Afsana wahid (moin raza ghosi) 16 Jun 2025 आलेख बाल-साहित्य Afsana wahid, poetry, artikal, story,shairy 18879 0 Hindi :: हिंदी
बारिश... सिर्फ़ पानी की बूंदें नहीं होतीं, ये क़ुदरत की सबसे ख़ूबसूरत नज़्म होती है, जो हर दिल के अंदर कुछ न कुछ ज़रूर जगा देती है। कभी यादें, कभी एहसास, कभी मोहब्बत और कभी बस एक गहरी ख़ामोशी। जब आसमान का रंग धुँधला होने लगता है, और हवा में एक अजीब सी नमी घुलने लगती है — तब समझो के बारिश आने वाली है। वो पहली बूंद ज़मीन पर गिरती है तो एक ख़ुशबू उठती है — "मिट्टी की सोंधी महक", जो बचपन, घर, माँ और सुकून की याद दिला देती है। बारिश हर शख्स के लिए अलग मायने रखती है। किसी के लिए ये एक पुराने खत की तरह है — जो किसी की यादें भीगाकर ले आता है। किसी के लिए ये एक नई शुरुआत की तरह है — जहाँ हर बूंद पुराने दर्द को धो देती है। बचपन की बारिशें अलग होती थीं — वो कागज़ की कश्तियाँ, गीले कपड़ों में भागना, और माँ की डाँट के साथ गर्म चाय की प्याली। अब बारिशें थोड़ी और सोच भरी हो गई हैं। खिड़की के पास बैठकर कॉफी पीते हुए बाहर टपकती बूंदों को देखना और अंदर कुछ अधूरी सी मोहब्बतों को महसूस करना — यही अबकी बारिशों का अंदाज़ है। बारिश आशिकों की भी पहली पसंद होती है। कोई हाथों में हाथ लेकर भीगता है तो कोई बस अपने दिल के भीगने को ही काफ़ी समझता है। एक शायर ने कहा है — “बूंदें पूछती हैं मुझसे तेरे बारे में, इतना क्यों भीगता है ये दिल हर बारिश में…” बारिश थकी हुई ज़िंदगी में ताज़गी ले आती है। जहाँ हर चीज़ थम-सी जाती है, वहीं बारिश उसे फिर से ज़िंदा कर देती है। पेड़-पौधे खिल उठते हैं, रास्ते निखर जाते हैं, और इंसान का दिल फिर से कुछ महसूस करने लगता है। ग़म के लम्हों में भी बारिश किसी दोस्त की तरह होती है। वो साथ नहीं देती, मगर सारा दर्द अपने साथ बहा ले जाती है। कुछ लोग बारिश में इसलिए भी रोते हैं, क्योंकि कोई आँसू पहचान नहीं पाता। लेकिन बारिश सिर्फ़ शायरी या रोमांस का हिस्सा नहीं है — ये एक ज़रूरत भी है। किसान की आँखें बादलों की तरफ़ टिकी होती हैं, क्योंकि बारिश से उसकी फसल, उसका घर, और उसके बच्चों की हँसी जुड़ी होती है। बारिश जब वक़्त पर होती है तो रहमत, और जब हद से ज़्यादा हो जाए तो ज़हमत भी बन जाती है। इंसान की तरह बारिश भी कभी-कभी रूठ जाती है — सूखा ला देती है। और कभी हद से ज़्यादा आकर बर्बादी का सबब बन जाती है। लेकिन फिर भी, इंसान हर बार बारिश से वही सुकून चाहता है — जो बचपन की किसी बारिश में खो गया था। आख़िर में, बारिश हमें ये सिखा जाती है कि जैसे वो हर चीज़ को धुल देती है, वैसे ही इंसान को भी अपने अंदर की तकलीफ़ों, नाराज़गियों और थकावट को एक बार बहा देना चाहिए — ताकि वो फिर से जी सके, खिल सके। क्योंकि... "बारिश ना सिर्फ़ बाहर की ज़मीन को ताज़ा करती है, बल्कि अंदर के इंसान को भी ज़िंदा कर देती है।"