घटना शायद ही कोई हो ।वैसे इस सत्ता ने विश्व को जहां कुछ खेमों में बांटा हीं मानव जाति को कई भीषण आघात भी पहुंचाए । कुछ अर्थों में देखें तो यह सत्ता अपने अनुयायियों में अपने प्रति एक ऐसा विश्वास पैदा करती है कि मानव उससे इतर कुछ भी नहीं सोच सकता । कुछ मानव समूहों ने तो ईश निंदा का कानून तक बना डाला और उसके नाम पर निरीह मानव वध को सही मानने का तर्क भी देने लगे । ऐसा नहीं कि भगवान के जन्म के परिणाम का हम एकांगी विश्लेषण कर रहे हैं ,इसका दूसरा पक्ष भी है कि मानव एक जुट हुआ ,उसने अपने अंदर गलत कामों से डरने का भी एक भाव पैदा किया कुछ नए शब्द भी अस्तित्व में आए जैसे क्षमा ,दया, धर्म ,करुणा आदि जिसने मान जीवन को सकारात्मक बनाया ।