Saurabh Sonkar 26 Sep 2025 कविताएँ समाजिक सब्र कब्र आ गया सब्र न आया तुम स्वर्ग कहाँ से पाओगे भटक रही है गर ये आत्मा तुम शांति कहाँ से पाओगे सोने का तो है महल बनाया तुम सुकून कहाँ से लाओगे किसके हिस्से में क्या आया सब अपना-अपना प्रारब्ध है जीवन गर दागी हो गया तुम मिटा कहाँ से पाओगे शंकित गर रिश्ता हो गया तुम जोड़ कहाँ से पाओगे उल्टी बहेगी जब ये धारा तुम मोड़ कहाँ से पाओगे समाजीकरण ही न हो पाया तुम विकास कहाँ से लाओगे संस्कृति ही न जब अपनाया तुम सभ्यता कहाँ से लाओगे अध्यात्म ही समझ न पाया मन जीत कहाँ से पाओगे कब्र आ गया सब्र न आया तुम स्वर्ग कहाँ से पाओगे ||रचयिता - सौरभ सोनकर|| 10977 0 Hindi :: हिंदी
सब्र कब्र आ गया सब्र न आया तुम स्वर्ग कहाँ से पाओगे भटक रही है गर ये आत्मा तुम शांति कहाँ से पाओगे सोने का तो है महल बनाया तुम सुकून कहाँ से लाओगे किसके हिस्से में क्या आया सब अपना-अपना प्रारब्ध है जीवन गर दागी हो गया तुम मिटा कहाँ से पाओगे शंकित गर रिश्ता हो गया तुम जोड़ कहाँ से पाओगे उल्टी बहेगी जब ये धारा तुम मोड़ कहाँ से पाओगे समाजीकरण ही न हो पाया तुम विकास कहाँ से लाओगे संस्कृति ही न जब अपनाया तुम सभ्यता कहाँ से लाओगे अध्यात्म ही समझ न पाया मन जीत कहाँ से पाओगे कब्र आ गया सब्र न आया तुम स्वर्ग कहाँ से पाओगे ||रचयिता- सौरभ सोनकर||