Anilkumar Rathwa (Sameer) 03 Sep 2025 कविताएँ धार्मिक कृष्ण विषाद योग — भावार्थ सहित 12209 0 Hindi :: हिंदी
श्लोक १ कारागारे जन्मो मे, माता बन्धनयुक्तया। शिशुत्वे दुःखमासाद्य, लीला आरभ्यते धरा॥१॥ भावार्थ – मेरा जन्म कारागार में हुआ। माता-पिता बंधन में थे। जन्म लेते ही दुःख मिला, और धरती पर मेरी लीला की शुरुआत इसी विषाद से हुई। --- श्लोक २ वसुदेवो रात्रौ गत्वा, यमुनां तीर्त्वा भीषणाम्। नन्दगृहे मां स्थापयत्, वियोगो मातृ-पितृभ्यः॥२॥ भावार्थ – पिता वसुदेव ने मुझे यमुनाजी पार कर नन्द के घर पहुँचाया। जन्म लेते ही माता-पिता से वियोग का विषाद मुझे मिला। --- श्लोक ३ यशोदा वत्सलेनाऽहं, पालितः प्रेमविह्वलः। स्मरामि तां करुणां मातुः, हृदये विषाद आस्थितः॥३॥ भावार्थ – माँ यशोदा के प्रेम में पला। जब-जब उनका वात्सल्य याद आता है, तब-तब हृदय विषाद से भर उठता है। --- श्लोक ४ गोकुलं हित्वा दुःखेन, मथुराम् प्राप मन्दरम्। नन्दयशोदयोराश्रुः, मम चित्ते कम्पते॥४॥ भावार्थ – गोकुल छोड़कर मथुरा जाते समय नन्द और यशोदा के आँसू देखकर मेरा हृदय कांप उठा। --- श्लोक ५ कंसवधं कृतं मया, मथुरायां स्थिरोऽभवम्। तथापि वृन्दावनस्मृतिः, शोकसागरमाविशत्॥५॥ भावार्थ – कंस वध करके मथुरा में स्थिर हुआ, लेकिन वृन्दावन की याद ने मुझे शोक-सागर में डाल दिया। --- श्लोक ६ सुदामा मित्रं दीनं दृष्ट्वा, नेत्रयोः बाष्पपूरणम्। राज्ये स्थितोऽपि विषण्णोऽहं, मैत्री दुःखं हृदि स्थितम्॥६॥ भावार्थ – जब अपने निर्धन मित्र सुदामा को देखा तो नेत्र भर आए। राज्य और वैभव होते हुए भी मेरा हृदय मित्र-दुःख से विषण्ण हुआ। --- श्लोक ७ अर्जुनस्य पुत्रो वीरः, अभिमन्युः रणाङ्गणे। हतः पश्यन् मया शान्तं, हृदयम् व्यथितं पुनः॥७॥ भावार्थ – युद्ध में अर्जुन-पुत्र अभिमन्यु का वध देखकर मेरा हृदय व्याकुल हो उठा, यद्यपि मैंने बाहर से धैर्य रखा। --- श्लोक ८ धृतराष्ट्रस्य गृहे जाता, गान्धारी दुःखविह्वला। शप्तवती यदुक्षयम्, स्वीक्रियं मे मन्दहासेन॥८॥ भावार्थ – गान्धारी ने अपने दुःख में यदुवंश नाश का शाप दिया। मैंने शांत भाव से उसे स्वीकार किया, लेकिन भीतर विषाद था। --- श्लोक ९ युद्धान्ते कुरुक्षेत्रे, शवशय्या समन्ततः। धर्मविजयः सन्निहितः, परन्तु मनो विषादमयम्॥९॥ भावार्थ – धर्मयुद्ध जीतकर भी जब चारों ओर शवों का ढेर देखा, तब मेरा मन विषाद से भर गया। --- श्लोक १० यदवो मद्वंशजा नष्टाः, मद्ययुद्धे सुदारुणे। पश्यन् तं संहारं मे, हृदयम् भस्मतुल्यम्॥१०॥ भावार्थ – यदुवंशी अपने ही कलह में नष्ट हो गए। यह दृश्य देखकर मेरा हृदय राख समान हो गया। --- श्लोक ११ बन्धवाः भ्रातरः पुत्राः, स्वकृतेनैव क्षयिताः। अहमेकः शून्यतामध्ये, दुःखसिन्धौ निमग्नवान्॥११॥ भावार्थ – अपने ही कर्म से भाई-बन्धु और पुत्र नष्ट हुए। मैं अकेला रह गया और दुःख-सागर में डूबा। --- श्लोक १२ द्वारकायाम् रुदन्त्याः, स्त्रियः शून्यगृहस्थिताः। तासां विलापं शृण्वन् हृदि, मम मनः कम्पते पुनः॥१२॥ भावार्थ – द्वारका की विधवाओं का विलाप सुनकर मेरा हृदय पुनः काँप उठा। --- श्लोक १३ सर्वं कृतं मया धाम, धर्मस्थापनमेव हि। परन्तु जीविते नित्ये, वियोगो दुःखदायकः॥१३॥ भावार्थ – मैंने धरती पर धर्म की स्थापना की, परन्तु जीवन में वियोग का दुःख हर समय बना रहा। --- श्लोक १४ वनान्ते शान्तभावेन, विचरन् मौनमास्थितः। पश्यन् पतङ्गमात्रं च, विचिन्त्य जीवनं क्षणम्॥१४॥ भावार्थ – वन में मौन होकर घूमते समय मैंने जीवन की क्षणभंगुरता को गहराई से अनुभव किया। --- श्लोक १५ शरं जरया मुक्तं मे, पादे लग्नं भयङ्करम्। देहत्यागसमयः प्राप्य, मनो विषादेन पूरितम्॥१५॥ भावार्थ – जरा नामक शिकारी का बाण मेरे पैर में लगा। देहत्याग का समय आया, तब भी मन विषाद से भरा हुआ था। --- श्लोक १६ लोकहिताय यदावार्ता, कर्तव्यं मया कृतम्। तथापि मानवं दुःखं, लीलायां अनुभवामि॥१६॥ भावार्थ – लोकहित के लिए मैंने अपने कर्तव्य पूरे किए, परन्तु मानव शरीर के दुःख मैंने भी अनुभव किए। --- श्लोक १७ एवं विषादयोगोऽयं, मम जीवनलीलया। दुःखं च शिक्षा रूपेण, लोकाय प्रकाश्यते॥१७॥ भावार्थ – इस प्रकार मेरा विषाद भी एक योग बन गया। दुःख भी शिक्षा का रूप लेकर लोक के लिए प्रकाशित हुआ। --- श्लोक १८ यो मां पश्यति दुःखेषु, तं पश्यामि शिवं यथा। विषादो योगरूपेण, परिणामं सुखाय वै॥१८॥ भावार्थ – जो मुझे दुःख में भी देखता है, वह वास्तविक शिवत्व देखता है। क्योंकि विषाद भी योग है, जिसका परिणाम अंततः सुख ही है।