MUKESH KUMAR DHODHAWAT 06 Aug 2025 कविताएँ समाजिक मैं आ गया मेरी छत के नीचे अब भीग नहीं सकता 25057 0 Hindi :: हिंदी
मैं आ गया मेरी छत के नीचे अब नहीं भीग सकता राह में भटक गया था इस तरह जैसे कि में दुबारा खड़ा नहीं हो पाऊंगा आवाज आई पिता का साया है अभी तक तुझ पर ये मकान नहीं गिर सकता मैं आ गया मेरी छत के नीचे अब नहीं भीग सकता गांव गली हर डगर हर चोराहा में समझ रहा खुद को अकेला जहां जीना हुआ दुसवार मैं वहां जा नहीं सकता मैं आ गया मेरी छत के नीचे अब भीग नहीं सकता सब कुछ कमाया बहुत कुछ खोया पर रोटी के सिवा कुछ नहीं खाया रहा अपनो कि तलाश में ये पीतल जमाना मेरा हो नहीं सकता मैं आ गया मेरी छत के नीचे अब भीग नहीं सकता जगह बदली चेहरा पुराना हो गया छोड़ा था बचपन में जिस बैसाखी को वो ख्वाब पुराना हो गया अब उसके साए से कोई अलग नहीं कर सकता मैं आ गया मेरी छत के नीचे अब भीग नहीं सकता मुकेश कुमार धोधावत 7726075950 कृपया मेरी कविता को को दिल की गहराई से पढ़ें और अपने अनुभव बताएं