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न उम्मीद मैंने छोड़ी थी- न सब्र मैंने छोड़ा था

Ruby Gangwar 15 Feb 2024 कविताएँ समाजिक 49253 0 Hindi :: हिंदी

न छोड़ी थी उम्मीद मैंने न सब्र मैंने छोड़ा था ,
सोचती थी जीत जाऊंगी मैं ये न किस्मत के ऊपर छोड़ा था,
उम्र हो चली थी मंजिल न अभी मिली थी,
किस्मत भी साथ छोड़ चली थी,
सोचा था छोड़ दूंगी दुनिया ये बस दिल में कश्मकश थी ,
फिर भी एक उम्मीद दिल में जग रही थी,
भगवान ने न साथ छोड़ा था बस यही एक खुशी थी,
यही मेरी व्यथा है यही मेरी कहानी थी।।

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