जिन्दगी चलती है चलते रहो,
वक्त के साथ थोड़ा बदलते रहो ...
राह मुश्किल भी निकल जाएगी,
ठोकरें खा के भी थोड़ा संभलते रहो...
अंधेरा तो जुगनू स read more >>
शीर्षक (गर्मी का मौसम)
मेरे अल्फ़ाज़ (सचिन कुमार सोनकर)
उफ़ ये गर्मी हाय ये गर्मी।
उफ़ ये कैसी गर्मी है,
चारों तरफ ही आग है,
ये सब गर्मी का ही read more >>
शहर से निकले कि वे शहर हो गए ,
घड़ी भर न संग ले बेखबर हो गए।
अब तो पूछा किये किस गली में हो तुम,
हर अंधेरे से बढ़कर रोशनी हो गए।
शायद नहीं थ read more >>