MD SHAYEED ALAM 01 Nov 2025 कविताएँ देश-प्रेम देश प्रेम कविता 9688 0 Hindi :: हिंदी
वर्दी नहीं पहनती लेकिन, सैनिक धर्म निभाती हूं। पत्नी हूं फौजी की मैं, सैनिक धर्म निभाती हूं। वह जब भी सरहद पर जाते , उनकी खैर मनाती हूं। विरह की अग्नि में पल-पल, मैं तो जलती जाती हूं। वर्दी नहीं पहनती लेकिन, सैनिक धर्म निभाती हूं। बाबा की सेवा करती हूं मैं, बच्चों को मैं बहलाती हूं। हर गम खुद ही सह लेती, मैं उनको नहीं बताती हूं। मैं सैनिक धर्म निभाती हूं, मैं सैनिक धर्म निभाती हूं। बाबा हुए बीमार घर पे, उनसे मैं यह छुपाती हूं। घर में सब कुछ चंगा है, मैं उनको यही बताती हूं। बिटिया रोती है बिन पापा के, उसको मैं समझाती हूं। वर्दी नहीं पहनती लेकिन, सैनिक धर्म निभाती हूं। जंग की जब होती शुरुआत, सबको मैं समझाती हूं। वह है बिल्कुल सही सलामत, सबको यही बताती हूं। जंग में हो गए हैं वह घायल, मैं किसी को नहीं यह बताती हूं, मैं खुद ही रोते रहती हूं , मैं सबसे बात छुपाती हूं। वह आ जाए घर सही सलामत, यही दुआ मैं करती हूं। वर्दी नहीं पहनती लेकिन, सैनिक धर्म निभाती हूं। आज सुबह जब भोर हुई तो, उनके साथी आए हैं। उनके साथ ही अपने साथ, उनकी वर्दी लाए हैं। शहीद हुए हैं मेरे फौजी, उन्होंने अभी बताया है। शत्रु से लड़ते हुए उसने, वीरगति को पाया है। मैं खुद को कैसे समझाऊंगी? बाबा से कैसे बतलाऊंगी? पिता हुए शहीद तुम्हारे, बच्चों से कैसे कह पाऊंगी? एक वीर की वीर विधवा हूं, मैं सैनिक धर्म निभाऊंगी। मैं बाबा की लाठी बन जाऊंगी, मैं बच्चों का पिता बन जाऊंगी। वीर फौजी की वीर विधवा हूं। पूरे जग को दिखलाऊंगी। मैं सैनिक धर्म निभाऊंगी, मैं सैनिक धर्म निभाऊंगी।।।