काश! समंदर के बीच कहीं खो जाता,
ना किनारे की उम्मीद ना मंजिल की,
बस लहरें जहां ले जाए वही चलता जाता,
आश जैसे खत्म हो गई, वैसी ये घड़ी आई है , read more >>
बहुत दिनों जो थें परतंत्र ,
लड़ी लड़ाई हुएं स्वतंत्र ,
लागू हुआ है तब जनतंत्र ,
भारत बना‌ है अब गणतंत्र।
इस शुभ दिन की चाह में ,
देशभक्� read more >>
तेरे नाम से इस कदर रोया आज ---2
तुम रुह हो मेरी --
मैं जिस्म हूँ तेरी ,
तुम बिन कैसे जीऊँगा ,
लौट के आ जाओ ---2
तुम बिन अधूरा हर साज़ ,
करो दास्ताँ � read more >>
किसे सुनाऊँ दास्ताँ ग़म की ---2
आज भी रुला जाती है ,
रवानी शाम की ---
कहकशाँ सी धुंधली सूरत ---2
जहाँ में तुम आफ़ताब ईद का ,
बेताब है दिन , बेचैन रा� read more >>