Anilkumar Rathwa (Sameer) 24 Aug 2025 कविताएँ धार्मिक कर्ण और अर्जुन 13173 0 Hindi :: हिंदी
कौरव-पांडव रणभूमि में आए, धरती ने भी स्वर थरथराए। ध्वनि उठी शंख और नगाड़ों की, पर मन में आँधी थी अरमानों की। कर्ण ने देखा सामने अर्जुन को, जैसे आईना देखे स्वयं को। सोचा — “काश जन्म का राज खुला होता, तो मैं भी आज तेरे संग खड़ा होता।” अर्जुन ने मन ही मन सोचा, “कर्ण, तू वीर है, तुझमें कोई दोष न पोषा। पर तेरे संग है अधर्म का दल, मुझे निभाना है धर्म का पल।” कर्ण बोला — “अर्जुन! तुझे कृष्ण सारथी मिले, मुझे जीवनभर तिरस्कार मिले। तेरे पास गुरु का वरदान है, मुझे तो बस संघर्ष की पहचान है। मैंने भी धनुष उठाया है, भाग्य से नहीं, साहस से पाया है। पर आज वचन से बंधा हूँ मैं, मित्र धर्म से जुड़ा हूँ मैं।” अर्जुन चुप था, मन में वेदना, सोचा — “भाग्य ही खेल रहा है छलना। क्यों तू शत्रु बन सामने खड़ा है? क्यों भाग्य तुझे मुझसे लड़ाता बड़ा है?” धरती साक्षी बनी उस द्वंद्व की, कृष्ण मुस्काए उस सत्य की। “एक का बल धर्म है, दूसरे का बल कर्म है। पर धर्म बिना कर्म अधूरा, और कर्म बिना धर्म अंधा।” अंत में तीर चला गांडीव से, कर्ण गिरा रणभूमि की चीख से। पर गिरते ही अमर हो गया, संघर्ष का दीपक प्रखर हो गया।