Vipin Bansal 24 Nov 2024 कविताएँ समाजिक #pitakasaya 34931 0 Hindi :: हिंदी
सर से उठा जब पिता का साया !
क़ीमत उनकी तब जान पाया !!
छीन गई जब पिता की गोदी !
शहंशाही अपनी मैनें खो दी !!
राजपाठ अपना सारा गंवाया !
शहंशाही दौर वो फिर न आया !!
सर से उठा जब पिता का साया !
क़ीमत उनकी तब जान पाया !!
सींचा पसीने से बग़ीचा ये सारा !
ऐसा माली न मिलेगा दुबारा !!
अपनी ग़रज को भी हमेशा दबाया !
जो भी कमाया हम पर लुटाया !!
पसीना तन से सूख न पाया !
हम पर रखी अपने प्यार का छाया !!
सर से उठा जब पिता का साया !
क़ीमत उनकी तब जान पाया !!
अनुशासन की छेनी से हमको तराशा !
गलतियों पे हमारी हमको डांटा !!
बनकर कठोर हमको दिखाया !
मोम की तरह थी उनकी काया !!
खुद को घटाकर हमको बढ़ाया !
पिघलता तन न हमें नज़र आया !!
सर से उठा जब पिता का साया !
क़ीमत उनकी तब जान पाया !!
पिता के चरणों से मिलती जन्नत !
कैसे पूरी हो अब ये मन्नत !!
नींद खुली न थी दिन ढ़ल आया !
सूरज पर छाई काली छाया !!
चरणों की सेवा न कर पाया !
ये जन्म मेरा हो गया जाया !!
सर से उठा जब पिता का साया !
क़ीमत उनकी तब जान पाया !!
माँ की ममता है अनमोल !
पिता की क्षमता का न कोई तोल !!
माँ का प्यार ही नज़र हमें आए !
त्याग पिता का हम देख न पाएं !!
माँ की कोख, पिता की छाया !
जीवन धरा पर तब ही आया !!
सर से उठा जब पिता का साया !
क़ीमत उनकी तब जान पाया !!
विपिन बंसल