चंद्र प्रकाश 30 Mar 2023 कविताएँ समाजिक आज जिंदगी की बढ़ती गती, धीमी होती नजर आ रही I 108044 0 Hindi :: हिंदी
जिंदगी की गती
आज जिंदगी की बढ़ती गती, धीमी होती नजर आ रही,
समय नहीं किसी के आँचल मे, जिंदगी सिकुड़ती नजर आ रही,
घर था सुकुन आराम के लिए, आज, अशान्ति नजर आ रही,
दीये जलते थे खुशी रोशनी के लिए, आज बिजली की रोशनी मे
खुशी और शक्ल अपनों की नजर नहीं आ रही,
अजब- गजब अनुभव लिए, जिंदगी कुछ नया ही समझा रही
आज जिंदगी की बढ़ती गती, धीमी होती नजर आ रही I
लेते थे, जो सपने रातों में, सो जाते थे बातों ही बातों में,
आई क्रांति, नहीं शांति, रहे भ्रांति, अब चिंता दिन की कटती रातों में,
अकेले-एकांत हुए, अशांत हुए, उलझन अगले दिन की, बनी रहती रातों में,
आराम नहीं, शोषण हुआ नींद का, दु:खी हुए खरांटों की रातों में
स्वजन की कमी नहीं समाज मे, फ़ीर भी निर्धनता नजर आ रही
आज जिंदगी की बढ़ती गती, धीमी होती नजर आ रही ।।
चंद्र प्रकाश गौड़ @ सेठी -
केशव पुरम , दिल्ली -35