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मेरा इश्क इबादत बन जाए
शीर्षक: मेरा इश्क इबादत बन जाए सब्र इतना रखो कि, इश्क मुकम्मल हो जाए, इश्क बेहूदा न बने, मेरा इश्क इबादत बन जाए। इश्क इबादत ऐसे बने,
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ख्वाबों का आशियाँ
शीर्षक: ख्वाबों का आशियाँ गमगीन है जिंदगी कुछ पल की, मुस्कुराकर गले लगाती हूँ दो पल की इस जिंदगी में, मैं ख्वाबों का आशियाँ सजाती हू�
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महात्मा बुद्ध को आत्मज्ञान
*महात्मा बुद्ध को आत्मज्ञान* जिस कुमार के जन्म दिवस पर, पिता ने पुत्र का नाम रखा सिद्धार्थ था, जिस का उद्देश्य पूर्ण हो गया हो, उनके ना�
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माता मैं भी बुद्ध बनूंगा
"बुद्ध बनूंगा" ज्ञानवान आत्म का स्वामी तपकर अंतर शुद्ध बनूंगा माता मैं भी बुद्ध बनूंगा घटा कोप इस कालखंड को चीर भोर का पुष्प खिलूंग
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जिम्मेदार बन
जिम्मेदार बन जब तू अश्रु बहाना चाहे, रोक लेना उसे, कंही बाहर ना आ जाए, अंतरात्मा को अपनी तुझे, उस अश्रु बिंदू से ही स्वच्छ करना होगा, त
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लगता है इंसान होना पाप से है कम नहीं
लगता है इंसान होना पाप से है कम नहीं तार है इंसानियत इंसान को है गम नहीं क्या सही है क्या ग़लत न तौलता इमान को मार कर इंसानियत को पालत�
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मैं यथार्थ सत्य हूं
"रूह"मैं क्षणिक क्षण भुंगर नहीं मैं यथार्थ सत्य हूं किन्तु तुमको दीख ता जो मैं वही असत्य हूं' हूं चराचर में रमा क्या कोई मुझको जानता ह�
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छप्पर वाले यार पुराने आंगन में
छप्पर वाले.... छप्पर वाले यार पुराने आंगन में औस टपकती रात सिराहने आंगन में चादर में ढकता हूं तन जैसे तैसे कैसे सोऊं रात बिताने आंगन मे
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मैं कुछ बेहतर नहीं लिखता
"मैं कुछ बेहतर नहीं लिखता" मैं कुछ बेहतर नहीं लिखता यूं ही जिस ओर देखता हूं, दर्द में डूबे लोगों की "आह" जब भीतर उतरती है निकाल लाती है व
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रूपवती
तुम रूप का भंडार लिए सोनभद्र नदी बनी मैं छोटा सा आकार लिए एक बूंद जल बना। तुम भिन्न-भिन्न श्रंगार किए एक गंगधार बनी मैं सिर्फ ठूंठ पत्�
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ढूंढने में देर ना कर
खाक पर ही बात होगी जिस्म का गुरुर न कर नाम जप मालिक से मिल खुद से खुद को दूर न कर। डूबने में भेद है पर ढूंढने में देर ना कर, रब तेरे भी�
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मेरी दौलत—पापा की बदौलत
मेरी दौलत—पापा की बदौलत मेरे पापा कभी सख़्त हो जाते हैं, कभी सरल हो जाते हैं, मैं इस बात से हैरान हूँ, वक़्त के साथ-साथ कैसे वो हर वक़्त
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