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भूल गया लिखना नसीब में सुख
क्या भूल गया तू लिखना मेरे नसीब में सुख क्या घोल दिया तूने नसीब में मेरे सिर्फ कड़वाहट तरसते है किसी के सच्चे प्यार के लिए मांगते हैं
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बनावटी जिन्दगी
बनावटी जिन्दगी कितनी बनावटी जिन्दगी जीने लगे है हम ? झूठा रोने लगे है हम झूठा हँसने लगे है हम | एक चेहरे पर कई चेहरे लगा कर जीने लगे है ह
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भगवान से ही है सारी खुशी
भगवान से ही है सारी खुशी खुशियां छीनता भी है वही उसी ने ही बनाई ए दुनिया उसे मिटाएगा भी वही जिसके बिना ना हिलता एक भी पत्ता वह तो है सि
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सबके मन में बसे भगवान
है चारो दिशा में समाये हे सबके मन में बसे ए भगवान है जो सबको अपना कहें इस की कृपा से चले यह सारी दुनिया ना कोई झूठ पर सीढ़ियां रचा सकता
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" चाय पार्टी "
नमस्ते दोस्तों 🙏🙏 आयुष पिछले 1 घंटे से अपनी मम्मी को कॉल कर रहा था , पर उसकी मम्मी उसका कॉल उठा ही नहीं रही थी । तभी उसके पापा पंकज घर म�
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तब जाकर मिलता है लक्ष्य
आंखों मे लेके नींदे,हम जगते हैं रातों को तब जाकर मिलता है हमारा लक्ष्य हमको ना चैन मिलता है, जब ना करे जो काम जिसे हासिल हो सकता है हमक�
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जिंदगी एक रड़ क्षेत्र है
जिंदगी एक रण क्षेत्र है, अगर परिस्थितियों से युद्ध किया तो योद्धा बन जाओगे अगर परिस्थितियों को जीवन मान बैठोगे तब उसके गुलाम बन जाओगे,
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मेरा मैं मुझमें सिमटकर रह गया है,
मेरा मैं मुझमें सिमटकर रह गया है, जीवन के भीतर छुपकर रह गया है। बहुत सारे सपने थे मेरे पास, पर राही उनमें ही उलझकर रह गया है। हर चीज की
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आँचल के आँच से पिघल जायेगा
आँचल के आँच से पिघल जायेगा तेरा कोमल नाजुक बदन अंगड़ाई लेती बे खौफ बेखबर नयेन किसी दिन भाग जाएगी ले के चैयन निगोड़ी जुल्फ तेरी बदनाम
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अधखिले कपास के फूलों से
तुम आते थे। झिम झिमबरसात की बूंदों से, अधखिले कपास के फूलों से, कलियों की किंचित छाया से, विचलित मन की प्रति छाया से, कहते सुनते अपने ध�
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चलो पथ गामी बने
आज संकुचन को मिटाकर चलो पथ गामी बने। है धरा निस्तेज अलौकिक रूप के स्वामी बने। हदय पर यह बोझ कितना, था ही उसका साथ कितना, मन की इस विचलि�
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कलयुग-यह कलयुग का प्रभाव
कविता = ( कलयुग ) कथनी करनी में फ़र्क़ हुआ ! यह कलयुग का प्रभाव !! कर्म हुए दानव जैसे ! बातों से भगवान !! भगवा भी बदनाम हुआ ! भगवे में शैतान
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