Ranjana sharma 30 Mar 2023 कविताएँ अन्य Google 87477 0 Hindi :: हिंदी
कितनी चंचल हो तुम
अपनी मन की रानी हो तुम,
जिधर चाहती हो
उधर जाती हो तुम ।
गर्म में सबको राहत देती हो तुम
ठंड में सबको सताती हो तुम,
कितनी ताजगी है, तुममें
कीट-पतंग , फूल-पत्ते खेलते हैं
सब तुमसे।
पतंगों को दूर आकाश में
पहुंचती हो तुम।
तारीफ करूं क्या तुम्हारी
आखिर हो कोन तुम?
"मैं हूं --------हवा ।"
धन्यवाद।