नीतू सिंह वसुंधरा 19 Sep 2023 कविताएँ समाजिक Nitu singh Hindi Kavita 40247 0 Hindi :: हिंदी
जिंदगी एक तन्हाई तन्हाई के उन पलों को मैं कैसे भूल जाऊं। जो मुझे अपनों के साथ रहते हुए भी अपनापन नहीं। मैं अपनों को अपनाते अपनाते हैं दिल में जख्म बन गया। वह जख्म कब नासूर बन गया यह समझ नहीं आता आया। कहने के लिए अपने लोग बहुत हैं, लेकिन तन्हाइयों में ढूंढता हूं तो कोई नहीं है। इस स्वार्थी संसार में तृष्णा लालच तो बहुत है, लेकिन संसार में मैं कब कगार का वृक्ष बन गया। अब मैं खुद को अकेला महसूस करता हूं , जब मुझे अपनों से आघात लगती है। वह जख्म शरीर पर तो दिखाई नहीं देता, मगर ता उम्र वह जख्म कभी भर नहीं सकता। तन्हाई के उन पलों को मैं कैसे भूल जाऊं। जो मुझे अपनों के साथ रहते हुए भी अपनापन नहीं।