संदीप कुमार सिंह 30 Mar 2023 कविताएँ समाजिक मेरी इस कविता को पढ़कर पाठक गण अवश्य ही लाभान्वित होंगें। 29231 0 Hindi :: हिंदी
लोभ मोह के फेर में, हुए बर्बाद लोग। अपना भी विरही हुआ, अमन का हो वियोग।। लोभ मोह के फेर में, टूट गया परिवार। हक्का बक्का मन रहे, ज्ञान हुआ बेकार।। लोभ मोह के फेर में, मिला पहचान धूर्त। कुछ दिन तक बढ़िया लगे, उसके बाद अमूर्त ।। लोभ मोह के फेर में, मिला न कोई घाट। अदना भी बेजा कहे, गए सब ठाट बाट।। लोभ मोह के फेर में, मिले नहीं सम्मान। और हानि ही अब मिले, हुआ बेकार आन।। संदीप कुमार सिंह✍🏼 जिला:_समस्तीपुर(देवड़ा) बिहार
I am a writer and social worker.Poems are most likeble for me....