Suraj pandit 30 Mar 2023 कविताएँ बाल-साहित्य सरस्वती मां 52369 0 Hindi :: हिंदी
बालक था मैं उस समय ,
आन्ध्कार मे ढका था जीवन ।
प्रकाश लेश मात्र ना था ,
खो रहा था श्वाशन ।
आन्ध्कार मे बैठ ,
उजाला कि कल्पना करता ।
घन-घौर सी बादल मे ,
सोपन देखा करता ।
एक स्नेह जुड़ी विधा से ,
सोपन, उजाला दिखा।
आन्ध्कार सी नगर मे ,
जलता, दीपक देखा।
महान है, उसकी दिव्यता ।
जिसने, कलम कि कहानी बताई।
एक स्हािई कि बूंद से ।
जीवन मे, संगीत रचाई।
किया कहुँ, उसकी बातें ।
हर पल गाथा गाता हूँ।
उसकी याद से भूखे-प्यासे ,
धरती मे सो जाता हूँ ।
ज्ञान, गंगा कि धारा हो, माँ।
मैं एक भिख छुक सा।
सदा बूंदो कि वर्षा हो,
मैं तेरा बालक हूँ माँ।
माघ शुल्क कि पंचमी मे ,
एक नविन रचना कर सका हूँ ।
कृपा है तेरी माँ ,
आपकी उपस्थित को मेहसूस कर सका हूँ।
---------------सूरज पंडित