Ratan kirtaniya 27 May 2024 कविताएँ अन्य ठण्ड काल मेन फूलों के माध्यम से देश प्रेम का वर्णन किया गया 30848 0 Hindi :: हिंदी
निशा से चला - सारें दिशाओं से चला ; पाला लिऐ पवन , ठिठुर रहा रज़ाई - सारी रात - ठिठुर के रज़ाई में लूँ अंगड़ाई । जल्दी से उठो सूरज भाई - रात भर जग - ठिठुर कर सोया है , हो गया भोर - आग तापते वहाँ - वहाँ ; आग जले जहाँ - जहाँ , काम सब छोड़कर - वार्तालाप में जोड़कर , बेला बीताते सब - भाई तू दमक - धमक से चमकेगा कब , हो गया भोर - दुनिया को मत बना कामचोर । ठिठुरा रात भर - रज़ाई से गहरा नाता है , रज़ाई को नही छोड़ना - सोने को भाता है , उठा मैं ने जिस पल - देखा नव पल्लव पल , डालियाँ - कलियाँ - पुष्प कोमल ; पाला उस को संकट में डाला , आ गये हैं सब के अंत काल , भयावह है शरद काल । रहे नहीं पुष्पों में मुस्कान - निकल रहे प्राण ; बाप रे कितना ठंडा - कैसी शरद काल , मैं ही अपना डालूँगा - पुष्पों में प्राण , पुष्पों से जग को जगमगा दूँगा , काँटों से प्रेम अमृत सींच दूँगा , यही हैं अभिलाषा हमारा - पुष्पों से चमके जग सारा । पुष्पों की कोमल पंखुड़ियों में - मैं अपना उर की कविता लिख दूँगा ; खिले पुष्पों की सुगंधित में - तुकांत में छंद में ; होगा लिखा कविता हमारा । पुष्पों ने हँस के बोली - उर में छिपी अभिलाषा खोली , चाहे जितनी भी हो सुरबाला - ना बनूँ गूँथ के उसकी माला ; भले हो आशिकों की जोड़ी , हो कितनी भी प्यारी - हे प्रेम प्रिया ! ना बनूँ इज़हार की जरिया , भारत माता के लिए - गये प्राण जिनके - चरणों को पूजू हँस के , गले में चढ़ूँ बन के माला ; डालों से तोड़ लेना - वीर शहीदों के सजदा के लिए ; डाल से टूट के - भले चले जाये मेरा प्राण । रतन किर्तनिया पखांजूर जिला :- कांकेर छत्तीसगढ़