Afsana wahid (moin raza ghosi) 07 Jun 2025 आलेख दुःखद Afsana wahid ,poetry ,artikal, story shairy 25538 0 Hindi :: हिंदी
ग़रीबी... लोग कहते हैं कि ये बस एक हालात है, एक वक़्त है जो बदल जाता है। मगर क्या वाक़ई? कभी किसी ग़रीब के दिल में झाँक कर देखो, ये सिर्फ़ पैसों की कमी नहीं होती, बल्कि हर रोज़ जज़्बातों का मसलना होता है। मैं ग़रीब हूँ — इसमें मेरी कोई गलती नहीं। मगर समाज ने इसे मेरी पहचान बना दिया है। मेरा पहनावा, मेरा खाना, मेरी चप्पलें, मेरा स्कूल का बैग — हर चीज़ पर ताना कसने वाले मिल जाते हैं। "ग़रीब की इज़्ज़त नहीं होती, उसके जज़्बात भी लोगों की हँसी का सामान बन जाते हैं।" जब मैं स्कूल गया, तो बच्चों ने मेरा लंच देखकर मुँह चुराया, मेरा फटा हुआ बस्ता देख कर हँसे, मेरे सादे कपड़ों पर फब्तियाँ कसीं। कभी-कभी सोचता हूँ, क्या मेरे पास ब्रांडेड कपड़े होते तो दोस्त मिलते? क्या माँ के हाथ की रोटी में उतनी ही बेइज़्ज़ती होती, अगर उसे किसी अच्छे डब्बे में रखा होता? "मज़ाक तब और चुभता है, जब वो तुम्हारी मजबूरी पर किया जाता है।" मेरे जूते घिस चुके हैं, पर पैर अब भी दौड़ना चाहते हैं। पेट खाली है, मगर ख्वाब अब भी बड़े हैं। पर ये समाज — ये लोग — मेरी हालत नहीं, मेरी हिम्मत को रौंदते हैं। कभी किसी की पार्टी में जाओ तो लगता है जैसे हमारे होने से वहाँ की रौनक कम हो जाएगी। नज़रें ऐसे चुभती हैं, जैसे हमने उनकी दुनिया गंदी कर दी हो। "ग़रीबी खुद से नहीं डराती, लोगों की नज़रें और उनका बर्ताव डराता है।" कभी मज़ाक बनकर तो कभी तिरस्कार बनकर, हर रोज़ मैं खुद को साबित करने की कोशिश करता हूँ। और फिर सोचता हूँ — क्या मेरी मेहनत, मेरी इज़्ज़त, मेरी इंसानियत सिर्फ़ पैसों से आँकी जाएगी? अगर मेरे पास पैसे नहीं तो क्या मेरा दिल भी सस्ता है? क्या मेरी माँ की ममता, मेरे बाप की मेहनत, इन पैसों से कमतर है? "ग़रीबी कोई शर्म की बात नहीं, शर्म की बात तो ये है कि इंसान को उसके हालातों से नापा जाए।" आज मैं ग़रीब हूँ — ये सच है। मगर कल क्या होगा, ये मेरे हौसले तय करेंगे। और उन सब लोगों से जो मेरी हालत पर हँसते हैं — बस इतना कहना है: "वक़्त सबका आता है, आज मेरा है — तो हँसो। कल जब मैं उड़ूंगा, तो ये हँसी तुम्हें ताली बजानी पड़ेगी।"