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तुम बस मुस्कुराना-हजारों दीप जल जाए
हजारों दीप जल जाए तुम बस मुस्कुराना। निगाहें मेरी थम जाए तुम बस मुस्कुराना। दर्द जब भी बढ़े कि सीना चीर जाए हौसला उससे मिलने का कभी
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मैने बेवफा से प्यार किया-ये दर्द मुझे मिलना ही था
तू धोखा है ये सबने कहा पर मैने ये सब इनकार किया। ये दर्द मुझे मिलना ही था मैने बेवफा से प्यार किया। केशव सिंह 📝
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अपनी दर्द किस्से सुनाऊ-मजदुर जैसी भी जिंदगी ना हमार
मेरे पैर में फटे व्यार किस्से मै सुनाऊ ना घर सुने ना सरकार सुने क्या घुट घुट के मर जाऊ इस महगई की दौड में ना पेट भरे ,ना खुश मेरे परिव�
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दिल की बात- शायरी के ज़रिए छा जाता हूँ
ज़रा सा दिल की बात कह देता हूँ, शायरी के रूप में यहां लिख देता हूँ। जब दर्द का सामना करना पड़े, ख़ुद को हंसते हुए बयाँ कर देता हूँ। इश्�
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सूरज है तो शाम होनी भी तय है -जब इंसान है तो इलज़ाम भी लगना तय है
दुनिया में जिसकी जितनी समझ होगी वो उतना ही दूसरो को समझ पाएगा आप खुद के बारे में लोगो को समझा कर अपना वक़्त जाया ना करे जनाब - और सुनो सूरज
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मोहब्बत करके हमने देख लिया
मोहब्बत करके देख लिया हमने प्यार कितना भी सच्चा क्यों ना हो। एक दिन साथ छोड़ ही देती है।
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जब साईं का ठिकाना घट में है-तो मंज़िल भी तन में मिलेगी
नाहीं ज़िंदगी पतंग है कि कट जाएंगे। नाहीं राह अनजान है कि गुम जाएंगे।। जब साईं का ठिकाना ही हर घट में है। तो जनाब मंज़िल भी तन में ही �
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हम तो पास आने की कोशिश में थे-न जाने बो क्यों दूरियां बनाते गए
एक शिलशिले की उम्मीद थी जिनसे बो फासले बनाते गए। हम तो पास आने की कोशिश में थे न जाने बो क्यों दूरियां बनाते गए। केशव सिंह 📝
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प्यार निभाया नही जाता तो जताया मत करो
प्यार निभाया नही जाता तो जताया मत करो प्यार है मुझसे ये सबको बताया मत करो। झूठी मोहब्बत की कहानियां सुनाए फिरते हो। यूं हर जगह किसी क�
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कथनी करनी में अंतर ना -नहीं भरोसा होता
नर से नारायण कहां गया, मेरा वह बचपन सारे खेल खिलौने, समय आज का लगता जैसे कितने क्रूर धिनौने। साथ बैठना उठना मुस्किल मुस्किल मिलना �
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फुटपाथ पर-दिख जायेंगे या मिल जाएंगे कुछ ऐसे लोग
फुटपाथ पर…. कभी चल कर आगे बढ़ कर दो चार कदम सड़कों पर देखो तो, दिख जायेंगे या मिल जाएंगे कुछ ऐसे लोग फुटपाथ पर खाते पीते सोते बेफ�
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किसी ने उस से किया था फरेब-उदास हो निकाल दी थी पाजेब
(मुक्तक छंद) किसी ने उस से किया था फरेब, उदास हो निकाल दी थी पाजेब, आया उसके लिए खुशी बनकर, मैं बन गया हूं अब उसका कालेब। संदीप कुमार सिं
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