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#विधा:_रोला छंद #"सृजन समीक्षार्थ प्रस्तुत" रावण थे अति वीर,चली कभी न मनमानी। उसको था वरदान,दिए शिव थे जो दानी।। हुआ उसे अभिमान,हरण कर आ� read more >>
#विधा:_दोहा छंद #"सृजन समीक्षार्थ प्रस्तुत" मनमानी किसकी चली,नहीं किसी का यार। मनमानी वाले गए,खोकर सब अधिकार।। मनमानी किसकी चली,बड़े � read more >>
सांस की जरूरत है जिन्दगी के लिए, आंख की जरूरत है देखने के लिए। दोस्त की जरूरत है जीने के लिए, हवा की जरूरत है सांसों के लिए। चांद की जरू read more >>
जिसने मानी बुद्धिमान की सलाह, उसका होता है सदा भला, इस सलाह से कोई नहीं हो सकता खफा, बुद्धिमान को भी माननी पड़ जाती है, कभी-कभार मूर्ख की � read more >>
#विधा:_दोहा छंद #"सृजन समीक्षार्थ प्रस्तुत" कौरव पाया जीत कर,पांडव पर अधिकार। हार गए तिय द्रोपदी, और हुआ लाचार।। चीर हरण करने लगा,भरी स read more >>
#विधा:_दोहा छंद #"सृजन समीक्षार्थ प्रस्तुत" धीरे धीरे एक दिन,होगा बम विस्फोट। बढ़ता यहां अधर्म से,अच्छों में भी खोट।। धीरे धीरे एक दि� read more >>
#विधा:_दोहा छंद #"सृजन समीक्षार्थ प्रस्तुत" अपने मन की बात से,जीतें यह संसार। गौरव बन कर देश का,सबको दें अधिकार।। अपने मन की बात को,नही� read more >>
#विधा:_दोहा छंद #"सृजन समीक्षार्थ प्रस्तुत" एक भरोसा राम का,जो रहते हैं साथ। हर विपदा से ले बचा,सिर पर रख वो हाथ।। एक भरोसा राम का,जिससे read more >>
#विधा:_दोहा छंद #"सृजन समीक्षार्थ प्रस्तुत" ऐसी कैसी जिन्दगी,रहती है नाराज। दूर ज्ञान से यह रहे,गलत करे हर काज।। ऐसी कैसी जिन्दगी,रहता read more >>
#विधा:_मुक्तक छंद #"सृजन समीक्षार्थ प्रस्तुत" हँसी और मुस्कान से,करिए नित आदाब। पाएं दुआ असीम तब,रहे शक्ल पर आब। औरों को भी कर सरस,लिए ह� read more >>
#विधा:_रोला छंद #"सृजन समीक्षार्थ प्रस्तुत" हँसी और मुस्कान,रहे जिसका गर साथी। भय रहता है दूर,मिले सदगुरु की थाथी।। पाएं तब सब ज्ञान,बन� read more >>
#विधा:_कुंडलिया छंद #"सृजन समीक्षार्थ प्रस्तुत" आशिक मेरे हैं सभी,बनकर अदभुत सोम। हँसी और मुस्कान से,खिल जाता है रोम।। खिल जाता है रोम,� read more >>
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