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“थोड़ी-सी इंसानियत”

Anilkumar Rathwa (Sameer) 29 Dec 2025 कविताएँ समाजिक “थोड़ी-सी इंसानियत” 9927 0 Hindi :: हिंदी

कड़वे समय में भी अगर
बोली में शहद घुल जाए,
तो टूटे दिलों के शहर में
उम्मीद का घर बन जाए।

सबके हिस्से का सूरज है,
सबकी अपनी-अपनी छाया,
जो किसी की छाँह छीन ले,
वो इंसान कैसे कहलाया?

भूखे होंठों की मुस्कान में
जो रोटी की खुशबू भर दे,
वही सबसे अमीर है सच में,
जो दिल से दिल का फासला कर दे।

माँ की लोरी, पिता का पसीना,
बहन की दुआ, भाई का साथ,
इन्हीं रिश्तों से बनता है
समाज का सच्चा इतिहास।

आओ इतनी सी कोशिश करें,
कि किसी की आँख न भीगे,
अगर आँसू बन भी जाएँ,
तो कोई अपना उन्हें पोंछे।

क्योंकि दुनिया जीतने से पहले,
इंसान बनना ज़रूरी है,
मिठास भरे व्यवहार से ही
समाज का भविष्य मज़बूत है।

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