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माता सबरी

Rajnish khandal 18 Feb 2025 कविताएँ धार्मिक 43242 0 Hindi :: हिंदी

राम की राह देखत - देखत, पुष्प सजावत रोज है सबरी ।
राम के नाम को जपत - जपत, ​बैर को खावत रोज है सबरी ।
राम के नेह में डूबे - डूबे, पंत निहारत है ये सबरी ।
उत्कृष्ट, स्पष्ट, निकृष्ट छवि हाय, मन में राम की बनावत सबरी ।
एक दिन जब राम जी चले आए तो, जूठे बैर खिलावत सबरी ।
लक्ष्मण मनही - ​मन विचार करई ​कि, ​कौन सा जादू चला गई सबरी ।
जूठे बेर खिलावत - खिलावत , राम की लोह में समा गई सबरी।

Rajnish khandal

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