Amit Kumar Ranjan 09 Aug 2024 कविताएँ अन्य 36449 0 Hindi :: हिंदी
मन तड़प जाता है यह सोच करकी,
जमाना किधर जा रहा है |
गैरों की क्या बात करें अपने भी, नहीं पहचाने जा रहे है ||
दिल मे बेवसी,
खामोशी चेहरे पर बनी|
दिल टूट जाता है ,
इतना स्वार्थ कैसे जनी है ||
कैसा मुक़ददर है मेरा मुँह सबने, फेरा जिसको दिल से जाना है |
अब वही कमियाँ निकालने लगे, जिनको हमने अपना माना है ||
लेखक -
अमित कुमार रंजन
गाजीपुर (यूपी )