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#विधा:_दोहा छंद #"सृजन समीक्षार्थ प्रस्तुत" मन पापी माने नहीं,भागे सबसे तेज। हर दिन कुछ है सीखता,पढ़ता हरेक पेज।। मन पापी माने नहीं,कर� read more >>
बिक रहा कर्म यहाँ ,बिक रहा इंसान पैसों की बल पर बिक रह नियम और विधान चारो ओर बईमान का साया कब चेतेगा इंसान नारी क� read more >>
मैं जिस जगह पे, रहता था । वहाँ न कोई आता - जाता । चारों तरफ जो, थी सूखी नदियाँ न था उसमें थोड़ा सा भी पानी खेत - खलिहानों में फसलें न थी । पड read more >>
भोली सी, प्यारी सी वो मेरे दिल में रहती है । मुझसे बातें वो करती है ॥ साथ निभाने का वादा करती है । कभी रोती , कभी हँसती मेरे को अच्छा लगत� read more >>
तू दिखती है इतनी भोली -भाली लगती है किसी की राजकुमारी या हो राज दुलारी ... रोज सवेरे आ जाती मेरे घर को, मेरी प्यारी लाडली से मिलने जाने क� read more >>
थे एक तपस्वी ऐसे वो जो आज धरा पर नहीं रहे। कर दिया समर्पण् जीवन सब और भ्रातृ प्रेम में रमे रहे।। जिस माँ की गोद में खेले थे उस माँ के लो read more >>
प्रेम से जिसने जग को मोह लिया, आपने पिता के वचनों के खातिर, राज -पाठ से भी मुंह मोड़ लिया, 14 वर्ष वनवास किया, हर कठिनाई से लड़ने का प्रयास � read more >>
पहली नजर का प्रेम,करता बेचैन,जब असफल होता है पहली नजर का प्रेम, इसे पा लेने वालों को मिलता है बहुत चैन, इस प्रेम को खोने में कटते हैं, दुख � read more >>
चल पड़ी पंक्तियां प्रेम के कुंज में रो पड़ी ये दिशाएं तुम्हारे लिए। सोचते सोचते नीर बादल बना गंगा निर्मल वही है तुम्हारे लिए। नेहा द read more >>
#विधा:_मुक्तक छंद #"सृजन समीक्षार्थ प्रस्तुत" एक जरा सी भूल से,भारी हो नुकसान। और व्यर्थ चिन्ता रहे,जाते घट है मान। मंद पड़े तब हौसला,आ� read more >>
#विधा:_कुंडलिया छंद #"सृजन समीक्षार्थ प्रस्तुत" उनको भी तो हो पता,मुझको उनसे प्यार। एक जरा सी भूल हो,कर दूं मैं इजहार।। कर दूं मैं इजहा� read more >>
#विधा:_रोला छंद #"सृजन समीक्षार्थ प्रस्तुत" एक जरा सी भूल,नुकसान करती भारी। पीछे और धकेल,चलाए मुझ पर आरी।। रहे निकलती आह,दर्द को फिर दि� read more >>
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