Rajnish khandal 31 Mar 2025 कविताएँ देश-प्रेम 30470 0 Hindi :: हिंदी
आ धोरा वाली धरती है जो, जन-जन को शौर्य सिखाती है।
इस धरती ने एसे पुत्त जणे जो, समय की मांग समझाती है।
एक बड़ी कपटी शक्ति थी जिसने, भारत पर ऐसा वार किया, बड़े - बड़े योद्धाओं को जिसने अपनी छल - कपट से मार दिया।
तभी अवतरित हुए स्वयं एकलिंग जी, और उदय सिंह का उदय हुआ।
जन्म लिया एक ऐसे वीर ने, जिसने मेवाड़ इतिहास को अमर किया।
अमर किया हल्दीघाटी को, और अमर किया उस गौरव को।
युद्ध में जिसका रूप देख कर कांप गए धुरन्धर वो।
अरे! हल्दीघाटी में उस योद्धा ने ऐसा रूप दिखाया था, बहलोल खान को घोड़े सहित काटकर घाटी की धूल में मिलाया था।
वो बहुत लड़ा बन वीर बडा़, सेनापति तक आते-आते चेतक घायल हो पडा़, ना जीत सका युद्ध हल्दीघाटी का पर साथ ना छोड़ा इस माटी का।
घायल हुए उस घोडे़ ने राणा को, नाले के पार पहुंचा दिया। दो मित्र आपस मे बिछुड़ गए, विधाता ने कुछ ऐसा किया।
मैं सौगन्ध शिवा की खाता हूं, ये उजरा मेवाड़ बसाऊंगा।
ऐ जननी - जन्मभूमि मेरी मैं, तुम्हें आज़ाद करवाने आउंगा।
उस हार से जूझता राजा मेरा जंगल में, घास की रोटी खाता रहा।
साथियों को अपने साथ ले, मेवाड़ आजादी का विचार बनाता रहा।
तभी भामाशाह जैसे दानवीर ने दानवीरता को उभारा था।
राणा प्रताप के साथ मिल अपनी मातृभूमी का कर्ज उतारा था।
जित्यो फिर स्यु ईण माटी न, हल्दी वाळी उण घाटी न।
अकबर जेरी उण बुच न, पुरखा वाळी ईण मुछ न।।
मुगल न ईण माटी स्यू काड्यो, राणो फ़िर स्यू गद्दी चढ्यो।
ईण पगड़ी रो गोरव राख्यो, चितौड़ सारो सज्यो-धाज्यो ।।
~ रजनीश खाण्डल