शरद भूषण मोंगरा 07 May 2026 कविताएँ प्यार-महोब्बत नखरे हसीनों के। 3223 0 Hindi :: हिंदी
"नखरे हसीनों के" जिधर चलते हैं ये नखरे ये नखरे बढ़ के होते हैं हँसीनो की तो नाकों पर, ये नखरे अड़ के होते हैं। ये गुस्से की निसानी है, हसीनों की कहानी है। कहा की जेब में पैसे, अभी कितने भी नहीं हैं। तभी नखरे से वो बोली, तुम्हें परवाह ही नहीं है। रोटी तो नहीं है, पर कहती है, पोडर तो लगा लूं। अभी मै देख सवंर लूं, ज़रा लाली तो लगा लूं। अरे घर में नहीं खाना, तेरा क्या रूप निखरा है। लेकिन तेरे निखरे से चेहरे को। तेरे नखरे ने घेरा है। इन्ही को लेकर मिया ओं के हमेशा लफड़े होते हैं। जिधर चलते हैं ये नखरे ...... शरद भूषण मोंगरा कवि गीतकार लेखक