Pravin Chaubey 15 Feb 2025 कविताएँ देश-प्रेम #kavita#shayaril#poeam#kavya# 16518 0 Hindi :: हिंदी
गाँव – मेरी जड़ों की खुशबू
नंगे पाँव वो पगडंडी, अब भी रुला देती है,
जहाँ बचपन ने कंचों की दुनिया रची थी।
वो कच्चे मकान की मिट्टी, जो हाथों में चिपक जाती थी,
अब शहर की ऊँची इमारतों में खो गई है।
वो सुबह की पहली रोशनी, जो ओस पर मोती छोड़ जाती थी,
वो बैलों की घंटियाँ, जो खेतों में संगीत रचती थीं।
हल की गहरी लकीरों में, उम्मीदें बोई जाती थीं,
और सूरज की तपिश में, मेहनत की रोटी पकती थी।
तालाब के किनारे वो पेड़ों की छाँव,
जहाँ ख्वाब भी सुकून से सोते थे।
वो महुआ के फूलों की मीठी खुशबू,
जो हवाओं में मोहब्बत घोल देती थी।
चौपाल पर बैठी वो दादी की कहानियाँ,
जिनमें कभी राजकुमार होते थे, तो कभी परी।
बाबा की आँखों की वो झुर्रियाँ,
जिनमें गुज़रे जमाने का सारा निचोड़ था।
अब शहर में हूँ, जहाँ समय भागता है,
पर लम्हें ठहरते नहीं।
जहाँ दौलत बहुत है,
पर प्यार के वो सिक्के नहीं मिलते।
गाँव की वो माटी, आज भी आवाज़ देती है,
कभी हवाओं में, कभी बारिश की बूंदों में,
शायद एक दिन लौट जाऊँगा,
अपनी उन्हीं जड़ों की गोद में... जहाँ मेरा असली घर है।
✍️ प्रवीण चौबे
I am the Restuarant Purchase Manager My hobby is writer...