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"नियति का न्याय"

Anilkumar Rathwa (Sameer) 11 Feb 2026 कविताएँ समाजिक "नियति का न्याय" 6385 0 Hindi :: हिंदी

न कोई चूक हुई मुझसे, न कोई अपराध किया,
फिर भी वक्त ने सजा सुनाई, ये कैसा न्याय जिया?
मैंने बोए थे फूल सदा, काँटों का उपहार मिला,
निर्दोष खड़ा था चौखट पर, पर तोहमतों का हार मिला।

​क्या यही नियति है?

​शायद सागर की लहरों को, तट से कोई बैर नहीं,
पर टकराना ही किस्मत है, इसमें कोई खैर नहीं।
जैसे दीपक जलता रहता है, बाती को भस्म कर,
अंधेरा मिटाने की खातिर, खुद का ही अंत कर।

​आसमान से गिरा पत्थर, पूछता नहीं ठिकाना है,
जिसके सर पर गिर जाए, उसे ही दर्द उठाना है।
ये जीवन एक बिसात है, जहाँ मोहरे हम अनजान हैं,
चालें कोई और चल रहा, हम तो बस एक सामान हैं।

​पर रुकना मत...

​गर बिना किए ही भुगत रहे, तो समझो तुम खास हो,
लोहे से फौलाद बनने के, शायद तुम ही पास हो।
वो सजा नहीं, वो तपिश है, जो कुंदन तुम्हें बनाएगी,
आज की ये खामोश पीड़ा, कल इतिहास सुनाएगी।

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