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"जूतो का शहर"

Anilkumar Rathwa (Sameer) 12 Aug 2025 कविताएँ हास्य-व्यंग "जूतो का शहर" 15831 0 Hindi :: हिंदी

एक दिन मैं गया जूतों के शहर में,
भीड़ थी भारी, हर एक पहर में।
कहीं बूट चमचमाते, कहीं चप्पल मुस्काती,
कहीं सँडिल की अदाएँ, दिल को लुभाती।

एक दुकान पर खड़ा, दुकानदार हँस पड़ा—
"साहब, आपके पैर तो VIP जैसे बड़ा!"
दूसरे ने टोका— "हमारे पास है फैशन का ताज,
पहनोगे तो बनोगे शहर के नवाब!"

मैंने कहा— "भाई, आराम भी तो चाहिए,"
वो बोला— "आराम भूलो, बस शोहरत पाईए!"
आख़िर थक-हारकर, मैंने मन में ठाना,
पुराने जूतों संग ही घर लौट जाना।।

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