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मातृ प्रेम प्रगाढ़

Saurabh Sonkar 05 Oct 2025 कविताएँ प्यार-महोब्बत मातृ प्रेम प्रगाढ़ जमीन पे रहना गुलामी नहीं है मिट्टी के बंधन से मुक्ति तो पौधे के लिए आजादी नहीं है भाव से ही सब रिस्ते नाते हैं भाव के अभाव में सब हांड मांस का टुकड़ा ही है भाव मरी तो भावना मरी भावना मरी माँ भी मांस का टुकड़ा दिखी ! 18884 0 Hindi :: हिंदी

मातृ प्रेम प्रगाढ़ 

जननी मोह जनम न छूटे
जब छूटे तब ईश्वर रूठे
माँ का प्रेम जनम प्री धारा
माँ रूठे - रूठे हित सारा
जननी मोह जगत न छूठे
जब छूटे तब प्राण तन रूठे
माँ का प्रेम गंगा की धारा
माँ रूठे - रूठे जग सारा !

जननी प्रेम नीर-खून स मिश्रण
माँ छूटे - छूटे जग सारा
जग से नौ माह प्रेम प्रगाढ़ा
माँ सम प्रेम न मिलै संसारा
प्रेम बंधन सबसे मजबूता
मातृ प्रेम सब प्रेम अटूटा
जब स्वार्थ मनुज का बढ़ जाता है
पहले खुदको धोखा दे जाता है !

जमीन पे रहना गुलामी नहीं है
मिट्टी के बंधन से मुक्ति तो 
पौधे के लिए आजादी नहीं है
भाव से ही सब रिस्ते नाते हैं
भाव के अभाव में सब
हांड मांस का टुकड़ा ही है 
भाव मरी तो भावना मरी 
भावना मरी माँ भी मांस का टुकड़ा दिखी !

हे! प्रकृति तेरी नियती कैसी
जब से होश संभाला हूँ
देख रहा हूँ दुःख उसका तब से
मेरी माँ के आँखो में ये आंसू
क्यों, कैसे, और कब तक ?
करनी भी उसकी नेक ही है
क्या सीखूं कैसा व्यवहार करूं
हाँ मैं मातृ प्रेम प्रगाढ़ करूँ ..!

    - सौरभ सोनकर

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