PRIYA TIWARI 21 Jan 2026 कविताएँ समाजिक 8728 0 Hindi :: हिंदी
सांसों के अरमान जगे तो,
लेना भूल गए।
आंखों के अरमान जगे तो,
आंसू बह गए ।
दिल के अरमान जगे तो,
पत्थर बन गए ।
रूह के अरमान जगे तो,
शरीर छोड़ गए।
दिमाग के अरमान जगे तो,
अपनो को छोड़ गए।
कदमों के अरमान जगे तो,
गलियों को छोड़ गए।
दिल के अरमान जगे तो,
साथ छोड़ गए।
होठों के अरमान जगे तो,
दिल तोड़ गए।
कभी हम फूल हुआ करते थे,
अब कटा हो गए।
हम क्या हुआ करते थे,
और क्या हो गए।
(लेखिका-प्रिया तिवारी)