इक तलप लगी है तेरी, उसे बुझाऊ कैसे
इस बन्झर जमी पे, हरियाली लाऊ कैसे
सौ अरमानो को दबाकर, इक ख्वाईस् की है
उस दिलके ख्यालों को, हकीकत मे ब� read more >>
भेदों की मूर्खता
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जब बिजली पानी एक है,
धरती भी सबकी एक है,
न चांद सीतारें अलग यहाँ,
सूरज भी कहाँ अनेक है,
न अग्नि करती भेद यहाँ,
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14 साल की प्रतीक्षाओं का अंत हो रहा था। किसी को कुछ सूझ न रहा। भरत जी ने कहा सब लोग नंदिग्राम चलें। लोग दौड़ पड़े। गोस्वामी जी कहते हैं कि read more >>