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दुःख भरी आसूँ-मुझे बड़ा दुःख होता है
तेरे आंसूओं को बहता देख मुझे बड़ा दुःख होता है । किस चीज की तुम्हे जरूरत है । मुझे जान कर और भी दुःख होता है । मैं चाहता हूं वो वस्तु त�
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जीवन की आस-जब तक सांस में सांस है समझो अभी भी आस है
हर दिन चमकता सूरज, हमको यही बताता है। काली रात हो चाहे, कितनी घनी, फिर उजाला आता है। हार जाओ अगर, लाखों बार, प्रयास करो, फिर भी लगातार। ज�
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मेरा गाँव-वो सुन्दर हमारे खेत खलिहान जो बताते हैं हमारी पहचान
मेरा गाँव वो छोटा सा मेरा गाँव जिसमें चलते हमारे पाव वो सुन्दर हमारे खेत खलिहान जो बताते हैं हमारी पहचान पेट की भुख वाली आग
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कावळ्यांचा पडलाय मोत्यांवर डाव
सांडली पेणातली शाई मला भरता येत नाही, सरपंचा विषय काही बोलता येत नाही. गावात कामे नाही होत आता तस्तीची , गा*त शब्द मोडतो यांचा मस्तीची.
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कागजों के टुकड़ों पे-अल्फ़ाज दोबारा मुलतवी न हो पायेंगे
"टुकड़ों पे" "हम मसरूफ क्या रहने लगे कारोबार में,की उनकी यादों को लगा की,अब उनकी कलम से निकले हुये अल्फ़ाज दोबारा मुलतवी न हो पायेंगे, का
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पिता पर्वत के समान होता है- बाहर से कठोर अंदर से मुलायम होता है
पिता एक पर्वत के समान होता है बाहर से कठोर अंदर से मुलायम होता है झुक जाता है तुम्हारी ख्वाहिशों के लिए क्योंकि उसको तुम्हारी ब�
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चलते चलते आया एक ख्याल-सच और झूठ है क्या
चलते-चलते- आया एक ख्याल, सच-झूठ- है क्या आया-ए-ख्याल,, झूठ का दौड़- है माया तक जाता, सत्य- अविनाशी तक ले जाता....!!!! -मोती
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जग में दो पथ-सत् झूठ ये नाम
जगत में दो पथ बंदे, सत्-झूठ ए-नाम बंदे, चुनना तुम्हें एक पथ बंदे, सत् बसे मंज़िल बंदे....!!!! -मोती
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मनमानी किसकी चली नहीं किसी का यार
#विधा:_कुंडलिया छंद #"सृजन समीक्षार्थ प्रस्तुत" मनमानी किसकी चली,नहीं किसी का यार। ऐसों को हो हाल यह,सदा मिली है हार।। सदा मिली है हार,�
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त्याग रखें अभिमान को-मन में हो अनुराग
#विधा:_मुक्तक छंद #"सृजन समीक्षार्थ प्रस्तुत" मनमानी किसकी चली,बड़े बड़े हो ढ़ेर। हर कुछ का है दायरा,माने जो वह शेर। त्याग रखें अभिमान
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रावण थे अति वीर-उसको था वरदान
#विधा:_रोला छंद #"सृजन समीक्षार्थ प्रस्तुत" रावण थे अति वीर,चली कभी न मनमानी। उसको था वरदान,दिए शिव थे जो दानी।। हुआ उसे अभिमान,हरण कर आ�
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मनमानी किसकी चली-खोकर सब अधिकार
#विधा:_दोहा छंद #"सृजन समीक्षार्थ प्रस्तुत" मनमानी किसकी चली,नहीं किसी का यार। मनमानी वाले गए,खोकर सब अधिकार।। मनमानी किसकी चली,बड़े �
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