Pravin Chaubey 14 Feb 2025 शायरी देश-प्रेम #shayari#poitry#kavita# 19255 0 Hindi :: हिंदी
फसलें लहराती थीं जिस आंगन में कभी,
अब वहाँ ईंट-पत्थर के महल खड़े हैं,
गाँव की गलियाँ मुझे अब भी बुलाती हैं,
पर मैं मजबूरी के बोझ तले पड़े हैं।"
"नंगे पाँव जो दौड़ते थे खेतों की मेड़ों पर,
आज जूते पहनकर भी दर्द सहते हैं,
गाँव की मिट्टी में जो अपनापन था कभी,
वो शहर की भीड़ में कहीं खो गए हैं।"
"गाँव की चौपाल पर बैठकर जो किस्से सुनते थे,
शहर की खिड़कियों से अब वो आवाज़ नहीं आती,
वो छत पर तारों संग जो बातें करते थे,
अब मुँह छुपाकर चाँद भी निकल नहीं पाता।"
"सावन के झूले, वो आम के बाग़ान,
गाँव के किस्से, वो मिट्टी की जान,
शहर के बिस्तर पर चैन नहीं आता,
गाँव का वो खटिया का आराम।"
- प्रवीण चौबे
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