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विश्व की विशालता
विशालता अंतहीन अंतरिक्ष में आज करें जीवन में कुछ विशाल! करें प्रज्वलित ज्ञान की मशाल दिखाती है जो मोक्ष का मार्ग! होते हैं प्रगट �
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प्रभु मिलन
प्रभु-मिलन करते हैं दर्शन कण-कण में मिलते हैं प्रभु क्षण - क्षण में! करते हैं जीवन में उनका ध्यान करते हैं पूरा जो अधूरा ज्ञान! होती
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पिता का प्यार बेशुमार
पिता होते घर की शान है इनसे होती हमारी पहचान है ।। इनका होता है अलग अंदाज डांट में ही छुपा होता है प्यार।। डटकर मुश्किलो का सामना करते
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पितरों का सम्मान
पितर पक्ष में श्राद्ध कर,और करें कुछ दान। मिले शांति तब पितर को,तभी बढ़ेगी आन।। पितरों का सम्मान कर,पितर पक्ष में यार। श्राद्ध कर्म स
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कितना पढ़ोगी किताब
जब पढ़ना शुरु किया जीवन का अर्थ समझ आया नई दिशा नई उमंग की ओर बढ़े कदम चारों ओर।। कभी कुछ वक्त मिला ही नहीं कुछ अलग किया ही नहीं बस कित�
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दिल बसता है गाँव में
कविता शीर्षक : दिल बसता है गाँव में आ गए शहर में रहने लगे फ्लैट में लेकिन आज भी दिल बसता है गाँव में I मुर्गा का बाँग देना, कोयल क�
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प्यार एक अधूरा सा
न हुआ पूरा, है कुछ अधूरा प्यार भी लगता है बस अधूरा चाहतें होती है बहुत खास है एक अनकहा एहसास।। वक्त जब था इसे न समझ पाए जिसे चाहकर भी भ
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निरलेप
"सत्यसार नहीं प्रतिबंधित, भीतर जाकर खोज करो।" "कहां किसकी माने बैठे हो, खुद सोचो ज़रा होश करो।" "जग का मालिक बैठ देह में हो गया बंद अलेप" "�
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प्रकृति और मानव
प्रकृति और मानव प्रकृति मुस्करा रही हैं, मानव पर तरस रही हैं। फूल भी खिल रहे हैं, पक्षी भी गा रही हैं। पेड़-पौधे झूम रहे है, तितलिय
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कर्म ही पूजा है
एक - दूसरे की करे हम सहायता, जिससे प्रसन्न हो हमारे परमात्मा। मानवीय कर्म - कथा से मिलती है प्रेरणा, मानव को सुख पहुंचाने से मिलती है सर�
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एक समंदर प्यासा था
एक समंदर प्यासा था रचना -प्रतिभा खडेकार एक समंदर प्यासा था, रेत महा जमीन सुक्खा था। लहरों ने तो घेरा किनारा, ना अंश शेष बचा था ओस। एक �
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ईश्वर
तब तक ये चलता रहे, जब तक इसमें मैं जो मै इस से जुदा हुई, ये कुछ भी ना है
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