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किताबों से दोस्ती है मेरी
किताबों से दोस्ती है मेरी, कलम से गहरी मीत है मेरी, डायरी से प्रीत है मेरी।
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आंखें मूंदकर किसी पर विश्वास ना करें
आंखें मूंदकर किसी पर विश्वास ना करें,अपने रास्ते खुद चुनें, लोग धोका भी देते हैं,धक्का भी किसी के पीछे रास्ते पर ना चले, यहां हाल‌ बहु
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बसंत ऋतु
बसंत ऋतु आई है जीवन में कुछ रंग भरने आई है कुछ नए गीत गुनगुनाने आई है कुछ भूली बिसरी यादें सुनाने आई है चारों तरफ फैली है हरियाली �
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कृष्ण अर्जुन
देश द्रोपदी सी ड़री सकपकाई घबराई दुशासन नीडर सा धुम रहा राजा धृतराष्ट्र सा लाचार है दुर्योधन बे खौफ हो घुम रहा प्रजा को पांडव समझ �
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दिल मे तुफान सा उठने लगा है
चित्र बदल रहा या फिर चरित्र समझ मे आता नही ये तस्विर सुना है कीसि से की देश बदल रहा क्या मैं अंधा हो गया हूँ कुछ दिखता नहीं अभी अभी त�
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जज्बात छोड आया हूँ
तु खड़की पे नही फिर भी गुलाब फेक आया हूँ ये दिल किस वेशर्मी पे उतर आया है जिधर जाऊ उधर तु ही तु दिखता हैं घर के दरबाजे पे छत पे गली क�
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कोई धोखा तो नही
तु जीद है मेरी की तुझे पा सकु अपने कल्पनाओं मे तुझे उडा सकु हर बक्त तु रहता है मुझ मे ही मैं एैसा क्या करू की तेरे दिल मे खुद को बसा स�
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थोड़ा तु भी जिद्दी है
ये दीप थोड़ा तु जल थोड़ा मै पिघलता हूँ बस इतना रहम करना न तु बुझना न बुझने देना राह बहुत है मूशकिलो भरा कुछ जहरीला कुछ पथरीला बस एक करम
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रोने लगा है
कुछ तो बात है मोहब्बत मे बरना प्यार के लिए ताज महल कौन बनाता है कोई तो कीडा ज़रूर दफन है सिने मे जो मोहब्बत के आग लगाता है सायद मुझे �
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तु रोज रोज आया कर
मैं तब भी तेरा ही आशिक था और अब भी बस कुछ हम बदल गए थोडा हालात बिगड गया बाकी मैं बही ज़ाजबात बही येहसाश बही आज भी तेरे लिए ही धाडकता है
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औरत
ईश्वर के दिया हुआ आदमी को अनमोल भेट जो जाहिलों को भी इंसान बनाती जानवरों मे भी प्रेम जगाती भटके को राह देखाती जीवन मे रंग भर देती है
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कन्फुज
मैं ता ति था थी रा री का कि ना नि हमेशा मुझे कन्फुज करता करती है इसलिए मैं जब भी कुच्छ लिखता हूँ बिना भेद भाव किये मैं ति और ता का प्र
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