Ajay kumar suraj 18 Apr 2025 कविताएँ समाजिक #"प्रेम,_समरसता_और_बंधुत्व" #अजय_कुमार_सूरज 25577 0 Hindi :: हिंदी
"प्रेम, समरसता और बंधुत्व" 1. न हो द्वेष मन में, न बैर का रंग, हर एक साँस में हो, प्रेम का एक संग। भले ही अलग हो पहनावा, नाम, पर सबके भीतर एक-सा हो एक राग। 2. नज़र से न बाँटो किसी को कभी तुम, न भाषा, न मज़हब से मापो किसी ग़म। जहाँ प्रेम हो, वहीं ईश्वर का वास, जहाँ बैर हो, वहाँ उजड़े हैं राह। 3. समरसता वह दीपक है जो जलता रहे, अँधेरों में रोशनी बिखेरे। न हो कोई ऊँचा, न नीचा हो, सबका हक़ समान, यही सच्चा नज़रिया हो। 4. बंधुत्व हो जैसे बरसता घटा, हर दिल को भीगने दे बिना कुछ कहा। ना कोई पराया, न कोई अपरिचित, हर मन में हो ‘अपना’ सा कोई संचित। 5. चलो हम बनाएँ दुनिया को कुछ नया, जहाँ न हो कोई दूरी, न हो साज़िशें कोई सारा। जहाँ सबको मिले एक जैसी ख़ुशी, न हो कोई छोटा, न कोई बड़ा भाई। अजय कुमार 'सूरज'