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आज के दौर मे बड़ती हुई महंगाई

Afsana wahid (moin raza ghosi) 30 Jun 2025 आलेख समाजिक Afsana wahid, poetry, artikal, story,shairy,blog writer, content writer, etc 17039 0 Hindi :: हिंदी

आज की बढ़ती महंगाई: एक आम आदमी की चुप्पी और संघर्ष

महंगाई — ये शब्द अब किसी अख़बार की हेडलाइन या बजट भाषण की गूंज भर नहीं रहा, बल्कि हर रसोई, हर जेब और हर घर की साँसों में घुल चुका है। आज भारत ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया आर्थिक अस्थिरता और महंगाई की जटिल लहरों से जूझ रही है। लेकिन हमारे लिए सबसे बड़ा सवाल यही है — क्या इस महंगाई ने हमारे सपनों, जरूरतों और ज़िन्दगी के तरीके को बदलकर रख नहीं दिया?

जब दाल भी सौ के पार

एक दौर था जब दाल, चावल, सब्ज़ियाँ और तेल आम आदमी की थाली का हिस्सा हुआ करते थे। लेकिन अब ये चीज़ें 'सपनों' की तरह लगती हैं — कभी पास थीं, अब दूर हो गई हैं। टमाटर, प्याज़, आलू जैसी बुनियादी सब्ज़ियाँ तक कई बार ₹50, ₹60 या ₹100 प्रति किलो के पार चली जाती हैं। खाने का तेल जो कभी ₹90 में आता था, अब ₹150 से ऊपर बिकता है। दालें, जो प्रोटीन का किफ़ायती स्रोत मानी जाती थीं, आज अमीरों की थाली में ही सजीव दिखाई देती हैं।

रसोई ही नहीं, ज़िन्दगी भी जल रही है

महंगाई सिर्फ खाने तक सीमित नहीं रही। गैस सिलेंडर की कीमत ₹1000 के आसपास पहुँच चुकी है। पेट्रोल-डीज़ल के दाम हर महीने नए रिकॉर्ड बनाते हैं। इसका सीधा असर हर वस्तु की कीमत पर पड़ता है, क्योंकि परिवहन महंगा होते ही सामान भी महंगे हो जाते हैं। अब बच्चा स्कूल जाएगा तो उसकी फीस, किताबें, यूनिफॉर्म भी जेब ढीली कर जाती हैं। बीमार पड़ो तो दवा और इलाज एक अलग बोझ।

सैलरी वही, खर्च दुगना

सबसे बड़ी विडंबना यह है कि आम आदमी की आय तो वर्षों से एक जैसी है, लेकिन खर्च हर महीने बढ़ता जा रहा है। कर्मचारी वर्ग, मजदूर वर्ग, छोटे दुकानदार — सबको एक ही जद्दोजहद है: "कैसे महीने का खर्च पूरा हो?" EMI, किराया, राशन, बच्चों की पढ़ाई — हर मोर्चे पर दबाव बढ़ता जा रहा है।

बचत अब बीते समय की बात

एक समय था जब लोग महीने के आख़िर में कुछ न कुछ बचा लेते थे — कोई FD, कोई छोटी बीमा योजना, या बच्चों के लिए बचाया गया कुछ पैसा। आज अधिकतर परिवारों के लिए महीने के आख़िर तक बचाना तो दूर, उधार से काम चलाना भी आम बात हो गई है।

सरकार क्या कर रही है?

सरकार की ओर से कभी-कभी राहत योजनाएँ आती हैं — मुफ्त राशन, गैस सब्सिडी, किसान सम्मान निधि आदि। पर ये राहत क्षणिक होती है। जब तक मंहगाई को मूल रूप से नियंत्रित करने की नीति नहीं बनेगी, तब तक अस्थाई राहत लंबे समय तक सुकून नहीं दे सकती।

महंगाई के पीछे अंतरराष्ट्रीय कारण भी हैं — जैसे तेल की कीमतें, युद्ध, व्यापार संकट — लेकिन एक आम आदमी के लिए इन वैश्विक कारणों से कोई फर्क नहीं पड़ता। उसे तो अपने बच्चों के लिए दूध, बूढ़े माता-पिता की दवा और थाली में रोटी चाहिए।

सबसे चुप्पी आम आदमी की

सबसे दुखद यह है कि इस सारे संघर्ष के बावजूद आम आदमी चुप है। वह हर दिन एक नई महंगाई से लड़ रहा है, मगर कोई आवाज़ नहीं उठा पा रहा। वह न तो विरोध करता है, न ही मांग करता है। वह बस 'एडजस्ट' करता जा रहा है — अपनी ज़रूरतों को काटकर, सपनों को छोटा करके, खुशियों को सीमित करके।

समाधान की ज़रूरत

महंगाई को काबू करने के लिए सरकार को दीर्घकालिक नीति बनानी होगी। किसानों को सशक्त बनाना, बिचौलियों को हटाना, आयात-निर्यात संतुलन साधना, और आम आदमी की आय में बढ़ोतरी जैसे कदम उठाने होंगे।

साथ ही, आम जनता को भी जागरूक होना होगा। यदि हम अपनी समस्याओं को खुलकर साझा करेंगे, मीडिया, सोशल मीडिया और जनसंवाद के ज़रिए, तभी हमारी आवाज़ सुनी जाएगी।


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निष्कर्ष:

महंगाई सिर्फ़ अर्थशास्त्र की बहस नहीं है — यह एक ज़िन्दगी का मसला है। एक माँ की रसोई का, एक पिता की चिंता का, एक छात्र की किताबों का, और एक बुज़ुर्ग की दवा का। जब तक हम सब मिलकर इससे लड़ने की नीयत नहीं बनाएँगे, तब तक यह हमारी चुप्पी पर राज करती रहेगी।

अब वक्त है — चुप्पी तोड़ने का।

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