Rupesh Singh Lostom 30 Mar 2023 कविताएँ अन्य तन की चोट 34973 0 Hindi :: हिंदी
मन की चिंता तन की चोट कौन देखेगा किसे दिखाऊ जख्म देने बाला भी अपना अच्छा रह जाना है मौन बदन का भूख जिस्म की प्यास हृदये के पीड़ा समझेगा कौन धाव भी अपना और घाती भी इस पे मरहम लगाएगा कौन कौन सुनेगा किसे सुनाऊ जीवन की नैया डूब रही इस लिए मैं मौन हूँ तन्हाइयों में ही कही गौण हु न जीने की इच्छा न मौत के चाह बस भूले बिछड़े यादों को सिने से लगाए बैठा हूँ