Ajay Vishwakarma 24 Dec 2025 कविताएँ बाल-साहित्य 10513 0 Hindi :: हिंदी
सर्द हवाओं के नाम सर्द हवाएँ जब चलती हैं, तो सिर्फ़ जिस्म नहीं काँपता— यादें भी सिहर उठती हैं। बढ़ती ठंड धीरे-धीरे वक़्त की रफ़्तार को थाम लेती है, शामें लंबी हो जाती हैं और खामोशी बोलने लगती है। हवा हर दरख़्त से पूछती है उसकी हरी उम्र का पता, नंगी शाख़ें बिना शिकायत हर सवाल सह लेती हैं। चाय के प्याले में उबलती है ज़िंदगी, भाप के साथ अधूरे ख़्वाब आसमान की ओर उठ जाते हैं। रज़ाई के भीतर सिमटता हुआ इंसान समझने लगता है— गर्मी केवल धूप से नहीं, किसी अपने की मौजूदगी से आती है। और यूँ ही इन सर्द हवाओं में दिल सीख लेता है टूटकर भी जिंदा रहना।