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वीर शिवाजी का छावा....

VIVEK KUMAR PANDEY 04 Sep 2025 कविताएँ देश-प्रेम छावा, वीर शिवाजी, वीर शिवाजी का छावा, हिन्दवी स्वराज, 12918 0 Hindi :: हिंदी

जय जगदम्बा!
जय जगदम्बा!
बोल रहे वीरत्व लिए।
महाकाल के भक्त हैँ ये,
रहे सदा अमरत्व लिए।
पृथुल वक्ष है, पौरुष भारी 
आँखों में स्वराज का लावा।
केशरी सदृश्य यह योद्धा,
है वीर शिवाजी का छावा।
सौ से अधिक लड़ी लड़ाई,
कभी नहीं वो माने हारी ।
आठ लाख अफगानों पर,
बीस हजार मराठा भारी।
दुर्गा और शारदा मैया,
एक साथ यों आयीं थी।
शम्भा और कवि कलश की,
अकथनीय तरुणाई थी।
शम्भा और कवि कलश 
दोनों के दोनों नरवीर।
उनके पौरुष की ज्वाला में,
धधक रहा मराठा तीर।

नख नोंचे और केश उखाड़े,
गर्म सलाखें घोंपी आँखों पर।
पर झुके नहीं शम्भा जी फिर भी,
रहे प्रतिमान मराठा शाखों पर।
सिर को धड़ से अलग किया
फिर खंड किये पूरे धड़ के।
धन्य वीर बांकुरे भारत के,
धड़ खड़ा रहा सम्मुख अड़ के।

पौरुष हो जिनके बाजू में,
इतिहास वही रचते हैँ।
ऐसे प्राणों में शिव स्वयं,
महाकाल बन बसते हैं।
प्रलयंकारी शिव खुद 
महाकाल बन आये हैं।
संग में अपने शक्ति का,
सम्पूर्ण वेश धर आये हैं।
गूंज रही थी प्रतिध्वनि ऐसी, 
हिन्दवी स्वराज की जय।
बोलो जगदम्बा की जय।
बोलो शम्भा जी की जय।
ॐ नमः पार्वती पतये, हर-हर महादेव।। 

विवेक कुमार पाण्डेय 
प्रतापगढ़, उत्तर प्रदेश

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